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क्यों हुई हार और मचा हाहाकार

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सरकार का एक पैटर्न है। जब सब-कुछ निर्धारित और सुनियोजित  तरीक़े  से होता है तो वह कमाल का प्रभाव छोड़ती है और जहां कहीं कोई मामला या मुद्दा अचानक सामने आ जाता है, वह गहरी चुप्पी साध लेती है। फिर चाहे वह किसी देश के नेता के लिए अचानक शोक व्यक्त करना ही क्यों ना हो, उसे काफ़ी समय लगता है। अब यह सोच लेना कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम  के साथ नत्थी परिसीमन विधेयक के पारित ना हो पाने की आशंका सरकार को नहीं रही होगी, ऐसी मासूमियत पर फ़िदा हो जाना ही बेहतर है। अचानक बुलाए सत्र में यह तयशुदा नतीजा था क्योंकि इसके बाद से ही  प्रधानमंत्री, सरकार के बड़े मंत्री, मुख्यमंत्री पार्टी का महिला मोर्चा जिस तरह मोर्चा खोले नज़र आए वह सब स्टेज शो की तरह लगता है और बड़ी तैयारी को ज़ाहिर करता है। बिल को परिसीमन से जुड़े 131 वें संविधान संशोधन से ना जोड़ महिला आरक्षण के विरोध से जोड़ने के विपक्ष को हर तरह से घेरने के प्रयास जारी हैं। फिर क्या जानबूझ कर ऐसी ही पटकथा रची गई ?  सच है कि कोलकाता चुनाव कवरेज के लिए गईं महिला रिपोर्टरों तक का अपना अनुभव रहा है कि यहां उत्तर की तरह देर रात सड़कों पर अकेले...

ऑपरेशन सिंदूर : पक्ष और विपक्ष के बीच बुलंद हुई निर्दलीय आवाज़

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  ऑपरेशन सिंदूर पर लोकसभा में चली सोलह घंटे की बहस जब मंगलवार को पूरी हुई तो साफ़ हो गया कि देश के पास ऐसे धुरंदर नेता हैं जो सरकार की आंख में आंख डाल कर बात करते हैं और सटीक सवाल करते हैं। उधर  सरकार भी भले ही भाग नहीं रही थी लेकिन जवाब देने में उसे भी बड़ी तैयारी और मेहनत और लग रही थी। देश के हर हिस्से से शामिल सांसदों की यह ज़रूरी और अच्छी बहस थी।  फिर भी विपक्ष को शायद इस बात का मलाल हो सकता है कि कुछ जवाब उसे नहीं मिले जैसे पहलगाम में पर्यटकों की सुरक्षा में चूक क्यों हुई ;ख़ुफ़िया तंत्र विफल क्यों रहा ;अमेरिका ने बीच ऑपरेशन में भांजी क्यों मारी ; हमारे कितने लड़ाकू विमान नष्ट हुए और चीन-पाकिस्तान एक मंच पर साथ आने की समझ सरकार को क्यों नहीं हुई। बेशक सरकार ने अपना पक्ष रखने की पुरज़ोर कोशिश की लेकिन बीच -बीच में जब भी देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू का ज़िक्र आ जाता था तो लगता कि सरकार जैसे अब तक किसी नेहरूफोबिया से ग्रस्त है और हर मौके पर उन्हें  किसी ढाल की तरह ले ही आती है। बेशक बंटवारा हमारी दुखती रग है लेकिन हम कब तक उस घाव को हरा रखेंगे, सिर्फ ...

देश को एक ही फ्रेम में फिट करने की मनमानी !

ऐसा लगता है जैसे देश पर राज करने वालों ने अपने लिए एक फ्रेम बनवा ली  है और फिर देश को हर हाल में उसी फ्रेम में फिट करने की ज़िद है, बिना इस बात की परवाह किये कि उनकी इस कोशिश में उसका मूल तत्व ही फ्रेम से छिटक रहा है,कट रहा है ,टूट रहा है । यकायक यह कोशिश और तेज़ हो गई है जैसे किसी राजा को यकीन दिला दिया गया हो गया हो कि ऐसा ना हुआ तो अनर्थ हो जाएगा। बेचैनी इन दिनों इस कदर बढ़ी है कि नागरिकों में  डर बैठाया जा रहा है, खेमे बनाए जा रहे हैं। बस एक ही कोशिश कि बांटों बांटो और बांट दो। देश के कुछ हिस्से हिंसा की चपेट में हैं ,निर्दोष नागरिक मर रहे हैं लेकिन चिंता बस फ्रेम की है। यह चिंता इतनी सघन और स्वनिर्मित है कि देश की जनता को मूल खतरों से आगाह ही नहीं किया जा रहा है। दुनिया की नई उथल-पुथल के बीच आर्थिक खतरों और मंदी की आशंका से देश को मज़बूत करने की बजाय वह अफीम दी जा रही है, जिसमें देश सब दर्द भूलकर बस नारे लगाने लगता है। नेताओं को यह दंदफंद अब रास आ गया है। यह झूठ है तो फिर क्यों एक तरफ़ तो हवाई अड्डे का शिलान्यास होता है और दूसरी ओर वह बात छेड़ दी जाती है जिस पर जब बहस हुई तो सद...