जनता ने बदल दिए अरावली और उन्नाव के फ़ैसले
अच्छी बात है कि अरावली और उन्नाव से नए साल पर नई सदा आई है । यह जनता कि सदा है, उसकी आवाज़ है जिसे दबाया जा रहा था। सत्ताधारियों ने तो बलात्कार के दोषी को ज़मानत और अरावली की प्राचीन पहाड़ियों को साफ़ करने की पूरी तैयारी कर ली थी। बलात्कारी को उस मामले में ज़मानत मिली जहां पीड़िता एक किशोरी थी, जिस पर दबाव बनाने के लिए उसके पिता और वकील की भी हत्या कर दी गई थी और हिमालय से भी प्राचीन पर्वतमाला अरावली को लील जाने के इंतज़ाम भी पूरे थे। हमारी प्राचीन संस्कृति में प्रकृति को मां यानी स्त्री माना गया है लेकिन आज के निज़ाम ने दोनों को ही तकलीफ़ देने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। कॉर्पोरेट और सियासी सांठ-गांठ यूं तो सालों से अरावली को रौंदता आ रहा है लेकिन अब तो नई परिभाषा कि सौ मीटर से नीचे की पहाड़ी कोई पहाड़ी ही नहीं होगी, देश के बड़े हिस्से में रेगिस्तान को फैलने को खुला न्योता है। इस फैसले ने अरावली के खनन, तोडफ़ोड़ और इसकी गोद में बेशुमार होटल और आरामगाह बनाने के सारे रास्ते खोल दिए, बिना यह विचारे कि यह राजस्थान समेत चार प्रदेशों की जीवन-रेखा है। ये जो दिल्ली कुछ सालों से सांस लेने के लिए लगातार हांफ रही है, उसका नाता भी अरावली की तबाही से जुड़ता है। अच्छा यह हुआ है कि इसे कानूनी संरक्षण देने की साज़िश को क़ुदरत की गहरी समझ रखने वाली जागरूक राजस्थानी जनता ने बेनकाब कर दिया है। वह इन चंदा खानेवाली सियासी पार्टियां के ख़िलाफ़ सड़कों पर आप गई। वर्षों पहले पर्यावरण विद और गांधीवादी विचारक अनुपम मिश्र ने राजस्थान की इसी अनुपम समझ का ज़िक्र अपनी किताब 'राजस्थान की रजत बूंदें' में किया था।
अनुपम मिश्र ने किताब में लिखा था कि देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान की कुंडली, कम से कम जल के मामले में तो मंगली ही रही है। इसकी अरावली पर्वतमाला की ऊंचाई भले ही कम हो लेकिन उम्र में हिमालय जितनी ही प्राचीन है। अरावली के पश्चिम में जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर, जालौर आदि ज़िलें हैं तो पूर्व और दक्षिण में उदयपुर, चित्तौड़गढ़ भीलवाड़ा, कोटा, जयपुर आदि ज़िलें आते हैं। अरावली की गोद में सिरोही, डूंगगरपुर, आबू (राजस्थान का एकमात्र हिलस्टेशन माउंट आबू )अजमेर, अलवर ज़िले खिलते हैं। वर्षा के लिहाज़ से यही राज्य का संपन्न इलाका माना जाता है। इसकी सीमा उत्तर-पूर्व में दिल्ली को और दक्षिण पश्चिम में गुजरात को छूती है। राजस्थान के आकाश में मानसून की हवा दो तरफ़ से आती है। एक पास से यानी अरब सागर से और दूसरी बंगाल की खाड़ी से। बंगाल की खाड़ी से उठने वाली मानसून की हवा गंगा का विशाल मैदान पार करते हुई अपनी सारी नमी खो देती है। अरब सागर से उठी मानसून की हवा जब यहां के तपते क्षेत्र में आती है तो यहां की गर्मी से उसकी नमी आधी रह जाती है इसलिए अरावली के समानांतर बहती हुई वह वर्षा करती है जिससे सिरोही और आबू में झमाझम वर्षा होती है।
अध्ययन बताता है कि यह भाग अरावली के ऊँचे स्थानों में है और जो इन्हें छोटा किया गया तो रेगिस्तान का विस्तार बढ़ता ही जाएगा। ये जो रेत है जो रेगिस्तानी इलाकों खासकर जैसलमेर और बाड़मेर की सड़कों,रेल की पटरियों और घरों को छुपा देती है वह तेज़ हवाओं के साथ दिल्ली, हरियाणा,मध्यप्रदेश तक पहुंचेगी और इसके वातावरण को बहुत नुक़सान पहुंचाएगी। यह पहुंचा भी रही है क्योंकि इसका एक बड़ा कारण अरावली का अधांधुंध दोहन है। यह अरावली ही है जो मरुधरा की रेत को आगे फैलने नहीं देती। इन पहाड़ों को छोटा करने