शर्म तुमको नहीं आती मगर


अगर सियासत शतरंज का कोई खेल है तो फिर इन दिनों किसके पासे लगातार सही पड़ रहे हैं और कौन है जिसके तमाम पासे तो हमेशा सही पड़े लेकिन अव्यवस्थाओं का पिटारा ऐसा खुला कि अब रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है? देश में हादसे, अपराध, किशोरों की परीक्षाओं और पेपर लीक का तो जैसे अंतहीन सिलसिला चल पड़ा है। कोई भी सरकार ख़ुद को इस हालत में देखना पसंद नहीं करती लेकिन ये तो किसी ज्वालामुखी के पिघले लावे सा सतह पर आता जा रहा है ? ये किशोर जो शायद ही कभी इतने मुखर हुए हों, तकलीफों से इस कदर घिर गए कि बोलने के सिवाय उनके पास कोई चारा  नहीं रहा। वे आगे आकर व्यवस्था के छेद सरकार को दिखा रहे हैं, सवाल पूछ रहे हैं लेकिन कोई इस गड़बड़-झाले की ज़िम्मेदारी नहीं ले रहा। तीन  किशोरों ने शिक्षा महकमे को सीधे आइना दिखाया लेकिन वे अब भी अपनी छवि पर मुग्ध हैं। उससे एक बात तो बिलकुल साफ़ हो गई हमारे देश में  शिक्षा अब भी ऊंची प्राथमिकता हासिल नहीं कर पाई है। बजट तो न्यूनतम है ही,व्यवस्था भी दो कौड़ी की साबित हो रही है। 

 


बारहवीं कक्षा के लिए पेपर जांच की समूची व्यवस्था को जिस जल्दबाज़ी में  ओएसएम  यानी ऑन-स्क्रीन मार्किंग के हवाले किया गया, उसमें कई खामियां सामने आ रही हैं। इसके बेहद असुरक्षित और अन्यायी होने की पोल किसी शिक्षाविद,मीडिया या विपक्ष ने नहीं बल्कि प्रतिभाशाली बच्चों ने खोली है । समर्थ सिद्धांत(17),वेदांत श्रीवास्तव
(17) और निसर्ग अधिकारी(19) का व्यवस्था के दावों पर ऐसा प्रहार था कि जानते हुए भी चुप रहने वाले अपने ही डर और शर्म में गड़ गए। इन तीन बच्चों की मेहनत को सलाम है कि जब बड़े चुप लगा गए, इन्होंने आवाज़ बुलंद की। इन्होंने बताया कि सिस्टम में घुसकर आंसर शीट स्कैन की जा सकती हैं। यहां  तक कि टेंडर देने में भी फर्जीवाड़ा हुआ है । टेंडर जिसे दिया गया उसका रिकॉर्ड तेलंगाना में छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ का रहा है।  कंपनी के प्रावधानों में से ब्लैकलिस्ट की शर्त हटाई गई, जुर्माने की शर्त ज़रूर बरकरार रखी गई।पहली बार लागू हुए सीबीएसई के इस ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम में 11 .2 लाख कॉपियां पुनर्मूलयांकन के लिए आई हैं जो और बढ़ सकती है यानी ये फ्लॉप रेट लगभग चालीस फीसदी तक पहुंच सकता है। कई छात्रों की शिकायत है कि उनके पुनर्मूल्यांकन की रिक्वेस्ट ही सिस्टम नहीं ले रहा है। 

सवाल यही है कि जब बड़ों ने मारे डर के आंखें बंद कर ली, इन बच्चों में साहस कहां से आया ? जवाब में सार्थक बेहद साफ़ शब्दों में कहते हैं - "नहीं मुझे ज़रा भी डर नहीं लगता और इसकी वजह है मेरी परवरिश।" माता -पिता दोनों ही कंप्यूटर इंजीनियर थे और दोनों का विवाह अंतर्जातीय था।पिता का देहांत हो गया जब वह दसवीं में पढ़ रहा था। उसके बाद परिवार बोकारो से रांची आ गाया। तब ही से उसे लगा कि आप एक कंपनी(बोकारो स्टील प्लांट ) के बनाए शहर की बजाय उस लोकतांत्रिक सेटअप में ज़्यादा बेहतर महसूस करते हो जहां एक पार्षद, महापौर और विधायक होता है।सार्थक का कहना है मेरी कोशिश होती है कि नागरिक के लिए बुनियादी और ज़रूरी मुद्दों में तकनीक का सही इस्तेमाल कैसे हो।


