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क्यों हो 'आप' के लिए मातम

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भला   क्यों होना चाहिए आप के लिए मातम? उसके कुछ सांसद थे, पार्टी में जी नहीं लगा, चले गए। अब नए  चमकदार भविष्य के साथी होंगे। सत्ता का पूरा-पूरा लुत्फ़ लेंगे। क्या हुआ जो कभी वंचितों के अधिकारों और मूल्यों की राजनीति की क़सम खाई थी। जिन आदर्शों और आम आदमी का ज़िक्र करते थे,उसे  ख़ाक कर गए। मक़सद सत्ता में बने रहना था, मलाई खानी थी सो चले गए। जिस पार्टी में गए हैं ,वहां से तो खंबा भी  चुनाव जीत जाता है। पहली बार विधायक बने भी, मुख्यमंत्री (राजस्थान) बन जाते हैं और कभीकभार तो चुनाव जीते बिना भी बन जाते हैं। यूं भी जनमत की  परवाह  किसे है। ये तो कुछ बूढ़े विशेषज्ञ और पुरानी राजनीति को बंदर के मरे हुए बच्चे की तरह अपनी  छाती से चिपकाएं बैठे हैं जो बड़बड़ करते रहते हैं। अब तो खुल के तोड़फोड़,सरकारी एजेंसियों के निर्मम इस्तेमाल और चुने हुए प्रतिनिधियों को उड़ा ले जाने का दौर है। भारतीय राजनीति में चला कांग्रेस मुक्त भारत का नारा अब विपक्ष विहीन भारत की ओर चल पड़ा है। हमने लोकतंत्र को लाकतंत्र बनाने के तमाम हथियार ढूंढ लिए हैं। चुनाव जीतो किसी और दल से, शामिल हो जाओ किसी...