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ऑपरेशन सिंदूर : पक्ष और विपक्ष के बीच बुलंद हुई निर्दलीय आवाज़

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  ऑपरेशन सिंदूर पर लोकसभा में चली सोलह घंटे की बहस जब मंगलवार को पूरी हुई तो साफ़ हो गया कि देश के पास ऐसे धुरंदर नेता हैं जो सरकार की आंख में आंख डाल कर बात करते हैं और सटीक सवाल करते हैं। उधर  सरकार भी भले ही भाग नहीं रही थी लेकिन जवाब देने में उसे भी बड़ी तैयारी और मेहनत और लग रही थी। देश के हर हिस्से से शामिल सांसदों की यह ज़रूरी और अच्छी बहस थी।  फिर भी विपक्ष को शायद इस बात का मलाल हो सकता है कि कुछ जवाब उसे नहीं मिले जैसे पहलगाम में पर्यटकों की सुरक्षा में चूक क्यों हुई ;ख़ुफ़िया तंत्र विफल क्यों रहा ;अमेरिका ने बीच ऑपरेशन में भांजी क्यों मारी ; हमारे कितने लड़ाकू विमान नष्ट हुए और चीन-पाकिस्तान एक मंच पर साथ आने की समझ सरकार को क्यों नहीं हुई। बेशक सरकार ने अपना पक्ष रखने की पुरज़ोर कोशिश की लेकिन बीच -बीच में जब भी देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू का ज़िक्र आ जाता था तो लगता कि सरकार जैसे अब तक किसी नेहरूफोबिया से ग्रस्त है और हर मौके पर उन्हें  किसी ढाल की तरह ले ही आती है। बेशक बंटवारा हमारी दुखती रग है लेकिन हम कब तक उस घाव को हरा रखेंगे, सिर्फ ...

कोई भी कहानी ऐसे अंत के लिए नहीं बनी

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हरेक भारतीय उदास है,हर दिल रो रहा है। जैसे-जैसे देश के हिस्सों में ये दुःख के ताबूत पहुंचे हैं वैसे वैसे ही लोगों के दिल चीत्कार कर रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे समय पीछे लौट जाए और सबकुछ वैसा ही सुहावना हो जाए पहलगाम की ठंडी वादियों की तरह। पत्नी के विलाप का यह दृश्य हृदय तोड़ने वाला है और इस दर्द को जैसे पांच सौ साल  पहले   कश्मीरी शायरा हब्बा ख़ातून (जूनी )लिख गईं थी। विरह में डूबी जूनी ने लिखा था - बल खाती बहती नदियों के मुहाने तक जाउंगी मै तुम्हें  ढूंढ़ते  हुए  विनती-अरदास करती यहां-वहां  डोलुंगी मैं   तुम्हें  ढूंढ़ते हुए/  ढूंढूंगी मैं तुम्हें चमेली की कुंजों में,   मत कहो, दुबारा अब मिलना नहीं होगा। पीले गुलाब के झाड़ों पर फूल मुस्कुरा रहे   मेरी भी कलियां  फूल बनने को कसमसा रहीं, दरसन की प्यासी इन अंखियों को और न तरसा मत कहो, दुबारा अब मिलना नहीं होगा। ओह ऐसा दर्द एक विरहिणी ही लिख सकती है। अब जब यह लहू जमा देने वाली, आतंकी हरकत हो चुकी है,इतना दर्द देश भर में भेजा जा चुका है तब क्या देशवासी ये उम्मीद कर सकते हैं कि कोई कोशिश...

झेलम रो रही है कश्मीरियत के क़त्ल पर

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हां,झेलम अब तक रो रही है, कश्मीरियत के इस क़त्ल पर क्योंकि यही वह नदी है जो कश्मीर की जीवनरेखा है और गवाह है धरती के इस ख़ूबसूरत हिस्से  की भोगी हुई पीड़ाओं की। इसने जाना है कि धरती का स्वर्ग कहलाने के बाद आताताई किस तरह पहले लालची नज़रों से देखते हैं और फिर ख़ूनी वार करते हैं।  इसने देखा है कि शातिरों ने इसके अपने बच्चों के हाथ कैसे बंदूकें थमा दी लेकिन अब इसने चाहा है कि इस बेहद सुन्दर जगह को बहुत बुरी नज़र वालों ने घेर रखा है और अब उनकी शिनाख्त ज़रूरी है।  उस दिन  मंगलवार को झेलम भी ज़ार ज़ार रोई है क्योंकि जिन मासूम बेगुनाहों का खून उसने देखा है, वह उसे भीतर से सुखा दे रहा है। वह नईनवेली दुल्हन जो अपने पति के शव के पास बिलख रही है, झेलम उसके दुःख को झेल पाने में नाकाम है। इसे कश्मीरी आवाम ने भी उसी तरह महसूस किया है और यही वजह है कि ग़मज़दा होकर सड़कों पर हैं ,मशाल लेकर विरोध प्रदर्शन  कर रही है। अपने शहर बंद कर रही है। जम्मू से श्रीनगर तक यही भावना है जैसे अभी चुप रहेंगे तो आगे और बड़े गुनाहों  के भागी होंगे । वह गुहार लगा रही है बंद करो, बंद करो यह ख़ूनी हिंसा बंद ...