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मेरा नाम एगनेटा है !

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 एगनेटा पचास साल की प्यारे -से मोटापे वाली और हमेशा एक मोटा जैकेट पहनने वाली स्वीडिश महिला है। पासपोर्ट ऑफिस के प्रशासनिक दफ़्तर में काम करती है और अब जल्द ही सेवामुक्त होने वाली है। लगातार सोच रही  है कि अब वह क्या करेगी ? मरने का इंतज़ार या फिर कोई नया काम।  पचास की उम्र के बाद कौन काम भी देता है फिर चाहे करने का साहस दूना ही क्यों न हो।   एगनेटा के बच्चे बड़े हो गए हैं और तब ही याद करते हैं जब उन्हें कुछ चाहिए होता है। पति भले तो हैं लेकिन एगनेटा को अपना  फ्रेंच लव  उनसे छिपाना पड़ता है। वह इंसान नहीं बल्कि फ़्रांसिसी अंदाज़,वहां की मशहूर चीज़ , ताज़गी,आज़ादी और सबसे बड़ी बात किसी को भी जज नहीं करता वाला बर्ताव है। यह सब उसे पसंद है। स्वीडन में रहते हुए वह फ्रेंच चीज़ को छुपा कर रखती है क्योंकि पति को यह सब बिल्कुल पसंद नहीं । तभी एक विज्ञापन पर उसकी नज़र पड़ती है। यह फ्रांस में 'ओ पर'  का जॉब है जिसमें आप होते तो बाहरी हो लेकिन होस्ट के साथ ही रहते हो उसके परिवार के सदस्य की तरह। छोटे-मोटे काम करने होते हैं। बदले में आपको पैसा मिलता है। एगनेटा को...

नागरिकता :हम कोई काग़ज़ नहीं मानेंगे

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बीते कुछ सालों से एक विचित्र सिलसिला चल पड़ा है। सत्ता काग़ज़ की बात करती है और जनता अपने काग़ज़ी दस्तावेज़ों को खंगालने लगती है। फिर जनता और सरकार के बीच  हम कागज़ नहीं दिखाएंगे से हम कागज़ ही कागज़ देखेंगे की रस्साकशी चलने लगती है। अब सरकार कहती है हम नागरिकता के लिए किसी भी कागज़  को नहीं मानेंगे, पासपोर्ट को भी नहीं।फ़िलहाल देश में नागरिकता के लिए कोई भी प्रमाण वैध नहीं हैं। कहने को हम भारतीय नागरिक हैं भी और नहीं भी।  ताज़ा बहस और विवाद बीते बुधवार को उस समय पैदा हो गया जब विदेश मंत्रालय ने  पासपोर्ट सेवा दिवस के दिन ही अपने  सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़  के बारे में यह कह दिया कि यह केवल यात्रा के लिए आवश्यक दस्तावेज़ भर है ना कि नागरिकता का कोई प्रमाण। सही है। मान लिया क्योंकि कई देशों में एक से अधिक देशों के पासपोर्ट रखने की रवायत है। जयपुर की एक टेक कंपनी में अपने साथियों से मिलने कभी-कभी माइक  यहां आते हैं। वे ख़ुद आधे फ्रेंच और आधे ब्रिटिश हैं। उनके पास फ्रांस और ब्रिटेन दोनों के ही पासपोर्ट हैं और जिस कंपनी में वे काम करते हैं उसका दफ्तर स्विट...

ये तो खिरते ही जा रहे हैं!

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ये तो यों  खिर रहे हैं ज्यों गुलाब के फूल का समय पूरा होने पर उसकी  पंखुड़ियां खिरा करती हैं या फिर पेड़ के पीले पात जो अपने अंतिम वक्त में उसका साथ छोड़ देते हैं। इनका पतन चौंकाने वाला है, अप्राकृतिक है क्योंकि ये समय से पहले ही झड़े जा रहे हैं। जैसे कोई विष पी लिया हो या कोई तूफ़ान झेल लिया हो। किस-किस का नाम लें।  इनमें तो जैसे गिरने की होड़ लगी है। निर्लज्ज ऐसे कि पनपे कहीं और गिर कहीं ओर रहे हैं। शिवसेना,एनसीपी (नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी),आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने तो झड़ने के  पुराने  सारे  रिकॉर्ड ही तोड़ दिए हैं। तृणमूल को  एक हार क्या मिली इसके तिनके ही मूल से बिखर गए। ये पार्टी तो इस कदर ईमानदार साबित हुई  कि पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने के लिए इनकी ज़रूरत ही नहीं थी, फिर भी टूट गई । टूटने-बिखरने के लिए ऐसा अभूतपूर्व उत्साह कभी देखने को नहीं मिला है। ये तृणमूल वाले ही थे जब संसद में प्रधानमंत्री का भाषण होता था तब सबसे ज़्यादा नारे लगाते थे, सबसे ज़्यादा लामबंद होते थे। इनकी  नारेबाज़ी  इतनी सुरीली होते थी कि ...

