ट्रंप के भाषण जैसे चुटकुलों को राशन



इन दिनों कभी-कभी क्यों, रोज़-रोज़ ही अमेरिका वासियों को यह ख्याल आता होगा कि कैसा मस्खरा और जोकर राष्ट्रपति उन्होंने चुन लिया है जो हर दिन हंसeddyने का सामान उन्हें मुहैया करा देता है। हंसते-हंसते पेटदर्द तो आम है लेकिन ये जनाब तो उल्टियां करने पर मजबूर कर देते हैं। इतने विशाल और ताकतवर देश के इस नेता को देख कई छोटे-छोटे देशों  की जनता ख़ुद को भाग्यशाली मान रही है कि ऐसे हैं तो हमारे यहां भी लेकिन इनकी सनक का तो कोई छोर ही नहीं है। हाल ही में जब दुनिया ईरान,ग़ज़ा और यूक्रेन युद्ध से फ्यूल,फ़ूड,फ़र्टिलाइज़र और फाइनेंस (हमारे विदेश मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र की बैठक में भी कहा ) की कमी से भीषण संकट में आ चुकी है, डोनाल्ड ट्रंप अलग ही शब्द-बाण चला रहे हैं।

 युद्ध में दुश्मन को चेतावनी देने के पैंतरे सभी चलते हैं, इन जनाब ने तो ईरान को अपने ही देश के हिस्से ऑफर कर दिए हैं। अपनी जनता को डराने और चुनाव जीतने की ऐसी  उत्कंठा  कि कह दिया -"यह बहुत छोटी कीमत होगी दुनिया को सुरक्षित रखने के लिए,अमेरिका को सुरक्षित रखने के लिए कि बदले में हमें सैन डियेगो और लॉस एंजेलिस जैसे शहर देने पड़े।" इस बयान के बाद कैलिफोर्निया के गवर्नर ने ठीक वही कहा जो वहां की जनता भी कह रही है कि यह मानसिक रूप से विक्षिप्त और दिमागी दिवालियापन का बयान है। ट्रंप के सोमवार को नेम्ब्रसका में कही इस बात के बाद अमेरिकी राजनीति में भले ही नया भूचाल आ गया है लेकिन वहां के स्टैंडप कॉमेडियंस को नया कॉन्टेंट, नया राशन मिल गया है। इस भाषण के बाद तो वाइट हाउस भी सफ़ाई जारी कर-कर के पीला पड़ चुका है और ख़ुद ट्रंप भी कह रहे हैं कि उनका वह मतलब नहीं था।  वे तो कह रहे थे कि ईरान के  पास घातक परमाणु हथियार  हैं और वह हमारे शहरों को निशाना बना सकता है। वैसे अपने अपने शहरों के बाद ट्रंप फ्रांस की सरकार को चुनौती देने में लग गए हैं।  


स्कूली शिक्षा पर फ्रांस में हो रहे प्रदर्शनों और हिंसा को लेकर 80 साल के अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने ट्रुथ  सोशल नेटवर्क पर  लिखा -"फ़्रांस में जो हो रहा है, वह नियंत्रण से बाहर बड़े पैमाने पर हो रहे प्रवासन से कम कुछ नहीं है। यह स्कूलों के बारे में नहीं है, यह इस्लाम के बारे में है जो एक महान देश पर कब्ज़ा करना चाहता है।" पिछले दिनों फ़्रांस में एक किशोर की पुलिस की गोली से हुई मौत के बाद पूरे देश में हिंसा भड़क गई है और गिरफ़्तारियों का दौर जारी है। फ़्रांस के अलग-अलग शहरों में प्रदर्शनकारियों की ओर से भारी आगजनी की घटनाएं हुई हैं, जिसमें कई कारें, सरकारी इमारतें नष्ट हो गई हैं।  इससे पहले ट्रंप के सहयोगी ग्लेन बेक ने सोमवार को एक्स पर लिखा, "फ़्रांस में हो रहे दंगे पश्चिम के बाकी हिस्सों के लिए एक साफ़ चेतावनी हैं। आज फ़्रांस में जो हो रहा है, वह पश्चिम को खत्म करने के लिए काम कर रहे समाजवादियों के एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का हिस्सा है।" दक्षिणपंथी टिप्पणीकार डेव रुबिन ने फ़्रांस के एक रेलवे स्टेशन पर बनाए गए वीडियो के साथ पोस्ट किया, "अगर डेमोक्रेट्स फिर से सत्ता में आते हैं, तो यह अमेरिका में भी होगा। " सिलसिलेवार आते ये बयान इतना तो ज़रूर बताते हैं डर का आतंक फ़ैलाने में इन सियासी सूरतों का कोई मुक़ाबला ही नहीं है। 

नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक मेरी क्यूरी का बहुत प्रभावशाली कथन है -"अब यह समय समझ बढ़ाने का है ताकि हम डर ना सकें।" ट्रंप और उनकी पार्टी चुनाव का सामना कर रही है और एकमात्र आसरा जो उन्हें जीत दिला सकता है ,वह है आम मतदाता में डर और असुरक्षा को पैदा करना। अगर  विरोधी डेमोक्रेट्स सत्ता में आए तो  फिर सबकुछ तबाह हो जाएगा।  रिपब्लिकन्स का हर हमला बस इसे ही पुख़्ता करने के  लिए हो रहा है। सत्ता पाने के लिए इस हद तक डराने और उसके नतीजों को समझने के लिए ज़रूर दुनिया के बड़े विश्वविद्यालयों को शोध करना चाहिए। कैलिफोर्निया के गवर्नर ने एक पोस्ट में लिखा- "कैलिफोर्निया पर सेना भेजने के बाद अब ट्रम्प विदेशी दुश्मनों को कह रहे हैं कि लॉस एंजेलिस और सैन डिएगो को नष्ट कर देना चाहिए। वे एक करोड़ इंसानों पर हमले की वकालत कर रहे हैं।"  वाक़ई यह  हैरान कर देने वाली बात है कि चुनावी जीत के लिए  ये लीडर, दुश्मन देश और कुत्सित सांप्रदायिक ताकतों तक को एडवांटेज दे देते हैं। चुनाव और तनाव का सीधा नाता जोड़ देते हैं। यहां तो उल्टे ईरान ही अपनी सफाई में कह रहा है कि हमें अमेरिकी जनता से कोई शिकायत नहीं, यह युद्ध उनके नेताओं का छेड़ा हुआ है। 



