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मानसिक दिव्यांग बच्चे जैसे हैं, उन्हें स्वीकारे

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आपका धैर्य ही मानसिक दिव्यांग बच्चों की ताकत -डॉ राठी    उन अभिभावकों की चिंता थी कि उनका बच्चा सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों में उनके साथ नहीं जाता,कभी बहुत शांत होता है तो कभी बहुत गुस्से में ,मोबाइल फोन के लिए हिंसक हो जाना और किसी भी एक चीज़ के लिए जुनून की हद लांघ देना जैसी मुश्किलों का क्या कोई इलाज है भी या नहीं। वे अपने बच्चों को खुश देखने के लिए सब कुछ कर सकते हैं लेकिन कोई राह नहीं मिलती। इन तमाम चिंताओं को जब मानसिक तौर पर  दिव्यांग बच्चों के माता-पिता ने संस्था में साझा किया तो उनके चेहरे पर राहत के भाव थे।  इंदौर सोसाइटी फॉर मेंटली चैलेंज्ड संस्था द्वारा आयोजित इस कार्यशाला में   साइकाइट्रिक एवं बिहेवियर प्रॉब्लम विशेषज्ञ  डॉक्टर पवन राठी ने बताया कि बेशक इन बच्चों के साथ थोड़े अतिरिक्त प्रयास करने होते हैं लेकिन असंभव कुछ भी नहीं है। उन्हें आपके  धैर्य और समय दोनों की जरूरत होती है। आप देखेंगे कि यह व्यवहार बच्चे परिवार और अपने आस-पास के माहौल से ही लेते हैं। आपको उस माहौल को समझना है। डॉ राठी ने कहा कि उनकी छोटी-छोटी उपलब्धियों प...

युद्ध और शांति के बीच 'दलाल' कौन

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जो इल्म तुझे तुझ से न ले ले उस इल्म से जहल बेहतर है- रूमी हज़ारों साल पहले  ईरानी होने का मतलब था प्रकाश का वाहक। यह अग्नि को पूजने वालों के लिए नए युग का उदय था। कुछ वैसा ही जैसा वैदिक काल में अग्नि को समर्पित यज्ञ और उसके ज़रिए सृष्टि का आव्हान। अंधेरे और उजाले के बीच सतत संघर्ष के बाद एक दिन न्याय का दिन होगा, इस विचार ने तब के फ़ारस में बड़ी आबादी को जोड़ा।  उनकी समूची  कविता, संस्कृति, अध्यात्म और राष्ट्र वाद अच्छाई की पैरोकारी से जुड़ा था जो बाद के फ़ारसी शायरों में भी नज़र आया। मौलाना जलालुद्दीन रूमी की 'मसनवी' फारसी साहित्य की महान सूफी कृति है, जिसमें 25,000 से ज़्यादा  छंद हैं। यह कहानियों के माध्यम से प्रेम, आध्यात्मिकता और ईश्वर से मिलन का मार्ग बताती है, जिसे "फारसी का कुरान" भी कहा जाता है।  ईसा से 600 साल का दौर था जब  ईरानीयों ने बेबीलोन पर कब्ज़ा कर के दो सौ साल की यातना झेल रहे यहूदियों को    मुक्त करावया था। इन्हें वहां के राजा ने केवल इसलिए  कैद कर रखा गया था क्योंकि उनका अपना यक़ीन था, अपने ईश्वर को मानने का। यह राजा  सायर...

