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नागरिकता :हम कोई काग़ज़ नहीं मानेंगे

बीते कुछ सालों से एक विचित्र सिलसिला चल पड़ा है। सत्ता काग़ज़ की बात करती है और जनता अपने काग़ज़ी दस्तावेज़ों को खंगालने लगती है। फिर जनता और सरकार के बीच  हम कागज़ नहीं दिखाएंगे से हम कागज़ ही कागज़ देखेंगे के बाद अब हम नागरिकता के लिए किसी भी कागज़  को नहीं मानेंगे पर हालात आकर टिक जाते हैं। फ़िलहाल देश में नागरिकता के लिए कोई भी प्रमाण वैध नहीं हैं। कहने को हम भारतीय नागरिक हैं भी और नहीं भी। ताज़ा बहस और विवाद बुधवार को उस समय पैदा हो गया जब विदेश मंत्रालय ने  पासपोर्ट सेवा दिवस के दिन ही अपने  सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़  के बारे में यह कह दिया कि यह केवल यात्रा के लिए आवश्यक दस्तावेज़ भर है ना कि नागरिकता का कोई प्रमाण। सही है। मान लिया क्योंकि कई देशों में एक से अधिक देशों के पासपोर्ट रखने की रवायत है। जयपुर की एक टेक कंपनी में अपने साथियों से मिलने कभी-कभी माइक  यहां आते हैं। वे ख़ुद आधे फ्रेंच और आधे ब्रिटिश हैं। उनके पास फ्रांस और ब्रिटेन दोनों के ही पासपोर्ट हैं और जिस कंपनी में वे काम करते हैं उसका दफ्तर स्विट्ज़रलैंड में है। हमारे देश में तो ऐसा न...

ये तो खिरते ही जा रहे हैं!

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ये तो यों  खिर रहे हैं ज्यों गुलाब के फूल का समय पूरा होने पर उसकी  पंखुड़ियां खिरा करती हैं या फिर पेड़ के पीले पात जो अपने अंतिम वक्त में उसका साथ छोड़ देते हैं। इनका पतन चौंकाने वाला है, अप्राकृतिक है क्योंकि ये समय से पहले ही झड़े जा रहे हैं। जैसे कोई विष पी लिया हो या कोई तूफ़ान झेल लिया हो। किस-किस का नाम लें।  इनमें तो जैसे गिरने की होड़ लगी है। निर्लज्ज ऐसे कि पनपे कहीं और गिर कहीं ओर रहे हैं। शिवसेना,एनसीपी (नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी),आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने तो झड़ने के  पुराने  सारे  रिकॉर्ड ही तोड़ दिए हैं। तृणमूल को  एक हार क्या मिली इसके तिनके ही मूल से बिखर गए। ये पार्टी तो इस कदर ईमानदार साबित हुई  कि पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने के लिए इनकी ज़रूरत ही नहीं थी, फिर भी टूट गई । टूटने-बिखरने के लिए ऐसा अभूतपूर्व उत्साह कभी देखने को नहीं मिला है। ये तृणमूल वाले ही थे जब संसद में प्रधानमंत्री का भाषण होता था तब सबसे ज़्यादा नारे लगाते थे, सबसे ज़्यादा लामबंद होते थे। इनकी  नारेबाज़ी  इतनी सुरीली होते थी कि ...

