यूजीसी उच्च शिक्षा पर तुच्छ लड़ाई


किसी को क्या ही एतराज़ हो सकता है जो उच्च शिक्षण संस्थाओं में  छात्रों के लिए ऐसी उच्च स्तरीय समितियां बनती जो पिछड़े, गांव-देहातों से आने वाले छात्रों की तकलीफ़ पर मरहम रखतीं। उन्हें ऐसा माहौल देतीं  कि वे तमाम बाधाओं को दूर कर सभी शैक्षणिक सत्रों को आसानी से पार कर देश का उज्ज्वल भविष्य बनते। उन्हें रोहित वेमुला (2016) और डॉ पायल तड़वी (2019) की तरह आत्महत्या ना करनी पड़ती। ऐसे कई नाम हैं जो उच्च शिक्षा के परिसरों में भेदभाव का शिकार होकर मौत को गले लगा लेते हैं। कभी शिक्षक तो कभी सहपाठी उन्हें यह अहसास कराते हैं कि अपने अतीत  को यूं ना भूलो। यहां आना तुम्हारी प्रतिभा नहीं, ख़ैरात  है। जो वाकई सरकार ने मर्म को समझा होता तो ये हंगामा ना बरपा होता,सामाजिक समरसता को यूं आघात न लगता। विरोध में ऐसे प्रदर्शन और अपशब्दों का प्रयोग हुआ कि जो कोई और मौका होता तो विरोधियों के ख़िलाफ़ बड़ी धाराएं लगती ,उनके घर बुलडोज़ होते। ऐसा ना होने से संदेश गया कि अगड़े -पिछड़ों का सुलगते  तंदूर में जितनी राजनीतिक रोटियां सेंक सकते हो सेंक लो। 

देश इससे पहले 1989 में भी इस तंदूर को धधकता हुआ देख चुका है, तब सैकड़ों युवाओं ने सड़कों पर आकर ख़ुद को आग के हवाले कर दिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की थीं। इस बार की बेक़ाबू आग, बयानों की आग थी। समाज के महीने ताने-बाने और समरसता को जलाने की कोशिश थी। घृणा और आवेश में ऐसी भाषा बोली गई कि ये सब सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद ये अब थैली में मुंह देकर तो रोना भी चाहें तो नहीं रोएंगे क्योंकि कुछ लोग वही बोलते हैं जो पटकथा में लिखा होता है। अगड़ों-पिछड़ों के इस समर में  कई लोग दुःखी थे और कह रहे थे कि अब तो मुंह पर अंगुली रख लो क्योंकि कमान से तीर और ज़ुबां से बात निकलने के बाद कभी वापस नहीं होती। शायद ऐसे दुःख को मज़बूत आवाज़  देने वाले अब मौन हो गए हैं। सरकार चाहती तो सवर्णों में कमज़ोर वर्ग को आरक्षण देने की तरह इन नए नियमों को भी विश्विद्यालयों में लागू कर सकती थी क्योंकि उच्च शिक्षा आयोग ने ख़ुद माना है कि जातीय भेदभाव के मामले 118 फ़ीसदी की रफ़्तार से बढ़े हैं।  

गुरूवार को  सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और उच्च शिक्षा आयोग को फटकार लगाई कि जब 2012 के नियम पहले ही लागू थे तब यह नए और  ऊटपटांग नियमों की क्या ज़रूरत थी। सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी थी -" ये अलग हॉस्टल बनाने की बात क्यों कहते हो, हम सब भी छात्रावासों में रहे हैं, साथ रहते थे।  हमने अंतर्जातीय विवाह व्यवस्था को भी विकसित किया और अब ये सब।  हम जातिभेद से मुक्त समाज की ओर जा रहे हैं या फिर पीछे ?" दरअसल ऊंच-नीच को मिटाने के लिए बनी नई नियमावली इतनी कमज़ोर और नाटकीय थी कि दो जजों की पीठ को कहना पड़ा कि ये कायदे क़ाबिल  विशेषज्ञों के ज़रिये बनाएं जाएं वरना ये तो समाज को बांट देंगे और इसके दूरगामी परिणाम बहुत ख़तरनाक़ होंगे। रही अंतर्जातीय विवाहों की बात तो राजस्थान के राज्यपाल ने अशोक गहलोत सरकार के उस बिल को लौटा दिया है जो ऑनर किलिंग के अपराधियों को बड़ी सज़ा की पैरवी  करता था। 


