'नीट' नशे में है सिस्टम
ये जो इन दिनों परीक्षाओं के पर्चे लीक हो रहे हैं, ये पर्चे नहीं बल्कि रक्त है देश के युवाओं का जो एक अर्से से लगातार लीक हो रहा है। इस रिसाव के साथ जो भरोसा और आस्था व्यवस्था से डिग रही है, वह भविष्य के संकट के ख़तरनाक संकेत हैं। यह किसी राजनीतिक दल से जुड़ा मसला भर नहीं है। यह तो एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते ही रहेंगे। चिंता इस बात की है कि इन्होंने पूरे देश में घुन लगा दिया है। यह पढ़ने -लिखने वाले बच्चे हैं इसलिए इनका रुदन चीत्कार सड़कों पर नहीं है। यह ऐसा है जैसे किसी ने जानबूझ कर इनके ख़िलाफ़ कोई साज़िश रची हो। कल्पना कीजिये कि व्यवस्था से इस तरह ठगा हुआ, धोखेबाज़ी का शिकार छात्र जब समाज में दाख़िल होगा, तब वह कैसे एक मज़बूत और आत्मविश्वासी नागरिक का प्रतिनिधि होगा? नीट ही नहीं बल्कि अधिकांश सरकारी भर्ती परीक्षाएं कभी भी रद्द हो जाती हैं तो कभी नतीजे देने में ही लम्बा वक्त लगा देती हैं । इंतज़ार में उम्र निकल जाती है और युवा निराश। आज भले ही युवा शक्ति पर देश इठलाता हो,आगे लाख ढूंढने पर भी समझ नहीं आएगा कि आखिर ग़लती कहां हो गई ?
बेहतर होता नीट परीक्षा को जल्दबाज़ी में रद्द करने की बजाय पहले जांच होती क्योंकि गंभीर गड़बड़ियां तो 2024 में भी सामने आई थीं लेकिन तब सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहकर परीक्षा रद्द करने से इन्कार किया था कि छिटपुट घटनाओं से यह साबित नहीं होता कि परीक्षा प्रणाली पूरी तरह से विफल हो गई है ,कोर्ट का तर्क था कि परीक्षा को दोबारा आयोजित करने में योग्य छात्रों को भारी नुकसान होगा। फिर इस बार ऐसा क्या हो गया जो जांच से पहले ही परीक्षा रद्द कर दी गई? अब जो हो रहा है वह मीडिया ट्रायल का तमाशा भर है क्योंकि जो असली सरगना पकड़े गए होते तो इस साल ऐसा नहीं होता। एक गेस पेपर पर परीक्षा रद्द की गई है जबकि इसके सवालों का कुल जोड़ भी कर लिया जाए तब भी परीक्षार्थी को सरकारी सीट नहीं मिलती। प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में दाखिले जितना कट-ऑफ ज़रूर हासिल हो सकता है। इस पूरी प्रक्रिया में यह बिलकुल नहीं भूलना चाहिए कि भारत की डॉक्टर बनाने की इस भर्ती प्रक्रिया में अनाप-शनाप पैसा लगा है। जो कोचिंग कक्षाओं से शुरू होकर दलालों और माफियाओं से भी जुड़ जाता है। हज़ारों अभिभावक हैं जो देश और विदेश में एडमिशन धोखाधड़ी का शिकार हुए हैं क्योंकि सरकारी कॉलेज में दाख़िला 720 में से 600 नंबर के बाद बंद हो जाता है उसके बाद फिर एडमिशन के लिए तमाम चोर रास्ते बनाए जाते हैं। कभी तो ये नए नियमों के नाम पर भी होते हैं। एनआरआई कोटे के नाम पर भरी फीस वसूल कर सरकारी कॉलेजों में कम अंकों पर भी एडमिशन दिया जाता है।
तीन मई को 22 लाख से भी ज़्यादा परीक्षार्थियों ने नेशनल एलेजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट यानी नीट दी थी। उसके चंद घंटो के बाद ही रात के डेढ़ बजे राजस्थान में सीकर के एक कोचिंग क्लास के शिक्षक अपने साथ कुछ पन्ने लेकर पुलिस थाने पहुंचते हैं । इससे पहले उन्हें उनके मकान मालिक ने फ़ोन पर आया एक गेस पेपर दिखाया था जो उन्हें केरल से अपने बेटे के ज़रिये मिला था । ध्यान रहे कि सीकर ज़िला अब कोटा के बाद दूसरा शहर है जहां नीट की तैयारी कराने में कई कोचिंग संस्थाएं जुटी हुई हैं और इनके कैंपस किसी कॉलेज कैंपस की तरह ही बड़े हैं। जिले की साक्षरता दर 75 प्रतिशत से ज़्यादा है और हर घर से अध्यापक,पटवारी,पुलिस और राजस्थान की प्रशासनिक सेवाओं में लोग जुड़े हैं। नया जूनून नीट का है। पढ़ाई का हिसाब ऐसा है कि इससे जुड़ी कोचिंग कक्षाएं आठवीं,दसवीं के बाद ही स्कूल छुड़ा कर अपने यहां पढ़ने के लिए बुला लेती हैं । टॉपर को एक करोड़ रुपए, हेलीकाप्टर यात्रा ,नया घर जैसे इनाम देने की घोषणा होती है। गेस पर्चे पर लौटते हैं। जब कोचिंग के शिक्षक को गेस पेपर मिला तब उन्होंने मिलान किया तो पाया कि 180 में सो 100 के आसपास प्रश्न वही थे जो परीक्षा में पूछे गए थे।पुलिस ने उनसे कहा कि अपनी बात सादे काग़ज़ पर लिख दो। अधिकांश मामलों में अपनी बला टालने के लिए वह यही करती है। शिकायत दर्ज़ नहीं हुई।
