नागरिकता :हम कोई काग़ज़ नहीं मानेंगे
बीते कुछ सालों से एक विचित्र सिलसिला चल पड़ा है। सत्ता काग़ज़ की बात करती है और जनता अपने काग़ज़ी दस्तावेज़ों को खंगालने लगती है। फिर जनता और सरकार के बीच हम कागज़ नहीं दिखाएंगे से हम कागज़ ही कागज़ देखेंगे के बाद अब हम नागरिकता के लिए किसी भी कागज़ को नहीं मानेंगे पर हालात आकर टिक जाते हैं। फ़िलहाल देश में नागरिकता के लिए कोई भी प्रमाण वैध नहीं हैं। कहने को हम भारतीय नागरिक हैं भी और नहीं भी। ताज़ा बहस और विवाद बुधवार को उस समय पैदा हो गया जब विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट सेवा दिवस के दिन ही अपने सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ के बारे में यह कह दिया कि यह केवल यात्रा के लिए आवश्यक दस्तावेज़ भर है ना कि नागरिकता का कोई प्रमाण। सही है। मान लिया क्योंकि कई देशों में एक से अधिक देशों के पासपोर्ट रखने की रवायत है। जयपुर की एक टेक कंपनी में अपने साथियों से मिलने कभी-कभी माइक यहां आते हैं। वे ख़ुद आधे फ्रेंच और आधे ब्रिटिश हैं। उनके पास फ्रांस और ब्रिटेन दोनों के ही पासपोर्ट हैं और जिस कंपनी में वे काम करते हैं उसका दफ्तर स्विट्ज़रलैंड में है। हमारे देश में तो ऐसा नहीं है। पासपोर्ट केवल उसी नागरिक को दिया जाता है जो भारतीय है। पूरी तफ़्तीश के बाद भारत का विदेश मंत्रालय इस दस्तावेज़ को अपने नागरिक को देता है। यह कोई ऐसा नहीं हैं कि आप खुद ही इसे प्रिंट कर लें।सवाल यही है कि जब आज तक कोई एक काग़ज़ नागरिकता के लिए मान्य ही नहीं किया गया तो आखिर कोई कैसे यह सबित करे कि वह भारतीय ही है ? असम की एनआरसी में यही दुविधा लाखों नागरिकों की नागरिकता लेने का कारण बनी। उनमें ज़्यादातर असाक्षर और ग़रीब थे। होंगे आपकी फाइल में तमाम काग़ज़ लेकिन इनमें से एक भी आपकी भारतीय नागरिकता की पुष्टि नहीं करता।
विदेश मंत्रालय के अधिकारी का यह बयान एक सामान्य बयान ही होता अगर भारत सरकार ने सर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत लाखों मतदाताओं को सूची से बाहर ना किया होता,एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर )और नागरिकता संशोधन अधिनियम के तहत जनता को उद्वेलित ना किया होता । अभी जब एसआईआर के तहत राज्यों के नागरिकों के पास 2004 में कहां मतदान किया है का प्रमाण नहीं होता, तब कई बीएलओ ने पासपोर्ट के आधार पर ही सूची में उनका नाम जोड़ा। अब जब विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने एक सवाल कि क्या भारतीय पासपोर्ट का इस्तेमाल एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से बाहर किए जाने को चुनौती देने के लिए किया जा सकता है के जवाब में ना कहा तब हंगामा तो मचना ही था। लगता है जैसे हंगामा मचता रहे यही मकसद भी है। वह स्वयं भी नागरिकता के मसले को उलझाए रखना चाहती है। वह अपने ही जारी किसी भी दस्तावेज़ को जायज़ ठहराने से भागती है। पूर्व शिक्षा मंत्री और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल सवाल उठाते हैं कि अगर पासपोर्ट नागरिकता का सबूत नहीं है, तो फिर कौन सा दस्तावेज नागरिकता साबित करेगा? वे कहते हैं -" इसी आधार पर बीएलओ किसी भी नागरिक के मतदाता होने पर शक कर सकते हैं ,उसके मतदान का अधिकार छीन सकते हैं और चुनाव के नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।" मशहूर पटकथा लेखक और शायर जावेद अख्तर कहते हैं-" जब विदेश मंत्रालय के अधिकारी ऐसा कहते हैं तब क्या यह माना जाए कि यह ट्रेवल डॉक्यूमेंट वे कुछ लोगों को ऐसे ही दे देते हैं ,बिना इस भरोसे के कि वह भारतीय नागरिक है ? यह तो बहुत अजीब और बेतुका है।"
