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'नीट' नशे में है सिस्टम

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ये जो इन दिनों परीक्षाओं के पर्चे लीक हो रहे हैं, ये पर्चे नहीं बल्कि रक्त है देश के युवाओं का जो एक अर्से से लगातार लीक हो रहा है। इस रिसाव के साथ जो भरोसा और आस्था व्यवस्था से  डिग रही है, वह भविष्य के संकट के  ख़तरनाक संकेत हैं। यह किसी राजनीतिक दल से जुड़ा मसला भर नहीं  है। यह तो एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते ही रहेंगे। चिंता इस बात की है कि इन्होंने पूरे देश में घुन लगा दिया है। यह पढ़ने -लिखने वाले बच्चे हैं इसलिए इनका रुदन चीत्कार सड़कों पर नहीं है। यह ऐसा है जैसे किसी ने जानबूझ कर इनके ख़िलाफ़ कोई साज़िश रची हो। कल्पना कीजिये कि व्यवस्था से इस तरह ठगा हुआ, धोखेबाज़ी का शिकार छात्र जब समाज में दाख़िल होगा, तब वह कैसे एक  मज़बूत और आत्मविश्वासी नागरिक का प्रतिनिधि होगा? नीट ही नहीं बल्कि अधिकांश सरकारी भर्ती परीक्षाएं कभी भी रद्द हो जाती हैं  तो कभी नतीजे देने में ही लम्बा वक्त लगा देती हैं । इंतज़ार में उम्र निकल जाती है और युवा निराश। आज भले ही युवा शक्ति पर देश इठलाता हो,आगे लाख ढूंढने पर भी समझ नहीं आएगा कि आखिर ग़लती कहां हो गई ? बेहतर होत...

कैसे कामयाब हुआ फैक्टर विजय क्या थी सोशल इंजीनियरिंग

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पांच राज्यों के चुनावों में सबसे अप्रत्याशित नतीजे किस राज्य के रहे ? ज़्यादातर का जवाब  शायद पश्चिम बंगाल  होगा लेकिन बंगाल में जीत के लिए जिस स्तर के प्रयास भारतीय जनता पार्टी ने किए उसके बाद अगर ऐसा ना होता तो शायद वह अजूबा होता। करिश्मा तो किया है तमिलनाड़ु की नई नवेली पार्टी टीवीके (तमिलगा वेत्री कषगम) ने। अब तो टूटे-फूटे विपक्ष को भी एक होकर ऐसा नायक ढूंढ़ना चाहिए जिसकी  पूरे देश में लोकप्रियता चरम पर हो, ऐसे फैन क्लब हों जो पार्टी का काडर बन जाएं और सोशल इंजीनियरिंग  ऐसी कि उसे भी चुनाव जितवा दे। तमिलनाड़ु की जनता ने साठ साल पुरानी द्रविड़ियन राजनीति के पांव उखाड़ फेंके ठीक वैसे ही बदलाव के साथ विपक्ष को भी आना होगा वर्ना विलुप्त होने में अब कोई कसर बाक़ी नहीं है।  ये पुराने दल तो ऐसे निर्लज्ज और चालबाज़ हैं कि पश्चिम बंगाल जहां अभी आधिकारिक तौर पर  सत्ता किसी  के हाथ आई भी नहीं है,  हालात का लाभ लेकर  हिंसा का ख़ूनी खेल खेल रहे हैं। देश को क्यों यकीन करना चाहिए ऐसे दलों पर ? ये जो नया यकीन तमिलनाड़ु की जनता ने किया है, यह इसी सड़ांध मारती सियासत...