मर्दों का 'मी टू' है अनुराग की फ़िल्म बंदर

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अनुराग कश्यप निर्देशित बंदर कई मायनों में बेहतरीन फ़िल्म हो जाती हैं क्योंकि उसके जेल के दृश्य निर्मम सच को सामने रख देते हैं, वे पुलिस वकील की सांठ -गांठ की पूरी पोल खोल देते हैं और उस न्याय व्यवस्था की भी जहां कई बार जज भी अपने पूर्वाग्रहों को पीछे नहीं रख पाते। दरअसल हम इतनी भीड़ और फिर आँखें बंद कर फ़ैसला दे देने वाला समाज हैं कि हमारी जेलें  फिर विचाराधीन कैदियों से भर जाती है। जुर्म साबित होने  से पहले ही वे बलात्कारी,हत्यारे हैं। यहां जेल रूल है और बेल अपवाद। गैंग्स ऑफ़ वासेपुर और देव-डी से चला गालियों और अनुराग का नाता  बंदर में पुलिस और कैदियों से जुड़कर और गहरा हो गया है।  समर (बॉबी देओल) एक 50 साल का एक स्ट्रगलिंग कलाकार है जो एक साथी की तलाश में डेटिंग एप पर आता है। साथी मिलता भी है, सहमति भी बन जाती है लेकिन फिर गायत्री (सपना पब्बी ) का व्यवहार समर को  काफी पजेसिव लगने लगता है। गायत्री उसे  बताती है  कि वह लंदन से मुंबई एक लड़के के लिए आई थी लेकिन वह उसे छोड़ कर भाग गया। वह उसके घर आकर सजावट करती है, उसे समझाती है कि मैं तुम्हारे घर में पसरी नकार...

शर्म तुमको नहीं आती मगर

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अगर सियासत शतरंज का कोई खेल है तो फिर इन दिनों किसके पासे लगातार सही पड़ रहे हैं और कौन है जिसके तमाम पासे तो हमेशा सही पड़े लेकिन अव्यवस्थाओं का पिटारा ऐसा खुला कि अब रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है? देश में हादसे, अपराध, किशोरों की परीक्षाओं और पेपर लीक का तो जैसे अंतहीन सिलसिला चल पड़ा है। कोई भी सरकार ख़ुद को इस हालत में देखना पसंद नहीं करती लेकिन ये तो किसी ज्वालामुखी के पिघले लावे सा सतह पर आता जा रहा है ? ये किशोर जो शायद ही कभी इतने मुखर हुए हों, तकलीफों से इस कदर घिर गए कि बोलने के सिवाय उनके पास कोई चारा  नहीं रहा। वे आगे आकर व्यवस्था के छेद सरकार को दिखा रहे हैं, सवाल पूछ रहे हैं लेकिन कोई इस गड़बड़-झाले की ज़िम्मेदारी नहीं ले रहा। तीन  किशोरों ने  शिक्षा  महकमे को सीधे  आइना दिखाया लेकिन वे अब भी अपनी छवि पर मुग्ध हैं। उससे एक बात तो बिलकुल साफ़ हो गई हमारे देश में   शिक्षा  अब भी  ऊंची प्राथमिकता हासिल नहीं कर पाई है। बजट तो न्यूनतम है ही,व्यवस्था भी दो कौड़ी की साबित हो रही है।    बारहवीं कक्षा के लिए पेपर जांच की समूची व्यवस्था...

