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धार्मिक मामलों में ना उलझे अदालत?

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इस समय भारत के सुप्रीम कोर्ट में बड़ी बहस जारी है कि धार्मिक आस्था मूलभूत अधिकारों का हनन नहीं कर सकती, तब क्या धर्म के मामलों में न्यायालय निर्णय ले सकता है? इस बहस को जन्म दिया हैं सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर महिलाओं के हक़ में आए फ़ैसले ने।  सबरीमाला मामले में सर्वोच्च अदालत का फ़ैसला अक्टूबर 2018 में आया था। पांच जजों की पीठ में से चार ने कहा था कि मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित नहीं किया जा सकता। केवल एक जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा था कि धार्मिक मामलों को तय करना कोर्ट का काम नहीं है जब तक कि यह सति प्रथा जैसी कोई सामाजिक बुराई न हो। उनका मानना था कि सबरीमाला मंदिर को अपनी व्यवस्था कायम रखने का अधिकार भारत का संविधान (आर्टिकल 25) देता है और इसे आर्टिकल 14 जो की समानता का अधिकार सुनिश्चित करता है, उसकी कसौटी पर नहीं परखा जा सकता। उनका यह भी मानना था कि इस फ़ैसले के दूरगामी परिणाम होंगे। तब यह मामला दस साल बाद अपने निर्णय पर पहुंचा था और बेशक़ यह आधी आबादी को उसके हक़ हासिल होने का बड़ा अवसर था लेकिन इस निर्णय का विरोध भी हुआ।  मामला रिव्यु पेटिशन के बाद 20...