बूढ़े युद्ध शुरू करते हैं और जवान शहीद


" बूढ़े युद्ध शुरू करते हैं और जवान इसमें लड़ते और जान देते हैं" -हर्बर्ट हुवर 

 पश्चिमी एशिया में युद्ध की लपटें भयावह हो गई हैं। एक ऐसा युद्ध जिसमें चुन-चुन के हत्याएं भी हो रही हैं, तेल और गैस के मुहानों पर सीधे हमले हो रहे हैं, ग़रीब देश और गहरी तकलीफ़ में आ गए हैं। हैरानी और दुःख की बात यह है कि शांति के प्रयास बिल्कुल सिफर हैं। सहायता पहुंचाने के लिए जहाज़ तैयार हैं लेकिन अमन की बात पर मौन है। इस कबीलाई दुनिया में कोई एक भी नेता नहीं बचा है जो तेल के  लिए जारी इस जंग  में जनता के तेल निकलने की स्थिति को समझ सके,बोल सके। महावीर, बुद्ध,नानक और गांधी का देश भी आते हुए ताबूत देख रहा है लेकिन शांति को लेकर दुविधा में है। यही इस दौर की कूटनीति है कि जिनके पास लाठियां हैं उनके हो जाएं,गुटबाज़ी करें।

मोटे तौर पर भले ही ईरान-इजराइल+अमेरिका सीधे लड़ाई में हों लेकिन शेष दुनिया कभी सीधे तो कभी आजू -बाजु से इसके ख़तरनाक नतीजों की चपेट में आ रही है। हमारा देश न किसी के लेने में है और न किसी के देने में, फिर भी युद्ध के असर में आता जा रहा है। असर ऐसा कि एक मार्च को ओमान स्थित एक जहाज़ पर हुए हमले में बिहार का एक कप्तान मारा गया और राजस्थान का एक क्रू सदस्य अब तक गायब है। बमुश्किल जहाज़ पर मौजूद आठ नाविक बचाए जा सके हैं जो हाल ही में केवल एक कपड़े में भारत लौट सके हैं। इनके सभी दस्तावेज़ छूट गए हैं ,नौकरी जा चुकी है और भविष्य के प्रति केवल आशंका है। इस सप्ताह राजस्थान के दो अन्य युवकों के भी शव पहुंचे हैं । वे भी ओमान पर ड्रोन हमले में मारे गए । एक युवक सीकर का है और दूसरा ब्यावर का। कंस्ट्रक्शन कंपनी में काम करने के लिए ये दोनों पिछले महीने ही ओमान पहुंचे थे। सीकर का युवक विक्रम वर्मा तीन बहनों का इकलौता भाई था और जब उसका शरीर अगलोई गांव पहुंचा तो हाहाकार मच गया। यह तब है जब भारत युद्ध में शामिल नहीं है। 

 इस समय देश रसोई गैस की क़िल्लत भी सीधे भुगत रहा है। दाम तो बढ़े ही हैं, उपलब्ध भी नहीं हो पा रही है। एलपीजी के आभाव में डे बोर्डिंग स्कूलों ने बच्चों के माता-पिता से कह दिया है कि जब तक यह संकट है खाना तैयार नहीं होगा। रेस्त्रां बंद हो रहे हैं। सीएनजी की कमी ने शहरों में रिक्शेवालों की लम्बी कतार लगा दी है। आम मजदूर,कामगार की लोकल सवारी का किराया बढ़ चुका है। कुछ पढ़े- लिखों के तर्क सामने आए कि लोगों ने रसोई गैस का अतिरिक्त भंडारण शुरू कर दिया, इसलिए तंगी आई लेकिन दाम बढ़ाकर ख़ुद सरकार ने संकट का ऐलान कर दिया था। दरअसल संकट बड़ा है और शुतुरमुर्ग की तरह ज़मीन में घुसने से इसका अंत नहीं हो सकता। 

यह युद्ध पश्चिम एशिया में बड़ी अस्थिरता के हालात पैदा कर  रहा है। सवाल कई हैं कि क्या ईरान कमज़ोर पड़ गया है ? क्या जनता इस युद्ध में शामिल नहीं है ? अमेरिकी राष्ट्रपति दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में युद्ध रुकवाने का सेहरा बांधते-बांधते खुद ही युद्ध में कूद गए और फिर यह वेनेज़ुएला जितना आसान भी ना हुआ ? रूस से तेल मत खरीदो और फिर ख़रीदो-खरीदों की रट क्या किसी अस्थिर सोच  की तस्दीक़ नहीं करती ? धार्मिक एकता केवल  झूठी अवधारणा है जो सच है वह केवल अपनी सुरक्षा और अपना आराम। ऐसा होता तो ईरान की मिसाइलें क़तर, सऊदी अरब,यूएई का रुख नहीं करती ? जो भी हो इस लड़ाई में रूस की बल्ले बल्ले है। बेचारे यूक्रेन को ड्रोन और मिसाइलों की कमी पड़ गई है। सब यहां  खप रही हैं। धंधेबाज़ों को चाहिए कि और हथियार बनाएं। माल बिकने के लिए तैयार है। हमारे शांतिप्रिय देश के रक्षा मंत्री ने भी कह दिया है कि आने वाले सालों में भारत ड्रोन निर्माण का 'हब' होगा। युद्ध के अब कोई क़ायदे नहीं बस केवल तात्कालिक फ़ायदे ही क़ायदे हैं। इजराइल ग़ज़ा में जो कहर मचा चुका है उसके लिए युद्ध के नियम केवल मखौल का विषय हैं ? अतीत में ईरान ने भी अपनी उदार और प्राचीन संस्कृति से मुंह मोड़ा। वसंत में आने वाले इस पारसी नए साल नवरोज़ (20 मार्च ) को मनाने की बात इस बार ईरानी हुकूमत ने कही है। इस्लाम से पहले के ईरान में इसे बड़े पैमाने पर मनाया जाता था और ऐसे ही पर्व इस पांच हज़ार साल पुरानी सभ्यता की ताकत रहे हैं । इसमें आग की महत्ता थी। कट्टरपंथियों को इसे जारी रखने में दिक़्क़त हुई। साम्प्रदायिक ताकतें  किसी भी मज़बूत मुल्क़ को कमज़ोर बना देने का माद्दा रखती हैं ।  