ना कोई कॉकरोच ना कोई जनता और ना पार्टी

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सारे कॉकरोच मर गए माय लॉर्ड। अब चिंता की कोई बात नहीं। जनाब ये किसी एक्स के हैंडल से निकले थे, अब वहीं सारे दफ़न हो गए। आप देशहित में बोलना जारी रखिए। अभी तो आंदोलनजीवी, धरनाजीवी और प्रदर्शनजीवियों का ख़ात्मा भी बाक़ी  है। फ़िलहाल तो ये सारे  तिलचट्टे हिट कर दिए गए हैं। बहुत तेल चाटा है इन्होंने देश का। धीरे-धीरे सबकुछ उनकी पहुंच से गायब कर देंगे। ये नमक हरामी भी होते हैं और अपने दो पतले हिलते तंतु यानी टेंटेकल्स आगे कर, उन्हें भी डरा देते हैं जिनकी रसोई में जीते हैं। अब ये किसी खेल में नहीं हैं। बहुत उछल-उछल कर नाच रहे थे। एंटी कॉकरोच का तगड़ा पोछा मार दिया है और ज़रूरत पड़ी तो चप्पल भी चला देंगे, इन्हें कुचलने के लिए लेकिन एक डर है, कम्बख्त बार -बार बच जाते हैं। जुर्रत देखो इनकी शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांग रहे  हैं। अब की बार देश के ये चट्टे कोई पार्टी बनाकर आ गए थे  और देश की सुरक्षा को ही ख़तरे में डाल रहे थे। पेपर लीक-वीक तो होते रहते हैं, तिलचट्टों को चित करना ज़्यादा ज़रूरी है। पर सर अब सब ठीक है।  आप आराम से ऐतिहासिक फैसले लिखिए। सर पर भी।  आख़िर क...

सवाल ये कि वे सवाल क्यों नहीं लेते

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पिछले दिनों भारत के प्रधानमंत्री यूरोप की यात्रा पर थे। इनमें पांच नॉर्डिक देशों के अलावा इटली, निदरलैण्ड जैसे देश भी शामिल थे। ये पांच नॉर्डिक देश डेनमार्क,स्वीडन,फ़िनलैंड,आइसलैंड और नॉर्वे उत्तरी यूरोप और उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र में स्थित हैं और जिनका  रहन-सहन, क़ायदा-क़ानून ऐसा है कि अमेरिका जैसा देश भी अपनी तुलना बस उन्हीं से चाहता है। हमारे देश से जब कोई देसी परिवार इन देशों में जाता है तो वहां 'मिसेस चैटर्जी वर्सेज नॉर्वे' जैसे हालात पैदा हो जाते हैं क्योंकि वहां तो बच्चे को अलग बिस्तर ना दे पाना, हाथ से खिलाना भी अभद्र माना जाता है और भारतीय माता-पिता तो गुस्से में बच्चों को दो-चार जड़ भी देते हैं। ये सब वहां जुर्म समझा जाता है क्योंकि बच्चों के अपने हक हैं।  भारत के  प्रधानमंत्री भी तमाम देशों की यात्रा कर नॉर्वे पहुंचे। यह कोई  43 साल बाद हुई यात्रा थी। सबकुछ बढ़िया चल रहा था। उन्हें नॉर्वे का सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिला था; इटली की प्रधानमंत्री के साथ मिल कर उन्होंने संपादकीय पन्ने पर सहयोग का बड़ा लेख लिखा था; इस साल जनवरी में यूरोप के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौ...

'नीट' नशे में है सिस्टम

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ये जो इन दिनों परीक्षाओं के पर्चे लीक हो रहे हैं, ये पर्चे नहीं बल्कि रक्त है देश के युवाओं का जो बीते कुछ सालों से लगातार लीक हो रहा है। इस रिसाव के साथ जो भरोसा और आस्था व्यवस्था से  डिग रही है, वह भविष्य के संकट के  ख़तरनाक संकेत हैं। इस लीक और फिर परीक्षा के रद्द होने के बाद दो छात्रों ने आत्महत्या कर ली है। ये पढ़ने -लिखने वाले बच्चे हैं इसलिए इनका रुदन, चीत्कार सड़कों पर नहीं है। यह ऐसा है जैसे किसी ने जानबूझ कर इनके ख़िलाफ़ कोई साज़िश रची हो। कल्पना कीजिये कि व्यवस्था से इस तरह ठगा हुआ, धोखेबाज़ी का शिकार छात्र जब समाज में दाख़िल होगा, तब वह कैसे एक  मज़बूत और आत्मविश्वासी नागरिक का प्रतिनिधि होगा? नीट ही नहीं बल्कि अधिकांश सरकारी भर्ती परीक्षाएं कभी भी रद्द हो जाती हैं और कभी नतीजे देने में ही लम्बा वक्त लगा देती हैं । इंतज़ार में उम्र निकल जाती है और युवा निराश। आज भले ही युवा शक्ति पर देश इठलाता हो,आगे लाख ढूंढने पर भी समझ नहीं आएगा कि आखिर ग़लती कहां हो गई ? बेहतर होता नीट परीक्षा को जल्दबाज़ी में रद्द करने की बजाय पहले जांच होती क्योंकि गंभीर गड़बड़ियां ...