अब जब आधार,मतदाता पहचान पत्र ,बैंक पासबुक के बाद पासपोर्ट भी नागरिकता का प्रमाण नहीं रह गया है तब सवाल यही उठता है कि हमारी सरकार को यह यकीन भी है या नहीं कि वह सरकार भी है ? या फिर वह कोई ऐसी क़वायद करने का मन बना चुकी है कि जनता पर एक और बड़ा अभियान लादा जाए। नोटबंदी, सर के बाद फिर नई कतारे, नए डर ,नई आशंकाएं। शाहीन बाग़ का आंदोलन ऐसा ही आंदोलन था जब साल 2020 की शुरुआत में दिल्ली में हज़ारों स्त्रियां इस डर से प्रतिरोध पर उतर आईं थी कि उनकी नागरिकता छिनने वाली है ? ये उनकी अपनी मिट्टी से मोहब्बत थी जो उन्हें घर की देहरी लांघने पर मजबूर कर रही थी। उन्हें डर था कि कोई उन्हें अपने वतन से दूर न कर दे,वे दम साधे पैर जमा कर बैठीं थीं। तब से अब तक क्या सरकार का यही आनंद है कि नागरिक लगातार तनाव में बना रहे, ख़ुद को साबित करने की प्रक्रिया में हमेशा उलझा रहे ? यह वही दौर था जब स्टैंडप कॉमेडियन और गीतकार वरुण ग्रोवर ने यह कविता लिखी थी -
हम काग़ज़ नहीं दिखाएंगे
तानाशाह आके जाएंगे
हम काग़ज़ नहीं दिखाएंगे
तुम आंसूं गैस उछालोगे
तुम ज़हर की चाय उबालोगे
हम प्यार की शकर घोल के इसको
गट -गट-गट पी जाएंगे
हम काग़ज़ नहीं दिखाएंगे
ये देश ही अपना हासिल है
जहां रामप्रसाद भी बिस्मिल है
मिटटी को कैसे बताओगे ,
सबका ही खून तो शामिल है..
शायद प्रतिरोध नहीं चला और अब काग़ज़ साबित करने का दौर है। सैद्धांतिक रूप से पासपोर्ट को नागरिकता के प्रमाण के रूप में देखा जाता है और यही बात इसे अन्य दस्तावेज़ों से अलग भी बनाती है। विदेश यात्रा के दौरान पासपोर्ट आपकी राष्ट्रीयता की पुष्टि करता है, लेकिन इसे नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता तब नागरिकता प्रमाण पत्र आख़िर क्या होगा ? ये वक्तव्य जैसे अपने ही नागरिकों को बेइज़्ज़त करने के लिए दिया गया है। पूरी दुनिया जहां अपने पासपोर्ट को मज़बूत बना कर अपने नागरिकों के अंतर्राष्ट्रीय अनुभव सुखद बनाने बनाने में जुटी है, भारत सरकार ने अपने ही पासपोर्ट पर संदेह का तीर चला दिया है। याद कीजिये अरुणाचल प्रदेश की भारतीय नागरिक प्रेमा को जिनके पासपोर्ट को देख, चीनी हवाई अड्डे पर चीनी प्रवर्तन अधिकारी ने उनकी आगे की यात्रा यह कह कर रोक दी थी कि तुम तो अरुणाचल की हो जो चीन का हिस्सा है और तुम्हारे पास तो चीनी पासपोर्ट होना चाहिए। प्रेमा लंदन से जापान जा रही थीं और तीन घंटे का शंघाई हवाई अड्डे पर 'ले ओवर' था। अब जब भारतीय नागरिक का पासपोर्ट ही उसके भारतीय होने की गवाही नहीं देता तो दुनिया के शेष देश, उसे लपकने या फिर छोड़ने के लिए क्यों नहीं आज़ाद होंगे ?
देशवासी को यह जानने का पूरा हक़ है कि आख़िर किस एक कागज़ में सरकार का पूरा भरोसा है जो एक भारतीय को भारतीय नागरिक बनाता है। आधार नहीं ,मदताता पहचान पत्र नहीं और अब पासपोर्ट भी नहीं तब क्या ? इतनी दुविधा क्यों है ? क्या इसलिए कि सरकार अनिश्चय का ऐसा डंडा अपने हाथ में रखना चाहती है जो जब चाहे तब किसी को नागरिक मान ले और नहीं भी माने। अंतिम मुग़ल वंशज बहादुर शाह ज़फ़र को भारत को आज़ाद कराने के लिए हुई 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेज़ों ने रंगून की जेल में भेज दिया था। खाने के लिए केवल एक अनाज चुनने की सहूलियत थी। उनका एक शेर है जो बताता है कि जन्मस्थली से दूर होने वाली मौत एक शायर को किस क़दर विचलित करती है -
कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
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