शाहिद मिर्ज़ा : अर्ध शतकीय जीवन में शतकीय मूल्यों की पत्रकारिता -वर्षा भम्भाणी मिर्ज़ा आख़िर क्यों याद किया जाना चाहिए एक ऐसे युवा शख़्स को जिसका साथ ज़िन्दगी केवल पचास साल की उम्र में ही छोड़ गई। पत्रकार शाहिद मिर्ज़ा साहब के आगे जो ये दो बड़े -बड़े शब्द पत्रकार और साहब मैंने लिखे हैं इन दोनों के गहरे मायने हैं या कहें कि ये दोनों ही जैसे यहां लिखे जाने पर अपना अर्थ हासिल कर लेते हैं। हिंदी पत्रकारिता का वो नाम जिसका छोटा-सा जीवन भी बड़े विचार, बड़े मूल्य और बड़े दर्शन के द्वार खोलता है। ऐसा सफर जो नईदुनिया से लेकर दैनिक भास्कर,नवभारत टाइम्स और राजस्थान पत्रिका तक चला और हर बार काम के लिहाज़ से बहुत नवोन्मेषी शैलियों में ढला और तमाम युवा साथियों की प्रतिभाशाली टीम भी गढ़ता रहा। शाहिद मिर्ज़ा के पास अपने तमाम क़िस्सों के साथ पत्रकारिता का ककहरा सिखाने का ऐसा हुनर और जज़्बा था अगर किसी ने कुछ दिन भी उनके साथ काम कर लिया, फिर वह अपना सबक कभी नहीं भूला। यह साथ गहरे अध्ययन से आया विचार था साझा होते ही जो सोच के बंद दायरों को खोल देता था। नए प्रशिक...
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राजस्थान का सौभाग्य जो भाग्यम मिलीं -वर्षा भम्भाणी मिर्ज़ा,पत्रकार एस. भाग्यम शर्मा जी से मेरी मुलाक़ात लगभग दो दशक पहले उनकी उम्र के उस पड़ाव पर हुई जब आम व्यक्ति अपने घर के ओटले पर बतियाते हुए सुस्ता रहा होता है या फिर गाँव में किसी नीम के पेड़ तले अपने अतीत का हिसाब-किताब कर रहा होता है। वे ऐसा कुछ भी नहीं कर रही थीं। वे तो जयपुर की सड़कों पर दौड़ रही थीं।अपनी मारुती गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर बैठकर लगातार अपने सपनों का पीछा कर रही थीं। उनकी यह दौड़ अब भी जारी है। चरैवेति चरैवेति के सिद्धांत पर। चलते रहो... चलते रहो..शायद यही ज़िन्दगी का सार भी है पर वे तो दौड़ रही हैं। ईट, प्रे, लव की लेखिका एलिज़ाबेथ गिल्बर्ट यही तो कहती हैं- 'फॉलो योर क्यूरिऑसिटी।' भाग्यम जी यही कर रही हैं। एक ही मुस्कान काफी होती क़रीब लाने के लिए पर वे तो हज़ारों मुस्कराहटें एक साथ लेकर चलती हैं। खिलंदड़ के साथ लिखंदड़ भी उनका जुड़वा है। अंगुलियां हमेशा लिखने को आतुर और मुस्कुराता दिल सबसे मिलते रहने को बेकल। ये दिल ऐसी बातें भी बेधड़क कह जाता जिसे लोग रहस...
अब 'सर ' उठाना बहुत भारी है इस सरकार के लिए
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मोदी सरकार के लिए ये समय भीषण संकट का है। चुनाव सुधार के लिए लाई गई प्रक्रिया सर के खिलाफ जो भावनाएं जनता के भीतर थीं, उसे जैसे यकायक तेज़ स्वर मिल गए हैं। हरेक के दिल का लावा जैसे बह निकला है । अभी कुछ समय पहले जो देश का युवा पूछ रहा था कि जंतर-मंतर पर गोली किसके कहने पर चलाई गई और वही अब पूछ रहा आखिर है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने किसके कहने पर ऐसे गैर क़ानूनी कदम उठाए ? जवाब हैं पर अभी सब गोल-गोल घूम रहे हैं। कॉकरोच जनता पार्टी ने 48 घंटे के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की चेतावनी दे दी है तो कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार को केवल मोहरा कहा है और इसके पीछे के षड्यंत्रकारियों को देशद्रोही क़रार देते हुए जांच की मांग की है। उसने कहा कि साल 2023 में ही इस पद को तमाम अपराधी और दीवानी मुकदमों से जीवनभर की मिली इम्युनिटी के नतीजे सामने हैं । कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार को क़ाबिल अफ़सर बताते हुए गवाह बन जाने की सलाह भी दे डाली है । यह ज्वालमुखी इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकार रितिका चौपड़ा की बुधवार को प्रकाशित रिपोर्ट के बाद फटा है। यह रिपोर्ट अब गर्म - गर्म लावा सी...
मेरा नाम एगनेटा है !
