मर्दों का 'मी टू' है अनुराग की फ़िल्म बंदर
अनुराग कश्यप निर्देशित बंदर कई मायनों में बेहतरीन फ़िल्म हो जाती हैं क्योंकि उसके जेल के दृश्य निर्मम सच को सामने रख देते हैं, वे पुलिस वकील की सांठ -गांठ की पूरी पोल खोल देते हैं और उस न्याय व्यवस्था की भी जहां कई बार जज भी अपने पूर्वाग्रहों को पीछे नहीं रख पाते। दरअसल हम इतनी भीड़ और फिर आँखें बंद कर फ़ैसला दे देने वाला समाज हैं कि हमारी जेलें फिर विचाराधीन कैदियों से भर जाती है। जुर्म साबित होने से पहले ही वे बलात्कारी,हत्यारे हैं। यहां जेल रूल है और बेल अपवाद। गैंग्स ऑफ़ वासेपुर और देव-डी से चला गालियों और अनुराग का नाता बंदर में पुलिस और कैदियों से जुड़कर और गहरा हो गया है। समर (बॉबी देओल) एक 50 साल का एक स्ट्रगलिंग कलाकार है जो एक साथी की तलाश में डेटिंग एप पर आता है। साथी मिलता भी है, सहमति भी बन जाती है लेकिन फिर गायत्री (सपना पब्बी ) का व्यवहार समर को काफी पजेसिव लगने लगता है। गायत्री उसे बताती है कि वह लंदन से मुंबई एक लड़के के लिए आई थी लेकिन वह उसे छोड़ कर भाग गया। वह उसके घर आकर सजावट करती है, उसे समझाती है कि मैं तुम्हारे घर में पसरी नकार...