ये तो खिरते ही जा रहे हैं!

ये तो यों  खिर रहे हैं ज्यों गुलाब के फूल का समय पूरा होने पर उसकी  पंखुड़ियां खिरा करती हैं या फिर पेड़ के पीले पात जो अपने अंतिम वक्त में उसका साथ छोड़ देते हैं। इनका पतन चौंकाने वाला है, अप्राकृतिक है क्योंकि ये समय से पहले ही झड़े जा रहे हैं। जैसे कोई विष पी लिया हो या कोई तूफ़ान झेल लिया हो। किस-किस का नाम लें। इनमें तो जैसे गिरने की होड़ लगी है। निर्लज्ज ऐसे कि पनपे कहीं और गिर कहीं ओर रहे हैं। शिवसेना,एनसीपी (नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी),आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने तो झड़ने के  पुराने सारे रिकॉर्ड ही तोड़ दिए हैं। तृणमूल को  एक हार क्या मिली इसके तिनके ही मूल से बिखर गए। ये पार्टी तो इस कदर ईमानदार साबित हुई  कि पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने के लिए इनकी ज़रूरत ही नहीं थी, फिर भी टूट गई । टूटने-बिखरने के लिए ऐसा अभूतपूर्व उत्साह कभी देखने को नहीं मिला है। ये तृणमूल वाले ही थे जब संसद में प्रधानमंत्री का भाषण होता था तब सबसे ज़्यादा नारे लगाते थे, सबसे ज़्यादा लामबंद होते थे। इनकी  नारेबाज़ी  इतनी सुरीली होते थी कि वाक़ई लगता था कि भाषण सुना जाए या इन्हें। अब तो लगता है कि पहले ही एक साथ बैठ जाते,क्यों पक्ष -विपक्ष का नाटक खेल जनता की आँखों में धूल झोंकते रहे। 

सवाल यही है कि इनका कौनसा मुंह सही था, भाषण में बाधा डालने वाला या अभी वाला जो लोकसभा स्पीकर से मिल रहा है। इनमें से अधिकांश एक ही बात कहते हैं कि ममता दीदी ने कोई भ्रष्टाचार नहीं किया लेकिन इनके पंचायत स्तर के नेताओं ने जनता को बहुत परेशान  किया जिसका नतीजा सामने है। कमाल है जब नेता भ्रष्ट नहीं, तब भी तकलीफ़ है। सियासत बेशर्म होती है लेकिन कितनी होती हैं, ये बताने के लिए भारत के राजनीतिक इतिहास में इन विधायकों-सांसदों की हरकतें नज़ीर बना कर पेश की जाती रहेंगी । कांग्रेस का हाल तो ऐसा है कि इनके चुने हुए विधायक इनके लिए राज्यसभा सांसद भी नहीं चुन पाते। झारखंड में वे किसी और को जिता देते हैं और मध्यप्रदेश की एक बढ़िया नेता के साथ तो ऐसा षड्यंत्र होता है कि उनका नामांकन ही रद्द हो जाता है। पदयात्रा, जन आंदोलन ,तमाम परीक्षाओं  में छले गए बच्चों के साथ हमदर्दी में, जनता कांग्रेस के  साथ जुड़ रही है लेकिन ये तो ख़ुद ही मैदान छोड़ देते हैं। आख़िर ये चुने हुए सांसद- विधायक अपने ही मतदाता  के अपमान करने पर क्यों तुले हुए हैं ? 543 में से 240 के आलावा सभी सीटें जनता ने इन्हें ही तो दी थी फिर ये विश्वासघात पर क्यों तुले हैं ? 