मर्दों का 'मी टू' है अनुराग की फ़िल्म बंदर

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अनुराग कश्यप निर्देशित बंदर कई मायनों में बेहतरीन फ़िल्म हो जाती हैं क्योंकि उसके जेल के दृश्य निर्मम सच को सामने रख देते हैं, वे पुलिस वकील की सांठ -गांठ की पूरी पोल खोल देते हैं और उस न्याय व्यवस्था की भी जहां कई बार जज भी अपने पूर्वाग्रहों को पीछे नहीं रख पाते। दरअसल हम इतनी भीड़ और फिर आँखें बंद कर फ़ैसला दे देने वाला समाज हैं कि हमारी जेलें  फिर विचाराधीन कैदियों से भर जाती है। जुर्म साबित होने  से पहले ही वे बलात्कारी,हत्यारे हैं। यहां जेल रूल है और बेल अपवाद। गैंग्स ऑफ़ वासेपुर और देव-डी से चला गालियों और अनुराग का नाता  बंदर में पुलिस और कैदियों से जुड़कर और गहरा हो गया है।  समर (बॉबी देओल) एक 50 साल का एक स्ट्रगलिंग कलाकार है जो एक साथी की तलाश में डेटिंग एप पर आता है। साथी मिलता भी है, सहमति भी बन जाती है लेकिन फिर गायत्री (सपना पब्बी ) का व्यवहार समर को  काफी पजेसिव लगने लगता है। गायत्री उसे  बताती है  कि वह लंदन से मुंबई एक लड़के के लिए आई थी लेकिन वह उसे छोड़ कर भाग गया। वह उसके घर आकर सजावट करती है, उसे समझाती है कि मैं तुम्हारे घर में पसरी नकार...

शर्म तुमको नहीं आती मगर

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अगर सियासत शतरंज का कोई खेल है तो फिर इन दिनों किसके पासे लगातार सही पड़ रहे हैं और कौन है जिसके तमाम पासे तो हमेशा सही पड़े लेकिन अव्यवस्थाओं का पिटारा ऐसा खुला कि अब रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है? देश में हादसे, अपराध, किशोरों की परीक्षाओं और पेपर लीक का तो जैसे अंतहीन सिलसिला चल पड़ा है। कोई भी सरकार ख़ुद को इस हालत में देखना पसंद नहीं करती लेकिन ये तो किसी ज्वालामुखी के पिघले लावे सा सतह पर आता जा रहा है ? ये किशोर जो शायद ही कभी इतने मुखर हुए हों, तकलीफों से इस कदर घिर गए कि बोलने के सिवाय उनके पास कोई चारा  नहीं रहा। वे आगे आकर व्यवस्था के छेद सरकार को दिखा रहे हैं, सवाल पूछ रहे हैं लेकिन कोई इस गड़बड़-झाले की ज़िम्मेदारी नहीं ले रहा। तीन  किशोरों ने  शिक्षा  महकमे को सीधे  आइना दिखाया लेकिन वे अब भी अपनी छवि पर मुग्ध हैं। उससे एक बात तो बिलकुल साफ़ हो गई हमारे देश में   शिक्षा  अब भी  ऊंची प्राथमिकता हासिल नहीं कर पाई है। बजट तो न्यूनतम है ही,व्यवस्था भी दो कौड़ी की साबित हो रही है।    बारहवीं कक्षा के लिए पेपर जांच की समूची व्यवस्था...

ना कोई कॉकरोच ना कोई जनता और ना पार्टी

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सारे कॉकरोच मर गए माय लॉर्ड। अब चिंता की कोई बात नहीं। जनाब ये किसी एक्स के हैंडल से निकले थे, अब वहीं सारे दफ़न हो गए। आप देशहित में बोलना जारी रखिए। अभी तो आंदोलनजीवी, धरनाजीवी और प्रदर्शनजीवियों का ख़ात्मा भी बाक़ी  है। फ़िलहाल तो ये सारे  तिलचट्टे हिट कर दिए गए हैं। बहुत तेल चाटा है इन्होंने देश का। धीरे-धीरे सबकुछ उनकी पहुंच से गायब कर देंगे। ये नमक हरामी भी होते हैं और अपने दो पतले हिलते तंतु यानी टेंटेकल्स आगे कर, उन्हें भी डरा देते हैं जिनकी रसोई में जीते हैं। अब ये किसी खेल में नहीं हैं। बहुत उछल-उछल कर नाच रहे थे। एंटी कॉकरोच का तगड़ा पोछा मार दिया है और ज़रूरत पड़ी तो चप्पल भी चला देंगे, इन्हें कुचलने के लिए लेकिन एक डर है, कम्बख्त बार -बार बच जाते हैं। जुर्रत देखो इनकी शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांग रहे  हैं। अब की बार देश के ये चट्टे कोई पार्टी बनाकर आ गए थे  और देश की सुरक्षा को ही ख़तरे में डाल रहे थे। पेपर लीक-वीक तो होते रहते हैं, तिलचट्टों को चित करना ज़्यादा ज़रूरी है। पर सर अब सब ठीक है।  आप आराम से ऐतिहासिक फैसले लिखिए। सर पर भी।  आख़िर क...

