ओ स्त्री पहले सीटें बढ़ाएंगे फिर आरक्षण देंगे


सरकार का एक पैटर्न है। जब सब-कुछ निर्धारित और सुनियोजित  तरीक़े  से होता है तो वह कमाल का प्रभाव छोड़ती है और जहां कहीं कोई मामला या मुद्दा अचानक सामने आ जाता है तब वह गहरी चुप्पी साध लेती है या गड़बड़ा जाती है। फिर चाहे वह किसी देश के नेता के लिए अचानक शोक व्यक्त करना ही क्यों ना हो, उसे काफ़ी समय लगता है। अब यह सोच लेना कि नारी वंदन विधेयक के साथ नत्थी परिसीमन विधेयक के पारित ना हो पाने की आशंका सरकार को नहीं रही होगी ऐसी मासूमियत पर फ़िदा हो जाना ही बेहतर है। अचानक बुलाए सत्र में यह तयशुदा नतीजा था क्योंकि इसके बाद से ही प्रधानमंत्री,सरकार के बड़े मंत्री,मुख्यमंत्री पार्टी का महिला मोर्चा जिस तरह विपक्ष को घेर रहे हैं, वह बड़ी तैयारी को ज़ाहिर करता है। बिल को परिसीमन से जुड़े 131 वें संविधान संशोधन से ना जोड़ महिला आरक्षण के विरोध से जोड़ने के हर प्रयास जारी हैं । फिर क्या जानबूझ कर ऐसी ही पटकथा रची गई ? 

उत्तर बनाम दक्षिण अब बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है। 24 घंटे चुनावी मोड में रहने वाली पार्टी के सामने अब भी दो राज्यों तमिलनाड़ु और पश्चिम बंगाल के चुनाव शेष हैं और रसोई गैस की क़िल्लत के साथ देश में महंगाई का ग्राफ भी बढ़ा है। पश्चिम बंगाल के चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को यह कहकर कोसना की ममता दीदी की पार्टी स्त्री विरोधी है,चुनावी चौसर को जमा सकता है। वह तृणमूल कांग्रेस जिसके पास सर्वाधिक महिला सांसद और विधायक हैं और वो बंगाल जो स्त्री अस्मिता को महत्व देता आया है वहां महिला कार्ड के चल जाने की पूरी उम्मीद पार्टी को रही होगी। सरकार परिसीमन विधेयक से पहले जिस मदमस्त हाथी की चाल से चल रही थी,विधेयक गिरते ही विपक्ष को भ्रूणहत्या,पाप और दंड का भागी बताने लगी। स्वयं प्रधानमंत्री ने इन शब्दों का प्रयोग राष्ट्र के नाम अपने सम्बोधन में किया। वे वहां अपने समय का इस्तेमाल राष्ट्र की जनता को यह बताने के लिए कर रहे थे कि ये पार्टियां किस कदर दोषी हैं। इस तात्कालिक चुनावी लाभ में एक नई आशंका उत्तर बनाम दक्षिण के बीच खाई के बनने की भी उभर आई है। सियासी दलों को छोड़ भी दिया जाए लेकिन इसका ज़िक्र तमाम लेखक और विश्लेषक करने लगे हैं।  



यह सच है कि कोलकाता चुनाव कवरेज के लिए गईं महिला रिपोर्टरों तक का अपना अनुभव रहा है कि यहां उत्तर की तरह देर रात सड़कों पर अकेले होने में डर नहीं लगता। भारत के दोनों हिस्सों में घूमने वाली स्त्रियां जानती हैं कि सुरक्षा का अंतर कैसा है। ख़ैर विपक्ष के ख़िलाफ़ यह नैरेटिव कितना कामयाब होगा और क्यों भारतीय जनता पार्टी के तमाम पदाधिकारी और मीडिया इस बिल को महिला आरक्षण विधेयक से ही जोड़ रहे हैं जबकि बिल तो सर्वसम्मति (विरोध में केवल दो मत थे )से 2023 में ही पारित हो चुका है।  सीटें बढ़ेंगी तब ही महिलाओं को सीटें देंगे यह भी करना था तो तमाम दलों और दक्षिण के राज्यों को विश्वास में क्यों नहीं लिया गया? महिला आरक्षण की कहानी सीधी -सी थी कि 543 में से 33 फ़ीसदी यानी लगभग 180 सीटें उन्हें दे दी जानी चाहिए थी लेकिन सरकार ने जो खेल खेला उसमें शर्त लाद दी कि ये 33 प्रतिशत तभी देंगे जब हमारे पास 850 होंगी। अब 850 में से से 33 प्रतिशत के हिसाब से 280 महिला की और 570 पुरुष की हो गई। ऐसे में महिला सीटों की संख्या बढ़ी 100 और पुरुषों को फ़ायदा हुआ 200 सीटों का। तब क्या पुरुषों को दो सौ सीटें देकर ही महिलाओं को उनका हक़ देना था। यह तो आरक्षण नहीं त्याग हुआ। हर पार्टी चतुराई का खेल खेलती है, उसमें कोई बुराई भी नहीं है लेकिन इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर जहां संविधान में संशोधन के बाद  बुनियादी नीति ही बदलने वाली है, पारदर्शिता की उम्मीद जनता और विपक्ष दोनों को रहती है। विपक्ष यहाँ एक हो गया। प्रति दस लाख पर एक सांसद के चुने जाने से दक्षिण के नेता बिफर गए। उनका साफ़ कहना है कि कम बच्चे और हर बच्चे को शिक्षा देने की नीतियों का नुक़सान इस रूप में होगा तो यह रूप उन्हें कतई मंज़ूर नहीं। दक्षिण के  केरल,तमिलनाडु,तेलंगाना,कर्नाटक और आंध्रप्रदेश जैसे राज्यों में न तो भाजपा की सरकारें हैं और लोकसभा की सीटें भी यहाँ से कम हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने चेतावनी दी है कि इससे आंदोलन भड़क सकता है। उनके दिए हाइब्रिड मॉडल की भी चर्चा है जिसके मुताबिक जनसंख्या और आर्थिक तरक्क़ी के हिसाब से राज्यों का प्रतिनिधित्व लोकसभा में हो। इस दौर में 1971 की वह सोच व्यावहारिक भी नहीं लगती कि सांसद जनता के क़रीब हो क्योंकि तकनीक ने यह अवधारणा ख़त्म कर दी है। सीटें बढ़ाने पर भी पुनर्विचार ज़रूरी है और ज़रूरी है मतदाता के बीच आर्थिक योजनाओं का पहुंचना। जनप्रतिनिधि के तौर पर सरपंच और पार्षद उसके ज़्यादा निकट हो सकते हैं। उनकी शक्तियां बढ़ाई जा सकती हैं 