विलियम शेक्सपियर ने अपने पांच सौ पहले लिखे नाटक जूलियस सीज़र में मार्कस ब्रूटस को सबसे बड़ा धोखेबाज़ बताया था और इस विश्वासघात से सीज़र अपने घाव से ज़्यादा आहत हुआ था आख़िर  ब्रूटस उसका सबसे प्रिय जो था ? यह दर्द ऐसा था कि शरीर पर उतनी आंखें होती जितने की क़त्ल के घाव हैं तो उनमें से हरेक से उतने ही आंसू बह रहे होते जितना कि घावों से रक्त टपक रहा था । इस हत्या की शोकसभा में  सीज़र का मित्र  एंटोनी कहता है -"मुझे माफ़ करना वीर सीज़र तुझे हरिण की भांति यहां लाया गया और तुम्हारी हत्या की गई ,ये जो तेरे आस-पास खड़े हैं इनके हाथ तेरे खून से रंगे हुए हैं। कभी तुम इस धरती पर स्वतंत्र घूमा  करते थे ,यह संसार तुम्हारे  लिए जंगल के सामान था लेकिन आज तुम शिकार किये हुए मृग की तरह निस्तेज पड़े हुए हो।"  ऐसे ही विश्वासघात से आज भारत की जनता भी क्रुद्ध है। वह भी शिकार हुए मृग की तरह पड़ी है। नाटक जूलियस सीज़र यहां ख़त्म नहीं होता। चक्र घूमता है। वह सीज़र की इस निर्दोष हत्या का बदला लेता है। जनता भी उद्वेलित है। 

 यह कैसा लोकतंत्र है जहां मत किसी को दिया जाता है, वह ज़ाहिर कहीं ओर होता है।  पलटने का खेल तो पार्षद स्तर से ही जारी रहता है। जिनके ये पार्षद हैं या पंच होते हैं, उन्हें भी कोई फर्क नहीं पड़ता। जयपुर में हमारे ही क्षेत्र के पार्षद हैं। वोट मांगने आए थे तब राजस्थान में कांग्रेस की सरकार थी अब भाजपा की हो गई  तब वे भी अब वहीं के हो गए हैं। जनता अच्छी तरह समझ चुकी  है कि ये सारे दल आपस में एक हैं और जनता को ही बलि चढ़ा  रहे हैं। नई जनरेशन और बेहतर जान चुकी है क्योंकि अवसर उसके ख़त्म हुए हैं, भविष्य उसका दांव  पर लगा है। करोड़ों छात्र पेपर लीक,लचर शिक्षा व्यवस्था,भीषण बेरोज़गारी के कुचक्र में पिसने को मजबूर  हैं। ये कॉकरोच जनता पार्टी के लिए जो बूम दिखाई दिया वह यूं ही नहीं था ,यह अविश्वास का छोटा-सा प्रतीक भर है। वे जान गए हैं कि नेता विचारधारा का चोला पहन , उन्हें बरगलाने के लिए चुनाव में आते हैं। झूठी बहस का नैरेटिव गढ़ते हैं और चुनाव पूरे  होते ही चोला उतर देते हैं।  फिर इनके विचार कहीं होते हैं और धारा कहीं। उत्तर में  वोट मांगने  के तरीके दक्षिण और पूर्व से अलग होते हैं। कहीं ये मांस को बंद करवा कर वोट लेते हैं और कहीं सरे-आम मांस खाकर। इनकी हरकतें अच्छे-अच्छे मसखरों और बहुरूपियों को पछाड़ रही हैं और नई पीढ़ी इनके ढोंग को ख़ूब समझ चुकी  है। 




आज जनता के साथ कौन खड़ा है,अब जनता खुद से ही पूछ रही है ? सब अपनी गोटियां फिट कर रहे हैं।  ईडी-आईटी,सीबीआई  का डर भी कोरी बकवास लगता है क्योंकि ये खुद ही पिलपिले हैं। लाज बचाने के लिए ये तृणमूल के सांसद पता नहीं कहां  से त्रिपुरा की एक पुरानी पार्टी एनसीपीआई (नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी ऑफ़ इंडिया ) सामने ले आए जिसका संस्थापक भी उसे बना कर भूल चूका था।वे कहते हैं -" हमें इस पार्टी में शामिल माना जाए और एनडीए के बगल में बैठने की इजाज़त दी जाए।" अफ़सोस की इस नौटंकी को  जनता समझ चुकी है। चुनाव लड़ने की ज़रुरत ही क्या जब नतीजों के बाद भी नतीजे बदले जा सकते हों।जनता जल्द ही इन सबका अपने तरीके से हिसाब चुकता करेगी। 

वो फ़ख़्र क्या हुआ जिसका ज़िक्र तुम करते थे 

वो दलील क्यों गली जिस पर कभी तुम मरते थे। 





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