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बिहार: 'सर' पर क्यों है संदेह

जैसे–जैसे कृष्ण पक्ष का पखवाड़ा अमावस की काली रात की ओर बढ़ता जाता है ठीक वैसे ही बिहार चुनाव में सर(स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न )के काम में भी हर रोज़ कोई न कोई खामी जुड़ जाती है। पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने तो कह भी दिया कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से अनुचित, आक्रामक और जल्दबाज़ी में की गई ऐसी क़वायद है जिसका इस समय किया जाना कतई ज़रूरी नहीं था। सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में भी जारी है क्योंकि पहचान के जो ज़रूरी दस्तावेज़ हैं जैसे  वोटर आईडी ,राशन कार्ड, यहां तक की आधार कार्ड भी इस प्रक्रिया में शामिल नहीं किए गए हैं। अब जो नई मतदाता सूची बनेगी उसके लिए  2003 के बाद शामिल मतदाताओं की गहन जांच होगी। यही रिविज़न है।  प्रशासन पर 30 सितंबर तक इसे पूरा करने का ऐसा दबाव है कि कहीं कहीं  बीएलओ ख़ुद  ही मतदाता के फॉर्म भर रहे हैं और फ़र्ज़ी हस्ताक्षर भी कर रहे हैं। अब सवाल यही है कि क्या चुनाव आयोग नया गृह मंत्रालय है जो नागरिकता के प्रमाण-पत्र  भी बांटेगा। संवैधानिक स्तर पर ही चुनाव आयोग की भूमिका जोड़ने की रही है ,हटाने की नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया है कि आयोग इन पहचान पत्रों...