ताबड़तोड़ लागू नई व्यवस्था से आए नतीजों में यह भी सामने आया कि नाम किसी और का है, उत्तर पुस्तिका किसी और की सामने आ रही है। छात्रों में फैले रोष के बाद खामियां दुरुस्त करने की बजाय सीबीएसई के अधिकारियों ने दिल्ली के स्कूलों में प्राचार्यों को फ़ोन किए कि ओएसएम  की तारीफ़ करें सोशल मीडिया पर रील बनाएं। सीबीएसई का कहना था कि यह पूरी तरह से मानवरहित डिजिटल सिस्टम में तब्दील होगा और तमाम क्लरिकल गड़बड़ियों से मुक्त भी लेकिन छात्रों के अंकों में जिस तरह से गड़बड़ियां सामने आई हैं यह तादाद बहुत बड़ी है। आख़िर क्यों हड़बड़ी में इस नए तरीके की जांच को लागू किया गया जो खामियों से भारी हुई है? बच्चों के भविष्य को इतने हलके में लेने कि हिमाकत किसकी थी। क्या शिक्षा मंत्री के बिना ही केवल सीबीएसई अध्यक्ष और सचिव ने ही यह डील कर डाली? शिक्षा मंत्री की भूमिका पर चुप्पी क्यों है।चचा ग़ालिब ने ऐसे ही मौकों के लिए शेर कहा है - क़ाबा किस मुंह से जाओगे 'ग़ालिब' /शर्म तुमको मगर  नहीं आती।  दरअसल मिर्ज़ा ग़ालिब का यह शेर इंसान की बेशर्मी को दर्शाता है कि अपनी गलतियों और कमियों को जानने के बाद भी उसमें लज्जा या पछतावे की भावना नहीं है।


हमेशा अपने तर्कों से धुर्रे बिखेर देने वाला सत्तापक्ष, इन छात्रों के आगे चुप था। व्यंग्य से लोग यह भी कह रहे हैं कि आख़िर चुनाव जीतने वाले किन्हीं काबिल हाथों को ही यह ज़िम्मेदारी क्यों नहीं सौंप दी जाती। नीट, सीयूईटी  सीबीएसई, हर कहीं छात्र क्यों परेशान हैं? देश के भविष्य की चिंता में, देश का भविष्य अब सामने आ गया है । यह कोई पॉलिटिकली सिखाई-पढ़ाई रणनीति नहीं बल्कि सीधे-सपाट तरीके से सिस्टम के बेहद कमज़ोर हो जाने की कहानी है। कोई दल नहीं, कोई मीडिया नहीं सिर्फ सीबीएसई सिस्टम के सुरक्षित ना होने की बात। जैसा की होता आया है सिस्टम के ख़िलाफ़ बोलो देशद्रोही,पाकिस्तानी और डीप स्टेट एजेंट का ठप्पा पाओ। अफ़सोस इन बच्चों को भी नहीं बख़्शा गया। दूरदर्शन के एक पत्रकार ने ही इन छात्रों पर भी यही  इलज़ाम मढ़ दिया। कुछ चरण मीडिया के एंकर उन ट्यूबर्स को ही दो कौड़ी का बताने लगे जिन्होंने  छात्रों  से हमदर्दी दिखाई थी। डिफेंड करने का ऐसा अंधा जूनून की बच्चे भी नहीं बचे । शुक्र है कि यह शिक्षा प्रणाली प्राणहीन रोबो की फ़ौज तैयार करती, इससे पहले ही ये जीवंत छात्र  सामने आ गए। 

और अब उस पार्टी की बात जिसके पासे अर्से बाद कुछ सही पड़ते नज़र आ रहे हैं। केरल में मुख्यमंत्री का चयन,कर्नाटक में आधी दूरी तक चल कर आने के बाद मुख्यमंत्री का इस्तीफ़ा और फिर नए का उनके चरण छूकर आशीर्वाद लेना। यकीन नहीं होता कि यह वही पार्टी है जिनके  राजस्थान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों ने ऐसा करने से इंकार कर दिया था और बाद में 2024 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस हार गई। अशोक गहलोत ने तो बगावत कर के ही पद कायम रखा था हालांकि विधायकों का समर्थन तो उन्होंने जुटा लिया था और राजस्थान के लिए कांग्रेस के अध्यक्ष पद का चुनाव में हिस्सेदारी भी ठुकरा दी थी। अब जो पासे  और सही चले तो मल्लिकार्जुन खड़गे के कार्यकाल के बाद कर्नाटक पूर्व सीएम सिद्धारमैया कमान संभाल सकते हैं। पिछले चुनाव में शशि थरूर फैक्टर दिलचस्प था। उसके बाद से वे पार्टी में पुरानी जगह हासिल नहीं कर पाए हैं। रस्म अदायगी के लिए देखते हैं इस बार कौन आगे आता है ?






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