बूढ़े युद्ध शुरू करते हैं और जवान शहीद

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" बूढ़े युद्ध शुरू करते हैं और जवान इसमें लड़ते और जान देते हैं" -हर्बर्ट हुवर   पश्चिमी एशिया में युद्ध की लपटें भयावह हो गई हैं। एक ऐसा युद्ध जिसमें चुन-चुन के हत्याएं भी हो रही हैं, तेल और गैस के मुहानों पर सीधे हमले हो रहे हैं,  ग़रीब देश और गहरी तकलीफ़ में आ गए हैं। हैरानी और दुःख की बात यह है कि शांति के प्रयास बिल्कुल सिफर हैं। सहायता पहुंचाने के लिए जहाज़ तैयार हैं लेकिन अमन की बात पर गहरा मौन है। इस कबीलाई दुनिया में कोई एक भी नेता ऐसा नहीं जो तेल के लिए जारी इस जंग में जनता के तेल निकलने की स्थिति को समझ सके,बोल सके। महावीर, बुद्ध,नानक और गांधी का देश भी लहर (अब तक 6)आते हुए ताबूत देख रहा है लेकिन शांति को लेकर दुविधा में है। यही इस दौर की कूटनीति है कि जिनके पास लाठियां हैं उनके हो जाएं,गुटबाज़ी करें। मोटे तौर पर भले ही  ईरान-इजराइल+अमेरिका सीधे लड़ाई में हों लेकिन शेष दुनिया कभी सीधे तो कभी आजू -बाजु से इसके ख़तरनाक नतीजों की चपेट में आ रही है। हमारा देश न किसी के लेने में है और न किसी के देने में, फिर भी युद्ध के असर में आता जा रहा है। असर ऐसा कि एक मार्च क...

मान ली गईं इच्छा से मृत्यु की गुज़ारिश

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कभी-कभी सुप्रीम कोर्ट ऐसे मामलों से जूझता हैं जहां फ़रियादी के आसुंओं  के सैलाब में न्यायाधीश के आंसू  भो मिलने लगते हैं और फिर एक ऐसा फ़ैसला आता है जो पूरे देश के लिए नज़ीर बन जाता है। बुधवार को आया यह फ़ैसला वाक़ई बड़े इंतज़ार के बाद आया बड़ा फ़ैसला था। हरीश राणा ( 32 ) के माता -पिता की तकलीफ़ से जब दोनों जजों की संवेदनाएं मिली तब कहीं जाकर 338 पन्नों का यह ऐतिहासिक फ़ैसला लिखा गया। हरीश भारत का पहला शख़्स हो गया है जिसकी स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उसके लिए इच्छामृत्यु को स्वीकार कर लिया है। हरीश के  माता -पिता ने अपने बच्चे के लिए इच्छामृत्यु की मांग की थी। वह 20 साल का ही था जब बीटेक करने के लिए गाज़ियाबाद से चंडीगढ़ आया था। वहीं अपने पीजी रूम की चौथी मंज़िल से गिरकर सिर में ऐसी चोट खा बैठा  कि फिर कभी उठ ना सका।  कभी -कभार वह आंखें तो खोलता लेकिन अपने आस-पास का कोई भान उसे नहीं था। लगभग कोमा में लेकिन उसके माता-पिता ने उसे तेरह साल तक जीवित रखा। चिकित्सा विज्ञान इसे 'वेजिटेटिवे स्टेट' का नाम देता है। यह एक अथक संघर्ष की गाथा थी लेकिन अंत में जब चिकित्स...

शादी में सब चलता है रेप भी

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'रेवोलुशनरी रोड्स' उसी जोड़े की हॉलीवुड फ़िल्म है जिनकी पहली ही फ़िल्म ने दुनिया को अपना दीवाना बना दिया था।आलीशान जहाज टाइटैनिक के डूबने की दास्तान में जब रोज़ और जैक का प्रेम  उतरता है तब यह फ़िल्म ज़्यादातर दर्शकों की आल टाइम फ़ैवरेट की सूची में आ जाती है। रेवोलुशनरी रोड्स में केट विंसलेट अप्रैल हैं और लिओनार्दो डिकैप्रियो  फ्रैंक। दोनों का दाम्पत्य अच्छा नज़र आता है, बच्चे भी हैं लेकिन ज़िन्दगी में गहरा खालीपन है। फ्रैंक अपनी सेल्समेन की नौकरी से ऊब रहा है। अप्रैल उसे याद दिलाती है कि फ्रैंक तुम जैसे जीना भूल रहे हो, क्यों ना हम, सब कुछ छोड़ पैरिस चलें क्योंकि यही तो तुम्हारा सपना था जब तुमने कहा था कि मैं हर चीज़ महसूस करना चाहता हूं, बस ज़िन्दगी जीना चाहता हूं। दोनों पैरिस जाने का मन बना लेते हैं। फिर अचानक फ्रैंक को नौकरी में तरक्की का प्रस्ताव मिलता है और वह यहीं रह जाना चाहता है लेकिन अप्रैल को बता नहीं पाता। वह खेल रचता है। अप्रैल गर्भवती हो जाती है। अपने तीसरे बच्चे को जन्म देने की तैयारी में देश छोड़ना मुश्किल होता है। इस तर्क के आधार पर फ्रैंक पैरिस जाने का फ़ैसला बदलना चाहता ह...