कैसे कामयाब हुआ फैक्टर विजय क्या थी सोशल इंजीनियरिंग

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पांच राज्यों के चुनावों में सबसे अप्रत्याशित नतीजे किस राज्य के रहे ? ज़्यादातर का जवाब  शायद पश्चिम बंगाल  होगा लेकिन बंगाल में जीत के लिए जिस स्तर के प्रयास भारतीय जनता पार्टी ने किए उसके बाद अगर ऐसा ना होता तो शायद वह अजूबा होता। करिश्मा तो किया है तमिलनाड़ु की नई नवेली पार्टी टीवीके (तमिलगा वेत्री कषगम) ने। अब तो टूटे-फूटे विपक्ष को भी एक होकर ऐसा नायक ढूंढ़ना चाहिए जिसकी  पूरे देश में लोकप्रियता चरम पर हो, ऐसे फैन क्लब हों जो पार्टी का काडर बन जाएं और सोशल इंजीनियरिंग  ऐसी कि उसे भी चुनाव जितवा दे। तमिलनाड़ु की जनता ने साठ साल पुरानी द्रविड़ियन राजनीति के पांव उखाड़ फेंके ठीक वैसे ही बदलाव के साथ विपक्ष को भी आना होगा वर्ना विलुप्त होने में अब कोई कसर बाक़ी नहीं है।  ये पुराने दल तो ऐसे निर्लज्ज और चालबाज़ हैं कि पश्चिम बंगाल जहां अभी आधिकारिक तौर पर  सत्ता किसी  के हाथ आई भी नहीं है,  हालात का लाभ लेकर  हिंसा का ख़ूनी खेल खेल रहे हैं। देश को क्यों यकीन करना चाहिए ऐसे दलों पर ? ये जो नया यकीन तमिलनाड़ु की जनता ने किया है, यह इसी सड़ांध मारती सियासत...

'पापा भाग गए' के साथ लौटते हैं कई सवाल

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किसी भी नाटक का पहला शो नाटक के साथ उस उत्तेजना, उहापोह और डर को भी दिखा जाता है जो नाटक के पात्र और निर्देशक उस पल में जी रहे होते हैं। पापा भाग गए का पहला शो जब जयपुर के जवाहर कला केंद्र में मंचित हुआ, तब ऐसे ही भाव सब के चेहरे पर थे जो धीरे-धीरे नाटक के  किरदारों और फिर उनके सशक्त भावों में ढलते चले गए। पापा एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति हैं जो दोनों बच्चों का ब्याह कर चुके हैं और अपनी ज़िन्दगी को व्यस्त रखने की कोशिश में लगे हुए हैं क्योंकि पत्नी की मौत सब्ज़ी-मंडी में सांड के उत्पात में हो चुकी है। दस साल तक पापा ने कोमा में रही पत्नी की देखभाल की लेकिन अब वे अकेले हैं। इस अकेलेपन के बीच जब बच्चों को पापा के भागने की सूचना मिलती है तो वे अवाक रह जाते हैं। घर में तूफ़ान मचता है  कि आख़िर इस उम्र में पापा को भागने की क्या सूझी और  कौन हैं ये मिस आलू वाली यानी मिस  अहलूवालिया  जो हमारे सीधे-सादे  पापा पर डोरे डाल रही हैं। दोनों बच्चे जो भले ही अपनी पसंद से शादी कर चुके हैं लेकिन पापा के किसी के साथ होने की बात से वे भी उसी पारंपरिक सोच पर चलने लगते हैं कि हाय इस उम...

