सुनो मूर्खो ! मनुष्य ही लाया है ग्रन्थ


बीता चौदह अक्टूबर इंसानी सभ्यता के आधुनिक इतिहास में बर्बरता की वह तारीख़ है जब एक प्रवासी बांग्लादेशी जोड़े को मक्का क्षेत्र में मृत्युदंड दे दिया गया। उन पर  इलज़ाम था कि वे पवित्र मस्जिद में एक दूसरे के क़रीब थे। सऊदी कोर्ट ने यह दंड दिया और इससे एक पखवाड़ा पहले वहां के विदेश मंत्रालय ने जेद्दा के बांग्लादेशी वाणिज्य दूतावास को जिन सज़ायाफ्ता कैदियों की एक सूची  थमाई थी उसमें इन्हें फांसी देने का कोई ज़िक्र नहीं था। बांग्लादेश का युवक नज़रूल इस्लाम अब्दुल बशीर साल 2022 में बतौर क्लीनर सऊदी गया था। बाद में उसने सिती (स्वीटी)अख़्तर को भी वहां बुला लिया था। नज़रूल के आगे साइबर या आईटी से जुड़ा अपराध लिखा है जबकि सिती  के आगे व्यभिचार लिखा है। 

मई 2023 में मक्का की मस्जिद से कथित अनैतिक हरकत के लिए सुरक्षा बालों ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया था । तीन साल तक दोनों जेल में रहे। सऊदी के 'पब्लिक डिसेन्सी लॉ' में यह गुनाह ताज़ीर के तहत आता है जिसमें जज ने अपने विवेक के आधार पर सबसे बड़ी सज़ा इन्हें सुनाई । किसी पब्लिक ट्रायल का कोई हवाला भी यहां नहीं मिलता है। ठीक ऐसी ही सज़ा  श्रीलंका के दो नागरिकों को भी हुई थी लेकिन उनकी सरकार ने उन्हें बचा लिया। 

ये अजीब और दुखद है कि इस दौर में किसी जोड़े को इसलिए मौत के घाट उतार दिया जाए क्योंकि वे इबादत की जगह पर प्रेम में थे। कुछ इसे अनैतिक हरकत का नाम भी दे सकते है। नज़रिया केवल देखने भर का है। मारने वालों को किस बात से तकलीफ़ हुई ? क़ुरबत से या ये जिस पाक जगह वे थे इससे? अगर जो मक़सद जगह की पवित्रता नष्ट करने से है, तब भी सज़ा बहुत ज़्यादा है। ऐतराज़ क़रीब होने से है तो फिर अपने वजूद से भी होना चाहिए। जगह तो उस सर्वशक्तिमान की है फिर सर्वोच्च न्याय का हक़ भी उसी को है। बंदों को जान लेने का हक़ कैसे हासिल हुआ? तब क्या ऐसे तमाम निर्णय अपना डर ,दबदबा और सत्ता क़ायम करने की साज़िश है ? माना लिया  कि मुल्क़ का क़ानून हैं लेकिन जिन्हें आपने मौत की सज़ा दी, वे विदेशी हैं। उन्हें एक मौका मिलना चाहिए था। 

लगभग 33 लाख बांग्लादेशी नागरिक वहां मेहनत-मजदूरी का काम कर के इस देश को चलाते हैं। टिप्पणीकार इमरान बेग लिखते हैं -'जहाँ भी लोकतंत्र नहीं है जैसे कि ज़्यादातर इस्लामिक देशों में नहीं है, वहां अब भी सामंती बादशाहत कायम है। वहां वही कबीलाई संस्कृति का राज चलता है। क्रूर और अन्याय पूर्ण न्याय व्यवस्था जिसे धर्म के  नाम पर स्थापित किया गया है।'  इन्हें  भी अपनी आज़ादी के लिए एक बड़े आंदोलन की ज़रूरत है। ये नहीं जानते कि एक ग़रीब देश के युवा जब अपना देश छोड़ते हैं तो परिवार के आंसू,संघर्ष,दर्द सब-कुछ उनके  सामान में बंध कर चला आता है।कोई देश इस गरीबी का इस्तेमाल अपने युद्ध में करता है तो कोई धाक जमाने में।  इस्लाम नज़रूल के पिता का दर्द सुनिए जो कह रहे थे कि मौत की सज़ा से दो दिन पहले उसका फ़ोन आया था और वह मेरी तबियत पूछ रहा था अपने बारे में उसने कुछ नहीं बताया। वह उनके चार बच्चों में सबसे बड़ा था।


