शादी में सब चलता है रेप भी


'रेवोलुशनरी रोड्स' उसी जोड़े की हॉलीवुड फ़िल्म है जिनकी पहली ही फ़िल्म ने दुनिया को अपना दीवाना बना दिया था।आलीशान जहाज टाइटैनिक के डूबने की दास्तान में जब रोज़ और जैक का प्रेम  उतरता है तब यह फ़िल्म ज़्यादातर दर्शकों की आल टाइम फ़ैवरेट की सूची में आ जाती है। रेवोलुशनरी रोड्स में केट विंसलेट अप्रैल हैं और लिओनार्दो डिकैप्रियो  फ्रैंक। दोनों का दाम्पत्य अच्छा नज़र आता है, बच्चे भी हैं लेकिन ज़िन्दगी में गहरा खालीपन है। फ्रैंक अपनी सेल्समेन की नौकरी से ऊब रहा है। अप्रैल उसे याद दिलाती है कि फ्रैंक तुम जैसे जीना भूल रहे हो, क्यों ना हम, सब कुछ छोड़ पैरिस चलें क्योंकि यही तो तुम्हारा सपना था जब तुमने कहा था कि मैं हर चीज़ महसूस करना चाहता हूं, बस ज़िन्दगी जीना चाहता हूं। दोनों पैरिस जाने का मन बना लेते हैं। फिर अचानक फ्रैंक को नौकरी में तरक्की का प्रस्ताव मिलता है और वह यहीं रह जाना चाहता है लेकिन अप्रैल को बता नहीं पाता। वह खेल रचता है। अप्रैल गर्भवती हो जाती है। अपने तीसरे बच्चे को जन्म देने की तैयारी में देश छोड़ना मुश्किल होता है। इस तर्क के आधार पर फ्रैंक पैरिस जाने का फ़ैसला बदलना चाहता है। संवेदनशील अप्रैल इस छल को सह नहीं पाती।  कहानी का अंत दर्दनाक है।

कहानी विकसित देश की है और एक भारतीय को लग सकता है कि क्या मज़ाक है। पति अच्छा-ख़ासा कमा रहा है, ज़िन्दगी जीने का ऐसा भी क्या फितुर। बिना प्रेम के ही सही, बच्चे को स्वीकारना क्या मुश्किल है। वे बेझिझक इसे अप्रैल की बेवकूफी बता जज बनना चाहेंगे। सच तो यह है कि पति-पत्नी के रिश्ते की डोर आपसी विश्वास के महीन धागे से बंधी होती है और अप्रैल ने इसे छीजते हुए देख लिया था। इस ज़बरदस्ती को वैवाहिक दुष्कर्म का नाम दिया जाता है और जिन देशों में स्त्री को अधिकार व समानता का दर्जा प्राप्त है वहां यह कृत्य कानूनन भी अपराध है। हम तीसरी दुनिया के देश और सरकार मानते हैं कि ऐसा क़ानून बनने से शादी संस्था खतरे में आ जाएगी और यह भी कि शादी में सब जायज़ है।

मैरिटल रेप या वैवाहिक दुष्कर्म  की अवधारणा ही भारतीय समाज को अनुचित लगती है क्योंकि समाज इस बात को स्वीकारना ही नहीं चाहता  कि आख़िर पति की मर्ज़ी को कोई पत्नी अस्वीकार भी कर सकती है। जहां पत्नी की इच्छा की स्वीकार्यता ही ना हो, वहां इसे अपराध कैसे माना  जा सकता है। दुनिया के 150 देश इसे अपराध मानते हुए कानून बना चुके हैं। इन देशों में ज़रूरी है कि पति, पत्नी की सहमति का आदर करे। फ्रांस ने 1990, इंग्लैंड ने 1991 और जर्मनी ने 1997 में इसे अपराध माना। अमेरिका के अलग-अलग राज्यों में 10 से 14 फीसदी मामले वैवाहिक बलात्कार के आते हैं। दुनिया में वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानने का इतिहास सौ साल से भी ज़्यादा का है। तत्कालीन सोवियत संघ ऐसा पहला देश था जिसने 1922 में वैवाहिक बलात्कार को जुर्म माना। इसके बावजूद बीते कुछ सालों में  जब भी, जिस भी रूप में यह मसला भारतीय न्यायालय  के सामने आया, संवेदनशीलता बरती गई है।