की योजना इसलिए भी है क्योंकि यहां संगमरमर,ग्रेनाइट, डोलोमाइट,तांबा, जस्ता, सीसा, चांदी, अभ्रक और जिप्सम जैसे अन्य खनिजों का भंडार है और यही इसके ख़ात्मे की वजह बन रहा है। अकेले राजस्थान में अवैध खनन के चार हज़ार से भी ज़्यादा मामले दर्ज़ हैं। जनता के अरावली बचाओ अभियान ने सर्वोच्च न्यायालय को 20 नवंबर 2025 को अपने ही फैसले पर पुनर्विचार के लिए मजबूर किया ताकि वह सरकार से कहे कि अरावली की पहाड़ियों की परिभाषा बदल उसे यूं ज़मींदोज़ ना होने दे। सुप्रीम कोर्ट को ये सुझाव केंद्र की उच्च स्तरीय समिति ने ही सुझाए थे। 100 मीटर की ऊंचाई की परिभाषा इस कदर ख़तरनाक़ है कि अरावली की 90 फ़ीसदी पहाड़ियां साफ़ हो जाएगी और देश के कई राज्य अभूतपूर्व पर्यावरणीय खतरे की ओर बढ़ जाएंगे।
इधर बीते सप्ताह उन्नाव की पीड़िता को भी हाईकोर्ट ने इंसाफ देने से इंकार करते हुए भारतीय जनता पार्टी के पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को ज़मानत दे दी थी। साल 2017 में पीड़िता की उम्र सोलह साल थी जब उसके साथ सामूहिक बलात्कार हुआ। भाजपा के पूर्व सदस्य और विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को आजीवन जेल हुई। न्याय मिलने की प्रक्रिया तब जाकर शुरू हुई जब किशोरी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आवास के सामने खुद को जलाने की कोशिश की। उसकी हालत इतनी नाज़ुक़ थी कि न्यायालय के निर्देश पर ही उसका केस और वह दोनों ही इलाज के लिए दिल्ली शिफ़्ट हुए। इस बीच उसके पिता को हिरासत में ले लिया गया जहां उनकी मौत हो गई। बाद में उसके वकील की भी हत्या हो गई। मार्च 2020 में ग़ैर इरादतन हत्या के मामले में सेंगर को दोषी ठहराया गया,दस साल की सज़ा हुई। दिल्ली में रहते हुए उसकी शादी हुई। दो बच्चे हैं। अब उसका पति भी इस लड़ाई में उसके साथ है। न्याय की उम्मीद में थी कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने सेंगर को ज़मानत दे दी। फ़ैसले से बेहाल पीड़िता और उसके साथ सामाजिक कार्यकर्ता को कुछ नहीं सूझा और वे इंडिया गेट पर जाकर बैठ गईं। उन्हें वहां से पुलिस ने जबरदस्ती उठा दिया। पीड़िता अब भी आत्मदाह की चोटों से उबरी नहीं है। उसे इसके बाद तो मीडिया ने मुद्दे को कवर किया, जनता ने उसके समर्थन में मोर्चा निकाला। नतीजा यह हुआ 29 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने कुलदीप सिंह सेंगर की ज़मानत के फ़ैसले पर रोक लगा दी। यह पीड़िता के साथ उन जनभावनाओं का भी आदर था जो सरकार को आईना दिखाने का माद्दा रखती है।
महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद का जन्म ज़िला भी उन्नाव है। बेशक उन्होंने सद्गति जैसी मार्मिक कहानी लिखी थी जिसमें रसूखदार अपने काम के लिए दलित कामगार का ऐसा शोषण करता है कि उसकी जान ही चली जाती है। क्या उनके पाठक पूरे यकीन से कह सकते हैं कि इसी उन्नाव ज़िले के माखी गांव की बेटी के साथ जो सामूहिक बलात्कार हुआ और उसके बाद रसूख़दारों के ऐसे जघन्यतम व्यवहार की कल्पना ख़ुद प्रेमचंद ने भी नहीं की होगी। कैसे समाज में तब्दील हो रहे हैं हम ? कुछ भी तो नहीं बदला है। बेशक यह लड़ाई एक ग़रीब परिवार की लड़की और ताकतवर की लड़ाई है जिसमें हारना मानवता की मौत होता। सुप्रीम कोर्ट ने फ़िलहाल तो बचा लिया है। अदम गोंडवी के दो शेर हैं -
तुम्हारी फ़ाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आँकड़ें झूठे हैं ये दावा किताबी है
लगी है होड़-सी देखो अमीरी और ग़रीबी में
ये पूंजीजीवाद के ढांचे की बुनियादी ख़राबी है


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