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आ से आम नहीं आंदोलन

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इस निज़ाम में आ से आम नहीं आंदोलन होता है और ड से होता है उसका डर। आम युवा की फ़िक्र ना करना और जब वह किसी प्रदर्शन का हिस्सा बनें तो फिर पूरे देश में ऐसा माहौल बनाना कि ये युवा भ्रमित हैं, दिशाहीन हैं ऐसा भला कौन करना चाहेगा लेकिन ऐसा ही हो रहा है। राजस्थान,उत्तरप्रदेश,बिहार,उत्तराखंड के युवाओं की पेपर लीक की बेचैनी,चयनित प्रशानिक अधिकारियों के नतीजों को रद्द करने की तकलीफ़ और इससे उपजी व्यापक बेरोज़गारी को नज़रअंदाज़ कर सरकार अपनी मदमस्त चाल से चल ही रही थी कि सीमा पर लेह और लद्दाख में हालात बेकाबू हो गए। शांति पूर्ण प्रदर्शन हिंसक विरोध में बदल गया,भारतीय जनता पार्टी का कार्यालय आग के हवाले हो गया क्योंकि सरकार ने सुनने में देर की। इतिहास गवाह है कि युवा वायु के प्रचंड आवेग से होता है जो समय रहते उसकी तक़लीफ़ वाली नब्ज़ पर हाथ नहीं रखा तो फिर यह आंधी तूफ़ान में बदलते देर नहीं लगती। यही लद्दाख में हुआ है। युवाओं की जान गई है। आखिर क्यों सरकार समय रहते बातचीत नहीं करती ? क्यों कोई युवा यह जानते हुए भी कि पुलिस की लाठी,गोली किसी भी पल उसके जीवन का शिकार कर सकते हैं, वह सर पर कफ़न बांध लेता है ? स...

फेसबुक से बड़ी है संविधान की बुक

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क़रीब  चार दशक पहले की बात है। इंदौर की विष्णुपुरी भी किसी आम मोहल्ले जैसे ही थी और यहां के रहवासियों ने भी रात की चौकीदारी के लिए एक नेपाली तैनात कर रखा था। कोई उन्हें गोरखा कहता, कोई नेपाली तो कोई जंग बहादुर के नाम से बुलाया करता। रात को साइकिल पर चलकर जब वे सीटी बजाते तो हम बच्चे डर कर बिस्तर में दुबक जाते। जब यही सीटी  बार -बार बजती तो लगता कि आज तो  ज़रूर  बहादुर अंकल  ने  किसी चोर को देख लिया है। महीने के अंत में जब वे अपनी  गहरी हरी वर्दी में 30-40 रुपए लेने आते तो सब बड़े उनसे एक ही शिकायत करते, रात को सिटी क्यों नहीं बजाते, बहुत दिनों से आवाज़ ही नहीं सुनी तुम्हारी,सो जाते हो क्या? पता नहीं कितने घरों में  इन सवालों को उन्हें सुनना पड़ता लेकिन उनकी ज़ुबां से कभी किसी ने कोई तेज़ या कर्कश ध्वनि नहीं सुनी। शलाम शाब ,जी शाब कहते-कहते वे विदा ले लेते। आज जब उनके बच्चों के बच्चों ने यानी जेन ज़ी जो 1996 के बाद पैदा हुई है, उसने आंदोलन कर दिया है तो विचार करना चाहिए कि पड़ोस में इस अशांति और बेचैनी किस क़दर रही होगी ? क्यों अपने चुने हुए नेताओं के प्रति ...