उसके बाद शिक्षक ने अपने कोचिंग मालिक के साथ मिल कर 7 मई को एनटीए ( नेशनल टेस्टिंग एजेंसी )को शिकायत लिखी। उन्होंने लिखा कि यह छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है और इसकी किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच होनी चाहिए। इस शिकायत के आधार पर एनटीए ने मामला पहले राजस्थान के एसओजी( स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप) को भेजा और फिर वहां से केंद्र के निर्देश पर जांच सीबीआई को सौंप दी गई और परीक्षा रद्द हो गई। केंद्र ने ही एनटीए का गठन 2017 में इस वादे के साथ किया था कि अब परीक्षाएं स्वतंत्र और बेहतर व्यवस्था के साथ होंगी लेकिन छात्रों की परेशानियों का कोई अंत नहीं हुआ। कभी ज़्यादा अंक तो कभी ग्रेस मार्क्स तो कभी कम समय की शिकायतों और कभी तो परीक्षा के कमरे में बिजली (इंदौर, 2025) नहीं होने के बीच एनटीए परीक्षाएं करता रहा। इससे पहले सीबीएसई इस परीक्षा का संचालन करता था। भूमिका पर लगातार संदेह के बावजूद एनटीए को कभी ज़िम्मेदार नहीं ठहराया गया उल्टे बड़े अधिकारी अन्यत्र बड़ी ज़िम्मेदारियाँ पाते रहे।
अब राजस्थान से कुछ गिरफ्तारियां हुई हैं। तीन तो एक ही परिवार के हैं। परिजनों का कहना है कि ये गिरफ्तारियां तो पहले ही हो चुकी हैं और बड़े लोगों को बचा कर आम आदमी को परेशान किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि इस परिवार में छह बच्चे मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं और वे सीकर में रहकर ही तयारी करते हैं। तर्क ये कि 2024 में इनके 720 में से 332 से 512 के बीच अंक थे और अगले साल उनका चयन हो गया। यही होता है। 12 वीं के साथ पहले साल में छात्र इतने ही अंक लाते हैं। फिर ड्रॉप लेते हैं और चयनित होते हैं। मीडिया सर्कस जारी है लेकिन इन युवाओं की तकलीफ़ का कोई अंत नहीं है। वैसे इन सरकारों का एक पैटर्न है, पर्चे लीक कराने का। राजस्थान तो जैसे युवाओं के धैर्य की कसौटी परखने की प्रयोगशाला ही बना हुआ है। नीट,रीट,कांस्टेबल,वन सरंक्षक,पटवारी, एएसआइ ऐसी ढेरों भर्ती परीक्षाएं हैं जिनके पेपर लीक करा कर परीक्षाएं रोकी गई और फिर सालों तक कोई परीक्षाएं नहीं कराई गईं। राजस्थान समेत हिंदी पट्टी में यही दिखाई दे रहा है। पिछले पांच सालों में 700 गिरफ्तारियां हुई लेकिन सज़ा एक नहीं। गुजरात और महाराष्ट्र भी जब-तब शामिल हो जाते हैं।
चिकित्सा महाविद्यालयों में दाखिले के लिए नीट तो ऐसी परीक्षा है जिसकी कोचिंग से ही अभिभावकों की पहले जेब काटने और फिर मौतों का सिलसिला शुरू हो जाता है। इससे पार पड़े तो एडमिशन का ऐसा गिरोह सक्रिय रहता है कि कई इसके झांसे में आ जाते हैं। प्रतिस्पर्धा का अजीब चक्रव्यूह रचा गया है। देश में प्रतिभाएं ज़्यादा हैं और स्थान ऊँट के मुंह में ज़ीरे जितने भी नहीं। ये जो अकल्पनीय परिणाम आते हैं इसमें भी सिस्टम की मक्कारी देखी जा सकती है। सिस्टम बाजार से मिला हुआ है। सब चूहा रेल में शामिल हो रहे हैं बच्चों को गिनीपिग बना कर। मध्यप्रदेश का व्यावसायिक परीक्षा मंडल घोटाला व्यापम कितने ही लोगों की रहस्यमय हत्या ,आत्महत्या और अन्य अपराधों की खुली कहानी कहता है। उसके बड़े मगरमच्छ सरगना सब बचा लिए गए हैं और छोटी मछलियां आज भी विचाराधीन कैदी बन कर न्याय के इंतज़ार में हैं। इस बार भी यहां-वहां से अपराधी पकड़ कर लाए जा रहे हैं। पहले जांच पक्की करनी चाहिए थी, फिर परीक्षा पर रोक लगना थी । अब 22 लाख बच्चे और उनसे जुड़े परिवार रोज़ इस मीडिया ट्रायल को देखेंगे और उम्मीद करेंगे कि एक दिन सब ठीक होगा। कैसी बेहूदी व्यवस्था में धकेल दिए गए हैं हमारे बच्चे ?
बेहिसाब बेइंतहा यकीन किया तुम पे
तुम्हीं ने कटार का इशारा कर दिया।


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