शर्म तुमको नहीं आती मगर
अगर सियासत शतरंज का कोई खेल है तो फिर इन दिनों किसके पासे लगातार सही पड़ रहे हैं और कौन है जिसके तमाम पासे तो हमेशा सही पड़े लेकिन अव्यवस्थाओं का पिटारा ऐसा खुला कि अब रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है? देश में हादसे, अपराध, किशोरों की परीक्षाओं और पेपर लीक का तो जैसे अंतहीन सिलसिला चल पड़ा है। कोई भी सरकार ख़ुद को इस हालत में देखना पसंद नहीं करती लेकिन ये तो किसी ज्वालामुखी के पिघले लावे सा सतह पर आता जा रहा है ? ये किशोर जो शायद ही कभी इतने मुखर हुए हों, तकलीफों से इस कदर घिर गए कि बोलने के सिवाय उनके पास कोई चारा नहीं रहा। वे आगे आकर व्यवस्था के छेद सरकार को दिखा रहे हैं, सवाल पूछ रहे हैं लेकिन कोई इस गड़बड़-झाले की ज़िम्मेदारी नहीं ले रहा। तीन किशोरों ने शिक्षा महकमे को सीधे आइना दिखाया लेकिन वे अब भी अपनी छवि पर मुग्ध हैं। उससे एक बात तो बिलकुल साफ़ हो गई हमारे देश में शिक्षा अब भी ऊंची प्राथमिकता हासिल नहीं कर पाई है। बजट तो न्यूनतम है ही,व्यवस्था भी दो कौड़ी की साबित हो रही है। बारहवीं कक्षा के लिए पेपर जांच की समूची व्यवस्था...