ये तो खिरते ही जा रहे हैं!
ये तो यों खिर रहे हैं ज्यों गुलाब के फूल का समय पूरा होने पर उसकी पंखुड़ियां खिरा करती हैं या फिर पेड़ के पीले पात जो अपने अंतिम वक्त में उसका साथ छोड़ देते हैं। इनका पतन चौंकाने वाला है, अप्राकृतिक है क्योंकि ये समय से पहले ही झड़े जा रहे हैं। जैसे कोई विष पी लिया हो या कोई तूफ़ान झेल लिया हो। किस-किस का नाम लें। इनमें तो जैसे गिरने की होड़ लगी है। निर्लज्ज ऐसे कि पनपे कहीं और गिर कहीं ओर रहे हैं। शिवसेना,एनसीपी (नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी),आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने तो झड़ने के पुराने सारे रिकॉर्ड ही तोड़ दिए हैं। तृणमूल को एक हार क्या मिली इसके तिनके ही मूल से बिखर गए। ये पार्टी तो इस कदर ईमानदार साबित हुई कि पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने के लिए इनकी ज़रूरत ही नहीं थी, फिर भी टूट गई । टूटने-बिखरने के लिए ऐसा अभूतपूर्व उत्साह कभी देखने को नहीं मिला है। ये तृणमूल वाले ही थे जब संसद में प्रधानमंत्री का भाषण होता था तब सबसे ज़्यादा नारे लगाते थे, सबसे ज़्यादा लामबंद होते थे। इनकी नारेबाज़ी इतनी सुरीली होते थी कि ...