'पापा भाग गए' के साथ लौटते हैं कई सवाल

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किसी भी नाटक का पहला शो नाटक के साथ उस उत्तेजना, उहापोह और डर को भी दिखा जाता है जो नाटक के पात्र और निर्देशक उस पल में जी रहे होते हैं। पापा भाग गए का पहला शो जब जयपुर के जवाहर कला केंद्र में मंचित हुआ, तब ऐसे ही भाव सब के चेहरे पर थे जो धीरे-धीरे नाटक के  किरदारों और फिर उनके सशक्त भावों में ढलते चले गए। पापा एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति हैं जो दोनों बच्चों का ब्याह कर चुके हैं और अपनी ज़िन्दगी को व्यस्त रखने की कोशिश में लगे हुए हैं क्योंकि पत्नी की मौत सब्ज़ी-मंडी में सांड के उत्पात में हो चुकी है। दस साल तक पापा ने कोमा में रही पत्नी की देखभाल की लेकिन अब वे अकेले हैं। इस अकेलेपन के बीच जब बच्चों को पापा के भागने की सूचना मिलती है तो वे अवाक रह जाते हैं। घर में तूफ़ान मचता है  कि आख़िर इस उम्र में पापा को भागने की क्या सूझी और  कौन हैं ये मिस आलू वाली यानी मिस  अहलूवालिया  जो हमारे सीधे-सादे  पापा पर डोरे डाल रही हैं। दोनों बच्चे जो भले ही अपनी पसंद से शादी कर चुके हैं लेकिन पापा के किसी के साथ होने की बात से वे भी उसी पारंपरिक सोच पर चलने लगते हैं कि हाय इस उम...

क्यों हो 'आप' के लिए मातम

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भला   क्यों होना चाहिए आप के लिए मातम? उसके कुछ सांसद थे, पार्टी में जी नहीं लगा, चले गए। अब नए  चमकदार भविष्य के साथी होंगे। सत्ता का पूरा-पूरा लुत्फ़ लेंगे। क्या हुआ जो कभी वंचितों के अधिकारों और मूल्यों की राजनीति की क़सम खाई थी। जिन आदर्शों और आम आदमी का ज़िक्र करते थे,उसे  ख़ाक कर गए। मक़सद सत्ता में बने रहना था, मलाई खानी थी सो चले गए। जिस पार्टी में गए हैं ,वहां से तो खंभा  भी  चुनाव जीत जाता है। पहली बार विधायक बने भी, मुख्यमंत्री (राजस्थान) बन जाते हैं और कभीकभार तो चुनाव जीते बिना भी। यूं भी जनमत की  परवाह  किसे है। ये तो कुछ बूढ़े विशेषज्ञ, पुरानी राजनीति को बंदर के मरे हुए बच्चे की तरह अपनी  छाती से चिपकाएं रहते हैं और बड़बड़ाते रहते हैं। अब तो खुल के तोड़फोड़,सरकारी एजेंसियों के निर्मम इस्तेमाल और चुने हुए प्रतिनिधियों को उड़ा ले जाने का दौर है। भारतीय राजनीति में चला कांग्रेस मुक्त भारत का नारा अब विपक्ष विहीन भारत की ओर चल पड़ा है। हमने लोकतंत्र को लीकतंत्र बनाने के तमाम हथियार ढूंढ लिए हैं। चुनाव जीतो किसी और दल से, शामिल हो जाओ किसी और दल में...

क्यों हुई हार और मचा हाहाकार

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सरकार का एक पैटर्न है। जब सब-कुछ निर्धारित और सुनियोजित  तरीक़े  से होता है तो वह कमाल का प्रभाव छोड़ती है और जहां कहीं कोई मामला या मुद्दा अचानक सामने आ जाता है, वह गहरी चुप्पी साध लेती है। फिर चाहे वह किसी देश के नेता के लिए अचानक शोक व्यक्त करना ही क्यों ना हो, उसे काफ़ी समय लगता है। अब यह सोच लेना कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम  के साथ नत्थी परिसीमन विधेयक के पारित ना हो पाने की आशंका सरकार को नहीं रही होगी, ऐसी मासूमियत पर फ़िदा हो जाना ही बेहतर है। अचानक बुलाए सत्र में यह तयशुदा नतीजा था क्योंकि इसके बाद से ही  प्रधानमंत्री, सरकार के बड़े मंत्री, मुख्यमंत्री पार्टी का महिला मोर्चा जिस तरह मोर्चा खोले नज़र आए वह सब स्टेज शो की तरह लगता है और बड़ी तैयारी को ज़ाहिर करता है। बिल को परिसीमन से जुड़े 131 वें संविधान संशोधन से ना जोड़ महिला आरक्षण के विरोध से जोड़ने के विपक्ष को हर तरह से घेरने के प्रयास जारी हैं। फिर क्या जानबूझ कर ऐसी ही पटकथा रची गई ?  सच है कि कोलकाता चुनाव कवरेज के लिए गईं महिला रिपोर्टरों तक का अपना अनुभव रहा है कि यहां उत्तर की तरह देर रात सड़कों पर अकेले...