सवाल ये कि वे सवाल क्यों नहीं लेते

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पिछले दिनों भारत के प्रधानमंत्री यूरोप की यात्रा पर थे। इनमें पांच नॉर्डिक देशों के अलावा इटली, निदरलैण्ड जैसे देश भी शामिल थे। ये पांच नॉर्डिक देश डेनमार्क,स्वीडन,फ़िनलैंड,आइसलैंड और नॉर्वे उत्तरी यूरोप और उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र में स्थित हैं और जिनका  रहन-सहन, क़ायदा-क़ानून ऐसा है कि अमेरिका जैसा देश भी अपनी तुलना बस उन्हीं से चाहता है। हमारे देश से जब कोई देसी परिवार इन देशों में जाता है तो वहां 'मिसेस चैटर्जी वर्सेज नॉर्वे' जैसे हालात पैदा हो जाते हैं क्योंकि वहां तो बच्चे को अलग बिस्तर ना दे पाना, हाथ से खिलाना भी अभद्र माना जाता है और भारतीय माता-पिता तो गुस्से में बच्चों को दो-चार जड़ भी देते हैं। ये सब वहां जुर्म समझा जाता है क्योंकि बच्चों के अपने हक हैं।  भारत के  प्रधानमंत्री भी तमाम देशों की यात्रा कर नॉर्वे पहुंचे। यह कोई  43 साल बाद हुई यात्रा थी। सबकुछ बढ़िया चल रहा था। उन्हें नॉर्वे का सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिला था; इटली की प्रधानमंत्री के साथ मिल कर उन्होंने संपादकीय पन्ने पर सहयोग का बड़ा लेख लिखा था; इस साल जनवरी में यूरोप के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौ...

'नीट' नशे में है सिस्टम

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ये जो इन दिनों परीक्षाओं के पर्चे लीक हो रहे हैं, ये पर्चे नहीं बल्कि रक्त है देश के युवाओं का जो बीते कुछ सालों से लगातार लीक हो रहा है। इस रिसाव के साथ जो भरोसा और आस्था व्यवस्था से  डिग रही है, वह भविष्य के संकट के  ख़तरनाक संकेत हैं। इस लीक और फिर परीक्षा के रद्द होने के बाद दो छात्रों ने आत्महत्या कर ली है। ये पढ़ने -लिखने वाले बच्चे हैं इसलिए इनका रुदन, चीत्कार सड़कों पर नहीं है। यह ऐसा है जैसे किसी ने जानबूझ कर इनके ख़िलाफ़ कोई साज़िश रची हो। कल्पना कीजिये कि व्यवस्था से इस तरह ठगा हुआ, धोखेबाज़ी का शिकार छात्र जब समाज में दाख़िल होगा, तब वह कैसे एक  मज़बूत और आत्मविश्वासी नागरिक का प्रतिनिधि होगा? नीट ही नहीं बल्कि अधिकांश सरकारी भर्ती परीक्षाएं कभी भी रद्द हो जाती हैं और कभी नतीजे देने में ही लम्बा वक्त लगा देती हैं । इंतज़ार में उम्र निकल जाती है और युवा निराश। आज भले ही युवा शक्ति पर देश इठलाता हो,आगे लाख ढूंढने पर भी समझ नहीं आएगा कि आखिर ग़लती कहां हो गई ? बेहतर होता नीट परीक्षा को जल्दबाज़ी में रद्द करने की बजाय पहले जांच होती क्योंकि गंभीर गड़बड़ियां ...