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ये तो खिरते ही जा रहे हैं!

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ये तो यों  खिर रहे हैं ज्यों गुलाब के फूल का समय पूरा होने पर उसकी  पंखुड़ियां खिरा करती हैं या फिर पेड़ के पीले पात जो अपने अंतिम वक्त में उसका साथ छोड़ देते हैं। इनका पतन चौंकाने वाला है, अप्राकृतिक है क्योंकि ये समय से पहले ही झड़े जा रहे हैं। जैसे कोई विष पी लिया हो या कोई तूफ़ान झेल लिया हो। किस-किस का नाम लें।  इनमें तो जैसे गिरने की होड़ लगी है। निर्लज्ज ऐसे कि पनपे कहीं और गिर कहीं ओर रहे हैं। शिवसेना,एनसीपी (नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी),आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने तो झड़ने के  पुराने  सारे  रिकॉर्ड ही तोड़ दिए हैं। तृणमूल को  एक हार क्या मिली इसके तिनके ही मूल से बिखर गए। ये पार्टी तो इस कदर ईमानदार साबित हुई  कि पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने के लिए इनकी ज़रूरत ही नहीं थी, फिर भी टूट गई । टूटने-बिखरने के लिए ऐसा अभूतपूर्व उत्साह कभी देखने को नहीं मिला है। ये तृणमूल वाले ही थे जब संसद में प्रधानमंत्री का भाषण होता था तब सबसे ज़्यादा नारे लगाते थे, सबसे ज़्यादा लामबंद होते थे। इनकी  नारेबाज़ी  इतनी सुरीली होते थी कि ...

अजमेर में 'संभल'ना होगा

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उत्तरप्रदेश के संभल में चार भारतीय नागरिक मारे गए। कोई भी जांच या बातचीत केवल यह मानकर शुरू क्यों नहीं हो सकती। इस हिंसा को समुदाय के नज़रिये से क्यों देखा जाना चाहिए ? नहीं देखा जाएगा क्योंकि ऐसे तटस्थ रवैये में वह कवरेज कहां जो गर्मागर्म मुद्दों को लपक ले। शाम की हिंसक बहस फिर कहां होगी ? मंदिर -मस्जिद विवाद में घेरना ही तो मक़सद है। मन्टो की कहानियों को जैसे फिर ज़िंदा करना है जिनमें बंटवारे के बाद कई बेगुनाह मारे गए थे ,कई विक्षिप्त हो गए थे। तब फिरंगी हुकूमत थी। वे जाते-जाते देश तोड़ गए। अपने हिसाब से इतिहास लिखवाया ताकि नफ़रत दोनों और उफनती रहे  अब इस दौर में उन दस्तावेजों को सामने लाया जा रहा है जो उनके मुलाज़िमों ने लिखे। तब क्या देश  फ़िरंगी सरकार से लड़ने वाले शहीदों को अब भुला चुका है। वक़्त का पहिया ऐसे भी घूमेगा कि अब हमारे नायक बदलने लगेंगे? अब क्यों  सबकुछ  नए  सिरे से  खोदने और सद्भावना की जड़ों में खून भेजने की ज़रूरत आ पड़ी है ? अब कौन फायदा लेना चाहता है ? संभल के बाद अजमेर का नंबर लगा दिया गया है।  यह सब तब हो रहा है जब  हिन्दू जाग्रत...