सवाल यही है कि अगर जो यह अपराध था भी तो क्या इस जोड़े को यूं मारा जाना चाहिए था? ये क़त्ल से कैसे अलग है? इस क़बीलाई मानसिकता की पैरवी में जो तर्क गढ़े जा रहे हैं उनके मुताबिक दुनिया में कुछ देशों में तय मात्रा से अधिक ड्रग्स पाए जाने पर मृत्युदंड है,सबरीमाला मंदिर में माहवारी महिलाओं को भी घुसने की इजाज़त नहीं है,उच्चतम न्यायलय के फैसले को भी ठुकरा दिया गया,दही-हंडी की ऊँचाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी नहीं माना गया,ऐसे ही जली कट्टू को भी परंपरा के तहत जारी रखा गया और ऐसे सो-काल्ड इस्लामॉफ़ोबिक मेरिटधारी लोग पवित्र मस्जिद में यौनाचार को भी जस्टिफाई कर रहे हैं। 

क्या वाकई इन सबकी तुलना इस मृत्युदंड से की जा सकती है? इंसान के जज़्बात और भावावेश की तुलना इन सबसे कैसे की जा सकती है? आवेश जो बंद कमरे में सही, जगह विशेष पर अपराध उसके लिए फांसी (या सर कलम)दे देना बर्बरता नहीं तो क्या है ?  दोनों में से किसी ने भी जबरदस्ती का भी कोई आरोप नहीं लगाया था। ड्रग्स,साइबर ठगी,आतंकवाद,हत्या जैसे जुर्म बेशक़ बहुत संगीन हैं लेकिन उन पर सुनवाई के साथ किसी नतीजे पर पहुंचा  जा सकता है। नैतिक -अनैतिक  के आधार, हर समाज में अलग हैं। यूरोप में जो आम है, दक्षिण एशियाई और अरब देशों में नहीं। इन्हें विदेशियों पर लागू नहीं किया जा सकता। इन्हें इनके देश वापस भेजिए,दोबारा आने मत दीजिये। मृत्युदंड जिस पर तो कई देशों में रोक है और अन्य सभ्य समाज भी लगातार विचार कर रहे हैं कि जिस ज़िन्दगी को इंसान दे नहीं सकता,उसे लेने का क्या हक़ है।ट्रायल में एक फ़ीसदी की गलती भी रह गई तो जान दोबारा नहीं लौटाई  जा सकती। 

ऐसा नहीं है कि देश के कायदे कभी टूटे ही ना हों । फुटबॉल खिलाड़ी रोनाल्डो यहां गर्लफ्रेंड के साथ दिनों,महीनो नहीं बल्कि तीन साल तक रहे थे, जबकि बिना शादी के ग़ैर स्त्री-पुरुष का साथ रहना यहां जुर्म है। बांग्लादेश के इस ग़रीब जोड़े के पास ना तो दौलत थी और ना रसूख़। उन्हें तो अपनी   सरकार से भी कोई मदद नहीं मिली। इसके विपरीत श्रीलंका के भी दो प्रवासी युवाओं को ईशनिंदा के तहत मौत की सज़ा सुनाई गई थी जिसमें श्रीलंकाई  सरकार ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इस फ़ैसले को रुकवा दिया। यहां ह्यूमन राइट्स वाच और एमनेस्टी इंटरनेशनल की भी भूमिका रही । 

ताल्लुक़ात बांग्लादेश के भी सऊदी अरब से बेहतर हैं लेकिन वे चूक गए। सरकार या तो आंतरिक मामलों में ही उलझी रही या फिर उन्हें इस सज़ा से कोई एतराज़ नहीं था। श्रीलंका के राष्ट्रपति  ने तो बाक़ायदा एक पोस्ट में स्पष्ट किया कि कोई भी नागरिक जो रोज़गार के लिए विदेश गया है वह खुद को कभी अकेला ना समझें। पिछले एक दशक में सऊदी अरब में  दो हज़ार लोगों को फांसी दी गई और साल 2025 में सबसे ज़्यादा 356 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। ये अख़लाक़ और किताब वाले लोग हैं। बांग्लादेश के कवि क़ाज़ी नज़रूल इस्लाम (1899 -1976 )की कविता है -

मनुष्य से घृणा करके

कौन लोग

कुरान, वेद, बाइबल को

चूम रहे हैं बेतहाशा


किताब और ग्रन्थ  छीन लो

जबरन उनसे

मनुष्य को मारकर ग्रन्थ पूज रहा

ढोंगियों का दल

सुनो मूर्खो !

मनुष्य ही लाया है ग्रन्थ

ग्रन्थ नहीं लाया किसी मनुष्य को !


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