 हर कीमत पर अपने प्रतिद्वंदी से वोट लेने की सियासत अब जनता से  छिपी नहीं रह गईं है फिर एक के बाद तोतेनुमा बयान भी इसे उजागर कर रहे हैं कि जो गिरा वह महिलाओं को आरक्षण देने का विधेयक नहीं बल्कि परिसीमन विधेयक था और इसे लागू नई जनगणना के बाद होना था। साल 2001 में अरुण जेटली कानून मंत्री थे। उन्होंने अपने भाषण में कहा था कि 2026 तक परिसीमन को  इसलिए रोका जाना चाहिए क्योंकि कई राज्य हैं जिन्होंने सफलतापूर्वक परिवार नियोजन के कार्यक्रम को लागू किया है। अगर ये लागू हुआ तो संसद में इनका प्रतिनिधित्व घट जाएगा और जो राज्य इसे लागू करने में सफल नहीं हुए उनकी सीटें बढ़ जाएंगी। राजनीतिक विश्लेषक सुहास पल्शिकर अपने लेख में लिखते हैं कि यह परिसीमन दक्षिण के साथ केंद्र सरकार के तालमेल के लिए कड़ी चुनौती होगा। महिला आरक्षण बिल की आड़ में इस नए परिसीमन को लागू करने की योजना गहरे अविश्वास और संदेह को पैदा करेगी। यह लोकतांत्रिक कम और अधिनायकवादी रवैया ज़्यादा मालूम होता है। भारतीय संस्कृति और पुराणों के अध्येता देवदत्त पट्टनायक जो ओडिशा से ताल्लुक़ रखते हैं उनका कहना है -"ठीक वैसे ही जैसे अंग्रेजों ने, मुगलों ने भारत पर विजय प्राप्त की थी, अब वैसे ही 'पवित्र' ब्राह्मणों, जैनों और बनियों ने भारत पर कब्ज़ा कर लिया है। इसका हिंदू धर्म को बचाने से कोई लेना-देना नहीं है। यह तो केवल अपने जातीय विशेषाधिकारों को बचाने का खेल है—यह शाकाहारी लॉबी की सत्ता का खेल है। यही कारण है कि वे संसद की संरचना को बदलना चाहते हैं, ताकि उत्तर भारतीय लोग दक्षिण भारतीयों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर सकें; क्योंकि ब्राह्मणों का मुख्य गढ़ आज भी उत्तर भारत ही है।" वैसे ओडिशा राज्य दक्षिण और उत्तर के बीच एक पुल का वाहक है और इडली के साथ आलू की झोलदार तरकारी बड़े चाव से खाता है। 

केंद्र सरकार को जल्दबाज़ी में कुछ करने की बजाय इस मुद्दे पर विश्वास का सेतु बनाना चाहिए था । महिलाओं को आरक्षण देने में कोई दल ईमानदार नहीं है जो होते तो सबसे पहले अपनी पार्टी में महिलाओं को टिकट देते। 2024 में केवल 74 महिला सांसद लोकसभा में चुन कर आई हैं। यह 13 .6 प्रतिशत है जबकि बिना किसी आरक्षण के दक्षिण अफ्रीका में 46 इंग्लैंड में 35 और अमेरिका में 29 फ़ीसदी महिलाएं चुनकर आती हैं। संविधान संशोधन के इस प्रस्ताव का गिरना ईमानदार प्रयास का गिरना है जो बताता है  कि फ़िलहाल महिलाओं के हक़ में कोई नहीं सोच रहा,सब  शोर मचा रहे हैं। फ़िराक़ गोरखपुरी उर्फ़ रघुपति सहाय साहब का एक शेर है -

हम से क्या हो सका मोहब्बत में

ख़ैर तुम ने तो बेवफ़ाई की

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वंदे मातरम्-यानी मां, तुझे सलाम

लड़कियों के लिए सामाजिक व्यवस्था अब भी क्रूर और जजमेंटल

चल गया लड़के ज़ोहरान का ज़ोर