घर से दुनिया तक नज़रा गया प्रेम
यह पृथ्वी अगर हमारा घर आंगन है तो यह आंगन नज़रा गया है। किसी बुरे साए के असर में है जो अब भी इससे मुक्त होने की कोशिश नहीं हुई तो हम एक बेहद कमज़ोर समाज और खोखली दुनिया का हिस्सा होंगे। हमने कभी इस गोले को कोई दिठौना या काला टीका नहीं लगाया क्योंकि उससे कभी प्रेम ही नहीं किया। अपने भीतर के प्रेम को भी किसी केंचुली की तरह उतार कर कभी ना ख़त्म होने वाली चूहा दौड़ में शामिल हो गए । क्या पड़ोस ,क्या सड़क ,क्या शहर ,क्या प्रदेश ,क्या देश ,क्या द्वीप, क्या महाद्वीप सब बढ़-चढ़ कर यह बताने में लगे हैं कि कौन कितनी जल्दी प्रेम से ख़ाली हो सकता है। इस रास्ते के सबसे ज़लील मुसाफ़िर वही हैं जिनके पास ताक़त है। इनका व्यवहार ऐसा है कि जैसे धरती से प्रेम की पूरी फ़सल सुखाने की संधि की हो। इनके हाथ परमाणु बटन होना भी ख़तरनाक है। वे हर दिन संत वैलेंटाइन को ठेंगा दिखाते हैं। नया यह है कि नफ़रत को इन्होंने सुंदर पैकेजिंग में बेचना शुरू कर दिया है और इसे बनाने की फैक्ट्री में जाने कितनों को प्रशिक्षण देकर भी लगा दिया है। घृणा क़ारोबार है। आखिर कैसे मूल्यों की इस गिरावट से बचा जा सकता है? इस बीमारी की नब्ज़ पकड़ में आ सकती ...