तब क्या सरकार ने बिना विचारे 'यूजीसी प्रमोशन ऑफ़ इक्विटी रेग्युलेशंस 2026' को मंज़ूरी दे दी। बेशक़ सुप्रीम कोर्ट ने ही सरकार को रोहित वेमुला और अन्य छात्रों की ख़ुदकुशी के बाद आई याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सरकार को निर्देश दिया था कि उच्च शिक्षण संस्थाओं में इस भेदभाव और दुर्व्यवहार को ख़त्म करने के लिए नए नियम बनाए जाएं। फिर सरकार ने जो बनाया उस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी। सवाल यही है कि क्या फिर यह नूरा कुश्ती थी।आख़िर क्यों  सरकार क्यों ऐसी आधी-अधूरी तैयारी के साथ सामने आती है। इससे पहले राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी 2014),आधार अधिनियम (2016),चुनावी बांड योजना(2017) , नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए  2019), कृषि क़ानून (2020), जैसे कई क़ानूनों को भी अदालत में चुनौती मिली जो बताता है कि लोकप्रियता की आसक्ति में देश ,समाज और व्यवस्था सब को ताक पर रखने में ये अतिरिक्त ऊर्जा ख़र्च की जाती है। यही यूजीसी- 2026' के प्रावधानों में भी नज़र आया जिस पर कोर्ट सुझाव दिया कि विशेषज्ञों की एक समिति इन नियमों में खामियों को भरने पर विचार कर सकती है।

 कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भेदभाव रोकने के लिए यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन  ने 13 जनवरी 2026 को नए नियम जारी किए थे। ये नियम इसी विषय पर 2012 में लागू किए गए नियमों की जगह जारी किए गए थे जिसके बारे में भी अदालत का कहना था कि भेदभाव की बेहतर परिभाषा जब पहले ही पुरानी नियमावली में मौजूद है तो नई को व्यर्थ जोड़ना फालतूपन के आलावा कुछ नहीं है। शायद सत्ता को अशांति और विवाद में आनंद आता है। वह चाहती तो इस स्थिति को रोक सकती थी। ज़हरीले बयानों को चलने दिया गया जैसे वह इस ड्रामे की हामी थी। तब क्या सियासत ऐसा ही कारोबार है जहां समाज की समरसता में यूं ज़हर घोला जाता है? 1989 में सैकड़ों युवा जलकर खाक हो गए और 2026 नए तमाशे की मिसाल बन गया। अब ये बहस क्यों नहीं उठी कि सरकार न्यायालय से ऊपर है। सरकार जनता चुनती है, इसीलिए वही सुप्रीम है। बेहतर होता इस पर संसद में बहस होती तो संभवतः एक पुख्ता गाइड लाइन तैयार होती। 

प्रख्यात इतिहासकार रोमिला थापर (94) ने अपनी किताब भारत के इतिहास में लिखा है -'ईसा से एक हज़ार साल पहले के दौर में भारतीय लोगों का विश्वास था कि उनके देश जैसा कोई दूसरा राष्ट्र नहीं है,उनके जैसा राजा कहीं नहीं, धर्म कोई नहीं और और विज्ञान कहीं नहीं है। वे जो कुछ जानते हैं उसे दूसरों को बताने में कंजूस हैं और वे बहुत सतर्क रहते हैं कि उनकी विद्या कुछ लोगों के पास ही सुरक्षित रहे और इसे कोई दूसरी जाति ना जान ले और वे अपने ही लोगों से अपनी जानकारियों को विदेशियों  से भी ज़्यादा छुपाते हैं।'  लगता है जैसे कुछ लोग अब भी वैसा ही भारत चाहते हैं जहां एक बड़ा वर्ग जन्म और भाग्य पर भरोसा करते हुए सेवा में लगा रहे। कुछ लोगों में अब भी दंभ है कि वे ही श्रेष्ठ हैं और नागरिक होने का हक़ भी उनके पास ज़्यादा है। यही वजह है कि आज़ाद भारत में भी जहां हर नागरिक बराबर है, कुछ का यह घमंड जाग जाता है। अभी बहुत कुछ बदलना बाक़ी  है। विद्यार्थियों को उनका सम्मान  देना बाक़ी है ,विश्वविद्यालय परिसरों में भेदभाव रोकना बाकी है। ऐसा होता तो आदिवासी जनजाति की प्रतिभाशाली डॉ पायल तड़वी आत्महत्या नहीं करती। उन्हें उनके साथी उन्हें जातिसूचक शब्दों से प्रताड़ित करते थे। यह सब उच्च शिक्षा संस्थानों में अब भी है और सुप्रीम कोर्ट ने अभी भले ही नियमावली पर रोक लगाई हो वह 19 मार्च को  फिर सुनेगी। गोरख पांडेय की एक कविता है -

वे डरते हैं

किस चीज़ से डरते हैं वे

तमाम धन-दौलत

गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद?

वे डरते हैं

कि एक दिन

निहत्थे और ग़रीब लोग

उनसे डरना बंद कर देंगे।




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