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खेल में दो दो हाथ क्यों?

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दो राजा थे। दोनों पड़ोसी थे। उनकी रियासत की लंबी-लंबी  सीमाएं एक दूसरे से मिलती थीं। यूं तो दोनों में गाढ़ी शत्रुता थी लेकिन बड़ी-बड़ी  खेल प्रतियोगिताओं  में हिस्सा लेने का लालच वे छोड़ नहीं पाते थे। इनमें एक छोटी रियासत का राजा ज़्यादा हमलावर तबियत का था और उसकी सेना और प्रशिक्षित गुर्गे कई बार दूसरे राज्य में घुसपैठ कर चुके थे। सीमा पर भी ये भीषण उत्पात मचाते और मौका देख कर निहत्थी निर्दोष प्रजा की जान भी ले लेते। राजा ने सुरक्षा के लिए कटीली बाड़ भी लगाई, कोई फ़ायदा ना हुआ। इस बार राजा ने तय किया कि अब इनसे कोई व्यवहार नहीं होगा। यहां तक की  धनुर्विद्या और मल्ल्युद्ध की बेहद लोकप्रिय प्रतिस्पर्धाएं भी अब हमारे बीच नहीं होंगी। पूरी रियासत ने राजा की घोषणा का स्वागत किया कि ख़ून की होली खेलनेवाले पड़ोसी के साथ अब कोई खेल नहीं होगा। फिर पता नहीं कब, किसी तीसरी  रियासत में एक नियत दिन दोनों राज्यों के मल्ल योद्धा अखाड़े में पहुंचे और भिड़ गए। प्रजा में कोई उत्साह नहीं था और ना ही वह अखाड़े में पहुंची। घुसपैठिये राजा के योद्धा, धोबी पछाड़ के साथ धो दिए गए। जीतने वाले ने कहा कि...