क्यों हो 'आप' के लिए मातम

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भला   क्यों होना चाहिए आप के लिए मातम? उसके कुछ सांसद थे, पार्टी में जी नहीं लगा, चले गए। अब नए  चमकदार भविष्य के साथी होंगे। सत्ता का पूरा-पूरा लुत्फ़ लेंगे। क्या हुआ जो कभी वंचितों के अधिकारों और मूल्यों की राजनीति की क़सम खाई थी। जिन आदर्शों और आम आदमी का ज़िक्र करते थे,उसे  ख़ाक कर गए। मक़सद सत्ता में बने रहना था, मलाई खानी थी सो चले गए। जिस पार्टी में गए हैं ,वहां से तो खंभा  भी  चुनाव जीत जाता है। पहली बार विधायक बने भी, मुख्यमंत्री (राजस्थान) बन जाते हैं और कभीकभार तो चुनाव जीते बिना भी। यूं भी जनमत की  परवाह  किसे है। ये तो कुछ बूढ़े विशेषज्ञ, पुरानी राजनीति को बंदर के मरे हुए बच्चे की तरह अपनी  छाती से चिपकाएं रहते हैं और बड़बड़ाते रहते हैं। अब तो खुल के तोड़फोड़,सरकारी एजेंसियों के निर्मम इस्तेमाल और चुने हुए प्रतिनिधियों को उड़ा ले जाने का दौर है। भारतीय राजनीति में चला कांग्रेस मुक्त भारत का नारा अब विपक्ष विहीन भारत की ओर चल पड़ा है। हमने लोकतंत्र को लीकतंत्र बनाने के तमाम हथियार ढूंढ लिए हैं। चुनाव जीतो किसी और दल से, शामिल हो जाओ किसी और दल में...

क्यों हुई हार और मचा हाहाकार

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सरकार का एक पैटर्न है। जब सब-कुछ निर्धारित और सुनियोजित  तरीक़े  से होता है तो वह कमाल का प्रभाव छोड़ती है और जहां कहीं कोई मामला या मुद्दा अचानक सामने आ जाता है, वह गहरी चुप्पी साध लेती है। फिर चाहे वह किसी देश के नेता के लिए अचानक शोक व्यक्त करना ही क्यों ना हो, उसे काफ़ी समय लगता है। अब यह सोच लेना कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम  के साथ नत्थी परिसीमन विधेयक के पारित ना हो पाने की आशंका सरकार को नहीं रही होगी, ऐसी मासूमियत पर फ़िदा हो जाना ही बेहतर है। अचानक बुलाए सत्र में यह तयशुदा नतीजा था क्योंकि इसके बाद से ही  प्रधानमंत्री, सरकार के बड़े मंत्री, मुख्यमंत्री पार्टी का महिला मोर्चा जिस तरह मोर्चा खोले नज़र आए वह सब स्टेज शो की तरह लगता है और बड़ी तैयारी को ज़ाहिर करता है। बिल को परिसीमन से जुड़े 131 वें संविधान संशोधन से ना जोड़ महिला आरक्षण के विरोध से जोड़ने के विपक्ष को हर तरह से घेरने के प्रयास जारी हैं। फिर क्या जानबूझ कर ऐसी ही पटकथा रची गई ?  सच है कि कोलकाता चुनाव कवरेज के लिए गईं महिला रिपोर्टरों तक का अपना अनुभव रहा है कि यहां उत्तर की तरह देर रात सड़कों पर अकेले...

धार्मिक मामलों में ना उलझे अदालत?

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इस समय भारत के सुप्रीम कोर्ट में बड़ी बहस जारी है कि धार्मिक आस्था मूलभूत अधिकारों का हनन नहीं कर सकती, तब क्या धर्म के मामलों में न्यायालय निर्णय ले सकता है? इस बहस को जन्म दिया हैं सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर महिलाओं के हक़ में आए फ़ैसले ने।  सबरीमाला मामले में सर्वोच्च अदालत का फ़ैसला अक्टूबर 2018 में आया था। पांच जजों की पीठ में से चार ने कहा था कि मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित नहीं किया जा सकता। केवल एक जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा था कि धार्मिक मामलों को तय करना कोर्ट का काम नहीं है जब तक कि यह सति प्रथा जैसी कोई सामाजिक बुराई न हो। उनका मानना था कि सबरीमाला मंदिर को अपनी व्यवस्था कायम रखने का अधिकार भारत का संविधान (आर्टिकल 25) देता है और इसे आर्टिकल 14 जो की समानता का अधिकार सुनिश्चित करता है, उसकी कसौटी पर नहीं परखा जा सकता। उनका यह भी मानना था कि इस फ़ैसले के दूरगामी परिणाम होंगे। तब यह मामला दस साल बाद अपने निर्णय पर पहुंचा था और बेशक़ यह आधी आबादी को उसके हक़ हासिल होने का बड़ा अवसर था लेकिन इस निर्णय का विरोध भी हुआ।  मामला रिव्यु पेटिशन के बाद 20...