 वैसे ये जो पश्चिम एशिया का मौजूदा वॉर थिएटर है यह 'टार्गेटेड किलिंग्स'  का हामी ज़्यादा दिखाई दे रहा है। ईरान का एक नेता मारा जाता है,दूसरा आ जाता है। जैसे कि कोई कफ़न बांध रखा हो। जो लड़ाई अमेरिका और इजराइल को चंद घंटो या दिनों की लग रही थी, वह चौथे हफ्ते में प्रवेश कर गई है। ईरान इसे पहले दिन से इसे अवैध युद्ध की संज्ञा दे रहा है और बातचीत के लिए ख़ुद को प्रस्तुत भी बता रहा है। ज़्यादा वक़्त नहीं बीता है जब इराक के समय जैविक हथियारों का ज़खीरा होने के आरोप में सद्दाम हुसैन को सूली पर चढ़ाया गया था। अमेरिका इस उम्मीद में रहा कि वे जल्द ही ईरान पर अपना आदमी बैठा देंगे और अमन चैन क़ायम हो जाएगा। इधर वे ईरान के सरकारी नुमाईंदों को निशाना बना रहे हैं, उधर अमेरिका के ज़िम्मेदार अधिकारी यह कहते हुए अपने पद छोड़ रहे हैं कि यह हमारा युद्ध नहीं है और हुकूमत ने हमले के पहले से ही असहमत स्वरों को दबाना शुरू कर दिया था। यूएस नेशनल काउंटर टेररिस्म के डायरेक्टर जो केंट ने एक साक्षात्कार में कहा -" ईरान के पास कोई परमाणु हथियार होने के प्रमाण नहीं मिले थे और ना ही अमेरिका को कोई सीधा ख़तरा ईरान से था, ऐसा इजराइल लॉबी के दबाव में आकर किया गया है।" यह बयान इस छद्म युद्ध को गढ़े जाने के हक़ में काफ़ी कुछ कहता है। 

अमेरिका की डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस तुलसी गबार्ड ने सीनेट इंटेलिजेंस समिति को दी गई लिखित गवाही में कहा कि 2025 में अमेरिका और इजरायल की ओर से किए गए ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ के बाद ईरान की न्यूक्लियर क्षमता पूरी तरह तबाह हो गई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बाद ईरान ने अपनी परमाणु संवर्धन क्षमता को दोबारा बनाने की कोई कोशिश नहीं की। उनका यह बयान ट्रंप के उस दावे के बिल्कुल उलट है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ईरान तेजी से अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम दोबारा बना रहा है और कुछ ही हफ्तों में परमाणु हथियार हासिल कर सकता है। इसी को आधार बना कर ट्रंप ने ‘तत्काल न्यूक्लियर खतरे’ का हवाला देते हुए युद्ध शुरू किया था। ज़ाहिर है ये विरोधाभासी बयान इस युद्ध की विभीषिका में दर्ज़ होंगे और इतिहास इन नेताओं को भी हमलावरों की श्रेणी से अलग नहीं कर सकेगा। ऐसा इसलिए भी होगा क्योंकि इनके पास बातचीत और शांति का विकल्प था। काश कोई मुकदमा इसलिए भी चले कि दोनों पक्षों ने क्यों सीमा लांघी और दुनिया को युद्ध में क्यों धकेला। ये युद्ध रूस,चीन पाकिस्तान पर नियंत्रण नहीं कस रहा बल्कि शह दे रहा है। अमेरिका के 31 वें  राष्ट्रपति हर्बर्ट हुवर (1874 -1964 )का कथन बिलकुल सही है कि बूढ़े युद्ध करवाते हैं और जवान शहीद होते हैं। पुतिन,शी ,नेतन्याहू और ट्रंप की औसत आयु 75 साल से भी ज़्यादा है। महात्मा गांधी की बात कितनी सही है कि शांति के लिए कोई रास्ता नहीं शांति अपने आप में रास्ता है और यह भी कि आंख के बदले आंख पूरे विश्व को अंधा बना देगी। ये विश्व तो इसी तरफ़ दौड़ा चला जा रहा है। 



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