जब 376 का मक़सद बदला हो और आदमी 'बंदर'
समर (बॉबी देओल) एक 50 साल का एक स्ट्रगलिंग कलाकार है जो एक साथी की तलाश में डेटिंग एप पर आता है। साथी मिलता भी है, सहमति भी बन जाती है लेकिन फिर गायत्री (सपना पब्बी ) का व्यवहार समर को काफी पजेसिव लगने लगता है। गायत्री उसे बताती है कि वह लंदन से मुंबई एक लड़के के लिए आई थी लेकिन वह उसे छोड़ कर भाग गया। वह उसके घर आकर सजावट करती है, उसे समझाती है कि मैं तुम्हारे घर में पसरी नकारात्मक ऊर्जा ख़त्म कर दूंगी और जल्द ही तुम्हें बड़ी फ़िल्में मिलेंगी। इस लगातार पीछा करने से जब समर पीछा छुड़ाने का मन बना लेता है तब गायत्री इस रिजेक्शन को बर्दाश्त नहीं कर पाती। वह उसे उस समय कॉल करती है जब वह अपनी दूसरी गर्लफ्रेंड के साथ होता है और तब वह झूठ बोलता है कि वह एक मीटिंग में है।
समर उस वक्त हैरान हो जाता है जब पुलिस उसे घर से पकड़ कर थाने ले जाती है । वह वकील की मांग करता रह जाता है लेकिन उसका फ़ोन जब्त कर लिया जाता है क्योंकि उसी में वे सबूत हैं, जब गायत्री उसके साथ थी । पुलिस 20 लाख में सौदा पटाने की बात कहती है लेकिन वह कहता है मैं निर्दोष हूँ। उसकी गर्लफ्रेंड ख़ुशी (सबा आज़ाद ), बहन(सान्या मल्होत्रा ), लॉयर कुछ नहीं कर पाते और समर अंदर कर दिया जाता है। सबको उम्मीद कि समर को छुड़ा लेंगे। जेल के अंदर ख़तरनाक गैंग बने हुए हैं, जिनमें कई बार आपस में ही ख़ूनी जंग छिड़ जाती है। यहां हालात ऐसे हैं कि एक ख़ूनी को ज़्यादा इज़्ज़त है बजाय रेपिस्ट के। पेशी के दौरान पुलिसवाला कहता भी है कि अगर रेपिस्ट सिलेब्रिटी है तो ज़मानत और मुश्किल होती है।
धीरे-धीरे उसकी बहन ,उसकी गर्लफ्रेंड सभी नाता तोड़ने लगते हैं। उनका कहना है कि वे उसे डिफेंड करते -करते थक चुके हैं। केस को पुख्ता करने के लिए गायत्री का वकील उसे सलाह देता है कि ख़ुद पर एसिड फिकवाओ और कहो कि आरोपी ने केस वापस लेने की धमकी दी है । ब्रिगेडियर का बेटा समर कभी रोते हुए और कभी लड़ते हुए जेल की सड़ांध मारती ज़िन्दगी में दफ़न होने लगता है। फिल्म कहना चाहती है कि हर आदमी अपने ही सर्कस का एक बंदर है।
भारत में ज़रूर यह फ़िल्म बीते शुक्रवार को प्रदर्शित हुई लेकिन 'मंकी इन ए केज' के नाम से इसका प्रिमियर टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में 2025 में ही हो चुका है। बन्दर जहाँ जेल के अँधेरे कमरों पर रौशनी डालती है, वहीं यह भी बताती है कि अगर इंसान ख़ुद अपने पिंजरे से बाहर नहीं निकलता तो फिर वह मरा हुआ ही है। उस पर भरोसा करने वाली ख़ुशी कहती भी है -'अपने बनाए बबल से बहार निकलों। ' सपना पब्बी ,सान्या मल्होत्रा और जेल कैदी बतौर राज शेट्टी और इंद्रजीत का अभिनय बढ़िया है लेकिन आश्रम सीरीज के बाद से बॉबी देओल कमाल कर रहे हैं।आदमी के भीतर अच्छे और बुरे के बीच जो लगातार द्वन्द चलता है, उनके चेहरे पर पढ़ा जा सकता है। अमित त्रिवेदी का संगीत भाता है और पिंजरा तो अद्भुत बन पड़ा है।
कह सकते हैं कि अगर अनुभव सिन्हा की थप्पड़ और अस्सी अगर महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों की पैरवी है तो अनुराग कश्यप की बंदर उस मर्म की जो धारा 376 के ठप्पे को कभी -कभार सहमति के रिश्तों में भी लगा देती है और इस भ्रष्ट व्यवस्था में जब आँख - कान दोनों ही बंद हो तो नुक़सान का हिसाब भी नहीं लगाया जा सकता।


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