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एगनेटा पचास साल की प्यारे -से मोटापे वाली और हमेशा एक मोटा जैकेट पहनने वाली स्वीडिश महिला है। पासपोर्ट ऑफिस के प्रशासनिक दफ़्तर में काम करती है और अब जल्द ही सेवामुक्त होने वाली है। लगातार सोच रही है कि अब वह क्या करेगी ? मरने का इंतज़ार या फिर कोई नया काम। पचास की उम्र के बाद कौन काम भी देता है फिर चाहे करने का साहस दूना ही क्यों न हो। एगनेटा के बच्चे बड़े हो गए हैं और तब ही याद करते हैं जब उन्हें कुछ चाहिए होता है। पति भले तो हैं लेकिन एगनेटा को अपना फ्रेंच लव उनसे छिपाना पड़ता है। वह इंसान नहीं बल्कि फ़्रांसिसी अंदाज़,वहां की मशहूर चीज़ , ताज़गी,आज़ादी और सबसे बड़ी बात किसी को भी जज नहीं करता वाला बर्ताव है। यह सब उसे पसंद है। स्वीडन में रहते हुए वह फ्रेंच चीज़ को छुपा कर रखती है क्योंकि पति को यह सब बिल्कुल पसंद नहीं । तभी एक विज्ञापन पर उसकी नज़र पड़ती है। यह फ्रांस में 'ओ पर' का जॉब है जिसमें आप होते तो बाहरी हो लेकिन होस्ट के साथ ही रहते हो उसके परिवार के सदस्य की तरह। छोटे-मोटे काम करने होते हैं। बदले में आपको पैसा मिलता है। एगनेटा को...
नागरिकता :हम कोई काग़ज़ नहीं मानेंगे
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बीते कुछ सालों से एक विचित्र सिलसिला चल पड़ा है। सत्ता काग़ज़ की बात करती है और जनता अपने काग़ज़ी दस्तावेज़ों को खंगालने लगती है। फिर जनता और सरकार के बीच हम कागज़ नहीं दिखाएंगे से हम कागज़ ही कागज़ देखेंगे की रस्साकशी चलने लगती है। अब सरकार कहती है हम नागरिकता के लिए किसी भी कागज़ को नहीं मानेंगे, पासपोर्ट को भी नहीं।फ़िलहाल देश में नागरिकता के लिए कोई भी प्रमाण वैध नहीं हैं। कहने को हम भारतीय नागरिक हैं भी और नहीं भी। ताज़ा बहस और विवाद बीते बुधवार को उस समय पैदा हो गया जब विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट सेवा दिवस के दिन ही अपने सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ के बारे में यह कह दिया कि यह केवल यात्रा के लिए आवश्यक दस्तावेज़ भर है ना कि नागरिकता का कोई प्रमाण। सही है। मान लिया क्योंकि कई देशों में एक से अधिक देशों के पासपोर्ट रखने की रवायत है। जयपुर की एक टेक कंपनी में अपने साथियों से मिलने कभी-कभी माइक यहां आते हैं। वे ख़ुद आधे फ्रेंच और आधे ब्रिटिश हैं। उनके पास फ्रांस और ब्रिटेन दोनों के ही पासपोर्ट हैं और जिस कंपनी में वे काम करते हैं उसका दफ्तर स्विट...
ये तो खिरते ही जा रहे हैं!
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ये तो यों खिर रहे हैं ज्यों गुलाब के फूल का समय पूरा होने पर उसकी पंखुड़ियां खिरा करती हैं या फिर पेड़ के पीले पात जो अपने अंतिम वक्त में उसका साथ छोड़ देते हैं। इनका पतन चौंकाने वाला है, अप्राकृतिक है क्योंकि ये समय से पहले ही झड़े जा रहे हैं। जैसे कोई विष पी लिया हो या कोई तूफ़ान झेल लिया हो। किस-किस का नाम लें। इनमें तो जैसे गिरने की होड़ लगी है। निर्लज्ज ऐसे कि पनपे कहीं और गिर कहीं ओर रहे हैं। शिवसेना,एनसीपी (नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी),आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने तो झड़ने के पुराने सारे रिकॉर्ड ही तोड़ दिए हैं। तृणमूल को एक हार क्या मिली इसके तिनके ही मूल से बिखर गए। ये पार्टी तो इस कदर ईमानदार साबित हुई कि पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने के लिए इनकी ज़रूरत ही नहीं थी, फिर भी टूट गई । टूटने-बिखरने के लिए ऐसा अभूतपूर्व उत्साह कभी देखने को नहीं मिला है। ये तृणमूल वाले ही थे जब संसद में प्रधानमंत्री का भाषण होता था तब सबसे ज़्यादा नारे लगाते थे, सबसे ज़्यादा लामबंद होते थे। इनकी नारेबाज़ी इतनी सुरीली होते थी कि ...
मर्दों का 'मी टू' है अनुराग की फ़िल्म बंदर
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अनुराग कश्यप निर्देशित बंदर कई मायनों में बेहतरीन फ़िल्म हो जाती हैं क्योंकि उसके जेल के दृश्य निर्मम सच को सामने रख देते हैं, वे पुलिस वकील की सांठ -गांठ की पूरी पोल खोल देते हैं और उस न्याय व्यवस्था की भी जहां कई बार जज भी अपने पूर्वाग्रहों को पीछे नहीं रख पाते। दरअसल हम इतनी भीड़ और फिर आँखें बंद कर फ़ैसला दे देने वाला समाज हैं कि हमारी जेलें फिर विचाराधीन कैदियों से भर जाती है। जुर्म साबित होने से पहले ही वे बलात्कारी,हत्यारे हैं। यहां जेल रूल है और बेल अपवाद। गैंग्स ऑफ़ वासेपुर और देव-डी से चला गालियों और अनुराग का नाता बंदर में पुलिस और कैदियों से जुड़कर और गहरा हो गया है। समर (बॉबी देओल) एक 50 साल का एक स्ट्रगलिंग कलाकार है जो एक साथी की तलाश में डेटिंग एप पर आता है। साथी मिलता भी है, सहमति भी बन जाती है लेकिन फिर गायत्री (सपना पब्बी ) का व्यवहार समर को काफी पजेसिव लगने लगता है। गायत्री उसे बताती है कि वह लंदन से मुंबई एक लड़के के लिए आई थी लेकिन वह उसे छोड़ कर भाग गया। वह उसके घर आकर सजावट करती है, उसे समझाती है कि मैं तुम्हारे घर में पसरी नकार...