यूं दो साल पहले भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने गर्भपात के फैसले पर स्त्री को हक देकर उसके सशक्तिकरण की दिशा में सहज ही बड़ा कदम बढ़ा दिया था। यह और बात है कि कुछ लोगों ने जो ना स्त्री के शरीर से वाकिफ हैं और ना उसकी भावनाओं से, न्यायालय की व्याख्या को मनमौजी व्याख्या कहा था । यह समझना ज़रूरी है कि भारतीय संविधान मानव अधिकारों को  सर्वोपरि मानता है, बिना किसी लिंगभेद के और यह उस महान संस्कृति का भी प्रतिनिधित्व करता है जहां कि प्राचीन संस्कृति में  संतान की पहचान उसकी जन्मदात्री से होती है। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फ़ैसले में कहा था कि इसके तहत हर स्त्री को यह अधिकार होगा कि वह अपनी मर्जी से 24 हफ्ते के गर्भ पर फैसला ले सकती है फिर चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित। जस्टिस डी वाय चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय पीठ ने कहा था कि इस कानून में वैवाहिक दुष्कर्म यानी मैरिटल रेप को भी शामिल माना जाना चाहिए। पीठ का यह भी कहना था कि कानून के उद्देश्य को देखते हुए विवाहित और अविवाहित का यह फर्क बहुत ही कृत्रिम हो जाता है और इसे संवैधानिक रूप से कायम नहीं रखा जा सकता। यह उस रूढ़िवादिता को भी कायम रखना होगा कि केवल विवाहित महिलाएं ही यौन संबंधों में होती हैं। बहरहाल एक अच्छा लोकतंत्र वही है जो  अपने नागरिकों के प्रताड़ित होने और चीखने से पहले ही वे अधिकार दे जो गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए ज़रूरी  होते हैं। 

क्या मैरिटल रेप या वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानने के पक्ष में यह मज़बूत तर्क नहीं है ? राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार 83 फीसदी महिलाओं का कहना है कि उनके पतियों ने उनके साथ यौन हिंसा की है। संयुक्त राष्ट्र की समिति ने भी भारत के सन्दर्भ में सिफारिश की है कि वैवाहिक बलात्कार को दंडनीय अपराध घोषित किया जाए। संयुक्त राष्ट्र पॉपुलेशन फंड के मुताबिक भारत में 75 फीसदी विवाहित महिलाओं को  जबरन संभोग का सामना करना पड़ता है। गौरतलब है कि नेपाल ने भी पत्नी की सहमति के बिना सेक्स को वैवाहिक बलात्कार के दायरे में रखा है। पांच साल की सज़ा का प्रावधान है। 

कानून के दायरे में लेने के लिए  न्याय व्यवस्था ,सरकार, सामाजिक संगठनों  सबको एक साथ माथा जोड़कर बैठने की ज़रूरत है। निर्भया बलात्कार मामले के बाद जस्टिस  जेएस वर्मा समिति  ने 2013 में अपनी रिपोर्ट में जो सिफारिशें दी थीं उसमें साफ कहा  था कि आईपीसी की धारा 375 जो पति को प्रोटेक्शन देती है, उसे हटा दिया जाना चाहिए। धारा 375 में सभी तरह के यौन उत्पीड़न और असहमति  के मामले शामिल किये जाते हैं। यहां पति को छूट है। वक्त भले ही बदला हो लेकिन स्त्री के लिए भारतीय कानून की घड़ी वहीं  ठहरी हुई है। 1860 के अंग्रेजी शासन में लार्ड मैकाले की आईपीसी में मैरिटल  रेप में अपवाद 10 साल से तक की बच्चियों पर लागू था जिसे 1940 में बढ़ाकर 15 कर दिया। आज़ाद भारत ने इसे ही क़ायम रखा है क्योंकि बाल विवाह आज भी रुके नहीं हैं। यहां तक की छोटा- सा देश नेपाल भी महिला के इस दर्द को कानून के दायरे में लेता है लेकिन भारत अब भी उसी  दकियानूसी और पुरातन सोच का हामी है जिसके हिसाब से पति बलात्कार का दोषी हो ही नहीं सकता क्योंकि वैवाहिक सहमति और अनुबंध से पत्नी ने पति के सामने खुद को सम्पर्पित कर दिया है। रास्ता क्रांतिकारी यानी 'रेवोलुशनरी रोड्स' से होकर ही गुज़रता है। घरेलू हिंसा में यह बतौर हथियार काम में लिया जाता है। वैसे इस बार महिला दिवस की थीम है 'गिव टु  गेन' है। यहां कुछ गिवअप करना पड़ेगा। शादी में यौन हिंसा को।दीक्षा धाबाई की कविता 'वैवाहिक दुष्कर्म' का यह अंश महिला के दर्द और व्यथा को बयां करता है 

मेरी सांसों को स्वतंत्र करो मेरे जिस्म से

करो आज़ाद मेरे जिस्म को उसकी जकड़न से

धिक्कार है, धिक्कार है

ऐसे पवित्र विवाह के बंधन को

जिसमें "अनुमति" का नहीं कोई द्वार है

करो आज़ाद मेरी बाज़ुओं पर बोझिल

उसकी मर्दानगी के हथकंडे

करो आज़ाद उन गहरे गढ़े नाख़ूनों को

नोचा है जिन्होंने मास मेरा

करो आज़ाद मेरे गालों पर चढ़ी

उसकी सख्ती की लाली को

करो आज़ाद हे नाथ! करो आज़ाद!

मेरी हर श्वास बोझिल है तन पे

हसरत एक जो कातिल है मन पे

कि अब तो प्राण हर जाओ

सदैव के लिए ही मुझे मौन कर जाओ

हे यमराज, चले आओ! चले आओ!





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