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इस छोरी में आग है?

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हरियाणा की इस छोरी का चर्चा पूरी दुनिया में है। पेरिस ओलंपिक्स का मैडल इस छोरी से गले लगते-लगते वह रह गया। कोई यह भी नहीं कह पाया कि इसकी चूक थी, वज़न नहीं बढ़ना चाहिए था। उसके साथ हमदर्दी का समंदर था। प्रधानमंत्री को कहना पड़ा कि देश तुम्हें पदक विजेता ही मानता है।  गलत तो कोई  तब भी नहीं कह पाया जब इसने एक बाहुबली नेता से पंगा लिया। पंगा क्या था, एक नेता की अय्याशी और मनमर्ज़ी से परदा उठाने का संघर्ष था लेकिन फिर इस परदे को ऐसा तान दिया गया कि वह खिंचा ही नहीं। उसने और उसके साथियों ने पुलिस के डंडे खाए। यह तो हाल करते हैं हम उनका जो देश का झंडा बुलंद करने के सपने के साथ जीते-मरते हैं। पदक लाने पर तस्वीरें खिंचवाते हैं और जब न्याय मांगते हैं तब खदेड़ देते हैं। अब इस छोरी ने एक नया मंच चुन लिया है। कुश्ती का दंगल छोड़ सियासत के दंगल में कूद गई है। लड़ाकू और साहसी लड़की विनेश फोगाट (30 )अब कांग्रेस की नेता हो गई हैं और विधायक का चुनाव लड़ने जा रही हैं। जीत के कितने आसार हैं उनके और उनकी पार्टी के, यह जानने से पहले कुछ उस आग के बारे में जान लेते हैं जिसका ज़िक्र रसूल हमज़ातोव ने अपनी किताब...

महिला पहलवान की चीख में छलका दर्द "नया देश मुबारक हो"

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  खूब लिखा जा रहा है, बहसें हो रही हैं कि जिस दिन नई संसद का उद्घाटन हो रहा था, उसी दिन उस जगह से थोड़ी दूर पहलवानों पर लाठियां बरसाई गईं। जंतर-मंतर पर एक महीने से जारी उनके धरने को उखाड़ फेंका गया और यह ऐसा था जिसकी स्वतंत्र भारत के इतिहास  में कोई मिसाल नहीं मिलती। शांतिपूर्ण आंदोलन नागरिक का अधिकार रहे हैं लेकिन यह सरकार इसी बात से सबसे ज़्यादा ख़ौफ़ खाती है। शायद वह अन्ना हजारे के उस आंदोलन से सबक लेती है जिसके बाद यूपीए सरकार के कदम उखड़ गए थे। इसलिए हर धरना, आंदोलन इसी तरह उखाड़ा जाता है। 28 मई को संसद के भीतर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राजतंत्र के प्रतीक राजदंड को पुनर्स्थापित कर रहे थे तो बाहर उनकी पुलिस डंडे का ज़ोर दिखा रही थी। उन फ़रियादियों को डंडे मारे जा रहे थे जिन्होंने भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष ब्रजभूषण शरण सिंह के खिलाफ यौन शोषण की शिकायत की थी।  सात महिला पहलवान जिनमें एक नाबालिग भी है उनकी सामूहिक शिकायत पर जनवरी महीने से कोई कार्रवाई नहीं हुई है। वह नाबालिग इस दिसंबर में 16 साल की होगी। 28 मई को जब ये पहलवान पिट रही थीं आरोपी पूरी ठसक के साथ नई संसद में मौज...

जो गीत दिलों में क़त्ल हुए हर गीत का बदला मांगेंगे

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अच्छा है कि ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने हमारे प्रधानमंत्री को 'बॉस' कहा और यह भी अच्छा है कि अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने उनसे ऑटोग्राफ लेने की ख़्वाहिश की। कोई उनके पैर छूने को ही लालायित है।सच तो यह है कि भारत की जनता भी उनसे कुछ उम्मीद रखती है। उन्हें यही कहना चाहती है या शायद कहती भी रही है लेकिन अक्सर देखा जाता है कि वे सरकार में मिलकर जनता के हित साधने में चूक कर जाते हैं। किसी भी लोकतंत्र में सरकार के मायने क्या होते हैं? यही कि उसके फैसलों से उसके नागरिकों की जिंदगी आसान हो, उनकी तकलीफ़ों की सुनवाई हो, वे सुरक्षित हों लेकिन क्या ऐसा है? तो फिर जंतर-मंतर पर देश के लिए मैडल लाने वाली पहलवानों की तकलीफ पर कोई क्यों कान नहीं धरता? ,दिल्ली पर जनता के विरुद्ध क्यों अध्यादेश आता है? और मणिपुर में 75 लोगों के प्राण जाने के बाद हिंसा का दोबारा भड़कना क्यों होता है? क्यों ऐसा होता है कि केंद्र  जिसका 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' में गहरा यकीन है वह महिला पहलवानों की पीड़ा को यूं अनदेखा कर देता है? 'सबका साथ सबका विकास' कहते-कहते मणिपुर में क्यों ऐसा ...