घर से दुनिया तक नज़रा गया प्रेम

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यह पृथ्वी अगर हमारा घर आंगन है तो यह आंगन नज़रा गया है। किसी बुरे साए के असर में है जो अब भी इससे मुक्त होने की कोशिश नहीं हुई तो हम एक बेहद कमज़ोर समाज और खोखली दुनिया का हिस्सा होंगे। हमने कभी इस गोले को कोई दिठौना या काला टीका नहीं लगाया क्योंकि उससे कभी प्रेम ही नहीं किया। अपने भीतर के प्रेम को भी किसी केंचुली की तरह उतार कर कभी ना ख़त्म होने वाली चूहा दौड़ में शामिल हो गए । क्या पड़ोस ,क्या सड़क ,क्या शहर ,क्या प्रदेश ,क्या देश ,क्या द्वीप, क्या महाद्वीप सब बढ़-चढ़ कर यह बताने में लगे हैं कि कौन कितनी जल्दी प्रेम से ख़ाली हो सकता है। इस रास्ते के सबसे ज़लील मुसाफ़िर वही हैं जिनके पास ताक़त है। इनका व्यवहार ऐसा है कि जैसे धरती से प्रेम की पूरी फ़सल सुखाने की संधि की हो। इनके हाथ परमाणु बटन होना भी ख़तरनाक है। वे हर दिन संत वैलेंटाइन को ठेंगा दिखाते हैं। नया यह है कि नफ़रत को इन्होंने सुंदर पैकेजिंग में बेचना शुरू कर दिया है और इसे बनाने की फैक्ट्री में जाने कितनों को प्रशिक्षण देकर भी लगा दिया है। घृणा क़ारोबार है। आखिर कैसे मूल्यों की इस गिरावट से बचा जा सकता है? इस बीमारी की नब्ज़ पकड़ में आ सकती ...

इस चमन में बस हम ही हम खिलेंगे

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बीता सप्ताह  सरकार के लिए कुछ ज़्यादा ही  चुनौती भरा हो गया। यूं हमारी  सरकार जो भरपूर यक़ीन के साथ अपनी ही मस्त चाल में चलती है, इस हफ़्ते कुछ कसमसाती और डगमगाती नज़र आई।  डगमगाने का ताल्लुक़ बहुमत के लिए ज़रूरी किसी संख्याबल में कमी-बेशी से नहीं बल्कि उन मुद्दों से है जिनका असर आने वाले कई हफ़्तों तक रहने वाला है। पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की किताब के हिस्सों को लोकसभा में पढ़ने देने की नेता प्रतिपक्ष की ज़िद ने पूरे देश को यह बता दिया कि किताब में ज़रूर कुछ ऐसा है जिसे सरकार देश पर ज़ाहिर होने देना  नहीं  चाहती।  बताना ही चाहती तो  पिछले पंद्रह महीनों से  रक्षा मंत्रालय  केवल समीक्षा ना कर रहा होता । अगर जो किताब में वाक़ई झूठ लिखा है कि साल 2020 में चीनी टैंकों के भारतीय सीमा में घुसने के समय  सरकार ने काफ़ी समय लेने के बाद भी सेना प्रमुख से यह कहा कि आपको जो उचित लगे वह करें और फिर तब से अब तक चुप्पी ओढ़े रखी है तो यह और भी ख़तरनाक़ मालूम होता है। हमारे देश में सेना चुने हुए नेता के आदेश का इंतज़ार करती है। यह पाकिस्तान नहीं जहां...