ईरान युद्ध और महंगाई की वजह से ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के कांग्रेस पर नियंत्रण खोने की आशंका है। वाइट हाउस में अपने पहले कार्यकाल के समय से ही यूरोप ट्रंप के निशाने पर रहा है। ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में यूरोप और पश्चिमी संस्कृति के पतन के बारे में चेतावनी देने के मामले में अब  पहले से कहीं  ज़्यादा आक्रामक हो रहे हैं। दिसंबर में जारी अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में कहा गया कि यूरोप को 'सिविलाइज़ेशनल इरेज़र' (सभ्यतागत ख़ात्मे ) का सामना करना पड़ रहा है। उस अमेरिका का ऐसा कहना जो हमेशा से सभ्यता, कला-संस्कृति और मानवीय मूल्य की आज़ादी के लिए यूरोप की ओर ताकता रहा है, अजीब मालूम होता है। अमेरिकी नागरिक आज भी किसी शहर को हसरत भरी निगाहों से देखता है तो वह पेरिस है। 'ऐमिली इन पेरिस ' नाम की सीरीज के कई सीजन का बनना यही बताता है कि वहां के काम करने के तरीकों को लेकर अमेरिका प्रभावित भी है और बदलना भी चाहता है। 

 यूं अमेरिकी राष्ट्रपति के बेहिसाब किस्से ही उनका हिसाब करने के लिए काफ़ी हैं। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में युद्ध रुकवाने का सेहरा बांधते-बांधते वे खुद ही युद्ध में कूद गए। तेल के लिए  वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को ही उठवा लिया। कोलम्बिया ने जब इस हरकत को अपहरण कहा तो उसे भी धमकी दे दी गई थी लेकिन विरोध के लिए जनता सड़कों पर आ गई।  वेनेजुएला शिकार हो चुका है क्योंकि वह अपने तेल का निर्यात डॉलर में ना कर चीनी मुद्रा युआन में कर रहा था। तानाशाही, विस्तारवादी रवैया,मानव अधिकारों का हनन डोनाल्ड ट्रंप के लिए बेकार की बातें हैं असली और आख़िरी खेल केवल तेल का है।  फिर दुनिया के सबसे बड़े द्वीप ग्रीनलैंड को ख़रीदने के इरादे  ज़ाहिर कर दिए । ट्रंप ने कहा कि  शांति से ग्रीनलैंड हमें बेच दो, नहीं तो सेना उसे छीन लेगी। इससे पहले कनाडा को अपना 51 वां राज्य बनाने की मंशा ज़ाहिर की ही थी। भारत समेत कई देशों को तो वे लगातार हड़काते रहते हैं कि आपने मुझे ख़ुश नहीं किया और रूस से तेल ख़रीदना बंद नहीं किया तो अच्छा नहीं होगा। भारत आने वाले एक अमरीकी राजदूत ने  भी रूस से तेल ख़रीदने के जुर्म में पांच सौ फ़ीसदी टैरिफ़ की बात कह दी थी। फिर अचानक कहा कि रूस से तेल खरीदो।  भारत-पाकिस्तान युद्ध रुकवाने का ऐतिहासिक दावा ट्रंप कर ही  चुके हैं। इन्हीं के देश ने भारतीयों  को बेड़ियों में बांधकर अपने देश वापस भेजा था। 

 'प्रिंट डॉलर क्रिएट वॉर' की इस सियासत पर  विदेश मंत्री  जयशंकर प्रसाद ने कहा था -"ऑपरेशन सिंदूर के समय आपने हम पर अंगुली उठाई थी और अब आप जो कर रहे हैं उससे दुनिया किस कदर चिंतित है इसकी परवाह आप नहीं करते। आप अपने क्षेत्र में क्यों नहीं देखते ? अपने से सवाल क्यों नहीं पूछते कि वहां कितनी हिंसा हुई ? " ऐसे तमाम युद्ध पसंद नेताओं ने दुनिया के भीतर उथल-पुथल मचा रखी है। शेष दुनिया की  ग़रीब जनता थोड़े से खाद के लिए हाथा-पाई पर उतर रही है। खाद की कमी से खाद्यान्न महंगा हो रहा है ,ईंधन और गैस का संकट तो है ही। इन बुद्धिहीन लड़ाकुओं को आख़िर शर्म क्यों नहीं आती और क्यों अब भी इनके दाग़ छुपे हुए हैं ? चचा ग़ालिब की मशहूर ग़ज़ल का शेर यूं है -

लोगों को है खुर्शीद -ए -जहां ताब  का धोका 

हर रोज़ दिखाता हूं मैं इक दाग़-ए-निहां और 


खुर्शीद -ए-जहां ताब -संसार को आलोकित करने वाला सूर्य 

दाग़-ए-निहां -छुपा हुआ दाग़ 



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