धार्मिक मामलों में ना उलझे अदालत?

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इस समय भारत के सुप्रीम कोर्ट में बड़ी बहस जारी है कि धार्मिक आस्था मूलभूत अधिकारों का हनन नहीं कर सकती, तब क्या धर्म के मामलों में न्यायालय निर्णय ले सकता है? इस बहस को जन्म दिया हैं सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर महिलाओं के हक़ में आए फ़ैसले ने।  सबरीमाला मामले में सर्वोच्च अदालत का फ़ैसला अक्टूबर 2018 में आया था। पांच जजों की पीठ में से चार ने कहा था कि मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित नहीं किया जा सकता। केवल एक जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा था कि धार्मिक मामलों को तय करना कोर्ट का काम नहीं है जब तक कि यह सति प्रथा जैसी कोई सामाजिक बुराई न हो। उनका मानना था कि सबरीमाला मंदिर को अपनी व्यवस्था कायम रखने का अधिकार भारत का संविधान (आर्टिकल 25) देता है और इसे आर्टिकल 14 जो की समानता का अधिकार सुनिश्चित करता है, उसकी कसौटी पर नहीं परखा जा सकता। उनका यह भी मानना था कि इस फ़ैसले के दूरगामी परिणाम होंगे। तब यह मामला दस साल बाद अपने निर्णय पर पहुंचा था और बेशक़ यह आधी आबादी को उसके हक़ हासिल होने का बड़ा अवसर था लेकिन इस निर्णय का विरोध भी हुआ।  मामला रिव्यु पेटिशन के बाद 20...

मानसिक दिव्यांग बच्चे जैसे हैं, उन्हें स्वीकारे

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आपका धैर्य ही मानसिक दिव्यांग बच्चों की ताकत -डॉ राठी    उन अभिभावकों की चिंता थी कि उनका बच्चा सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों में उनके साथ नहीं जाता,कभी बहुत शांत होता है तो कभी बहुत गुस्से में ,मोबाइल फोन के लिए हिंसक हो जाना और किसी भी एक चीज़ के लिए जुनून की हद लांघ देना जैसी मुश्किलों का क्या कोई इलाज है भी या नहीं। वे अपने बच्चों को खुश देखने के लिए सब कुछ कर सकते हैं लेकिन कोई राह नहीं मिलती। इन तमाम चिंताओं को जब मानसिक तौर पर  दिव्यांग बच्चों के माता-पिता ने संस्था में साझा किया तो उनके चेहरे पर राहत के भाव थे।  इंदौर सोसाइटी फॉर मेंटली चैलेंज्ड संस्था द्वारा आयोजित इस कार्यशाला में   साइकाइट्रिक एवं बिहेवियर प्रॉब्लम विशेषज्ञ  डॉक्टर पवन राठी ने बताया कि बेशक इन बच्चों के साथ थोड़े अतिरिक्त प्रयास करने होते हैं लेकिन असंभव कुछ भी नहीं है। उन्हें आपके  धैर्य और समय दोनों की जरूरत होती है। आप देखेंगे कि यह व्यवहार बच्चे परिवार और अपने आस-पास के माहौल से ही लेते हैं। आपको उस माहौल को समझना है। डॉ राठी ने कहा कि उनकी छोटी-छोटी उपलब्धियों प...