वो सजदे के काबिल तो हो
कई बार लगता है कि हम वो समाज हैं जिसे ईश्वर तक पहुंचने के लिए कई सारे जरियों की जरूरत होती है। हम हमेशा माध्यम की ताक में रहते हैं और उम्मीद करते हैं कि कोई आए और हमारा हाथ पकड़कर उस तक ले जाए। हमें ऐ से लोग खूब रास आते हैं, जो हमें यकीन दिला देते हैं कि वे हमें प्रभु तक ले जाएंगे। फिर एक वक्त आता है, जब ये बिचौलिये ही हमें भगवान लगने लगते हैं और हम इनके कहे मुताबिक शतरंज के मोहरों की तरह चलने लगते हैं। यह तो बहुत अच्छा हुआ कि सोलह साल की बेटी के इस पिता की आंखें खुल गईं वरना कई परिवार अपनी संतानों को समर्पित करके भी आंखें बंद किए बैठे हैं। वे इसे बाबा का प्रसाद या धर्म की राह में दी गई आहुति मानते हैं। इस लड़की के पिता भी आसाराम के अंधभक्त थे। लखनऊ से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर शाहजहांपुर में उनका अपना व्यवसाय था कि दस साल पहले आसाराम के फेर में आ गए और दीक्षा ले ली। पास ही जगह खरीदी और अपने पैसों से आश्रम बनाया। चेतना तो तब लौटी, जब आसाराम ने बेटी को भी इसी सिलसिले में जोड़ लिया। जिस इंदौर शहर से आसाराम की गिरफ्तारी हुई है, उसी शहर की कई महिलाएं और युवतियां बीस साल पहले ही शपथ पत्...