मान ली गईं इच्छा से मृत्यु की गुज़ारिश


कभी-कभी सुप्रीम कोर्ट ऐसे मामलों से जूझता हैं जहां फ़रियादी के आसुंओं  के सैलाब में न्यायाधीश के आंसू  भो मिलने लगते हैं और फिर एक ऐसा फ़ैसला आता है जो पूरे देश के लिए नज़ीर बन जाता है। बुधवार को आया यह फ़ैसला वाक़ई बड़े इंतज़ार के बाद आया बड़ा फ़ैसला था। हरीश राणा ( 32 ) के माता -पिता की तकलीफ़ से जब दोनों जजों की संवेदनाएं मिली तब कहीं जाकर 338 पन्नों का यह ऐतिहासिक फ़ैसला लिखा गया। हरीश भारत का पहला शख़्स हो गया है जिसकी स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उसके लिए इच्छामृत्यु को स्वीकार कर लिया है। हरीश के  माता -पिता ने अपने बच्चे के लिए इच्छामृत्यु की मांग की थी। वह 20 साल का ही था जब बीटेक करने के लिए गाज़ियाबाद से चंडीगढ़ आया था। वहीं अपने पीजी रूम की चौथी मंज़िल से गिरकर सिर में ऐसी चोट खा बैठा  कि फिर कभी उठ ना सका।  कभी -कभार वह आंखें तो खोलता लेकिन अपने आस-पास का कोई भान उसे नहीं था। लगभग कोमा में लेकिन उसके माता-पिता ने उसे तेरह साल तक जीवित रखा। चिकित्सा विज्ञान इसे 'वेजिटेटिवे स्टेट' का नाम देता है। यह एक अथक संघर्ष की गाथा थी लेकिन अंत में जब चिकित्सा विज्ञान पूरी तरह हार गया तब उन्होंने अपने बच्चे के लिए गरिमापूर्ण ज़िन्दगी का अधिकार मांगा जिसकी व्याख्या हमारा संविधान भी करता है। अरुणा शानबाग से चला यह संघर्ष अब कहीं जाकर ठोस धरातल पर उतरा है। यह ऐतिहासिक इसलिए भी है क्योंकि फ़ैसले में कहा गया है कि भारत सरकार इस पर स्पष्ट कानून बनाए और फ़िलहाल हर ज़िले में एक मेडिकल बोर्ड का गठन हो और उसके सदस्य न्यायालय के निगरानी में ऐसे मामलों पर निर्णय ले सकें ताकि अपील करने वाले को हर बार सुप्रीम कोर्ट की ओर ना देखना पड़े। सुनवाई के लगभग तीन महीने बाद आए इस फ़ैसले से माता -पिता जैसे जीत कर भी हार रहे थे और उनके जवाब में नम आंखों के सिवा कुछ नहीं था। 

लव, लाइफ, मेडिसिन, और मर्सी से जूझते इस जजमेंट में कभी मिर्ज़ा ग़ालिब कोट हुए तो कभी विलियम शेक्सपियर का ज़िक्र आया। कभी यह भी कहा गया की चिंता चिता सामान है। एक समय था ज़ब भारतीय कानून दया मृत्यु की याचना पर बड़ी देर तक ठिठका था। अरुणा  शानबाग (1948 -2015) मुंबई के केईएम (किंग एडवर्ड मेमोरियल) हॉस्पिटल  में नर्स थीं। उनकी शादी वहीं के रेजिडेंट डॉक्टर संदीप से होने वाली थी लेकिन साल 1973 में उसी अस्पताल के वार्ड बॉय ने उसे ज़्यादती का शिकार बनाया। बलात्कार के बाद उसे कुत्ते को बांधने वाली चैन से पीटा गया था। वह कोमा में चली गई। नर्स प्रमिला जिसने अरुणा को इस हाल में देखा था उनका कहना था कि उस समय अरुणा को थोड़ा होश था। वे 43 साल तक वह उसी तरह वेजिटेटिवे स्टेट में रही जिस पर हरीश तेरह साल तक रहा। बस कभी -कभार उसकी आंखो  की पुतलियां हिलती थीं । जिससे उसकी शादी होने वाली थी वह भी चार सालों तक अरुणा से मिलने आता रहा, फिर उसने भी घर बसा लिया। अरुणा 43 बरसों तक सांस ले सकी, इसका श्रेय वहां की करुणामई नर्सों और शेष स्टाफ को जाता है। बेहोशी के कारण वह ब्रेन डेड यानी मानसिक तौर पर मृत थी। सवाल यही था कि ऐसे में जब जीवन मृतप्राय हो, दया मृत्यु क्यों नहीं मिलनी चाहिए ?

हालात को समझते हुए अरुणा की एक पत्रकार मित्र पिंकी वीरानी ने दया मृत्यु की याचना करते हुए अरुणा शानबाग बनाम भारत सरकार यह केस 2011 में लड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को भले ही ख़ारिज किया हो लेकिन पैसिव यूथनेशिआ को वैध करार दे दिया था। पहले 2018 और फिर 2023 में गाइडलाइन को और स्पष्ट किया। अब अरुणा जैसे मामलों में खाना या लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटाया जा सकता था। अनुच्छेद 226 के तहत पैसिव यूथनेशिआ की अनुमति मिल सकती है। ऐसा अदालतें  'पैरेंस पैट्रिया ' अधिकार के तहत करती हैं । यह लेटिन शब्द है जिसके मुताबिक उनके हक़ में निर्णय देना जिनकी लड़ाई लड़ने वाला अपना कोई नहीं है। तब अदालत अभिभावक की भूमिका में आ जाती है। बेशक एक्टिव यूथनेशिआ के लिए फिलहाल कानून में कोई जगह नहीं है। अपने होशो हवास में कोई मौत को गले नहीं लगा सकता और  गंभीर बीमारी के मरीज एक इंजेक्शन लेकर भी जीवन समाप्त नहीं कर सकते लेकिन पैसिव यूथनेशिआ के लिए हरीश राणा के बाद राह खुल गई है। सच है कि  उस देश को ऐसा करने में काफ़ी वक्त लगा जहां भीष्म पितामह ने बाणों पर पड़ी अपने देह को इच्छा से मकर संक्रांति के दिन त्यागा था और जैन परंपरा में संथारा भी शामिल है। जीवन को शांति से त्यागने के लिए यहां संथारा या संल्लेखना का विकल्प मौजूद है। जैन समाज की इस व्यवस्था में अधिक उम्र वाले व्यक्ति मृत्यु के इंतज़ार में अन्न-जल त्याग देते हैं।


यूथनेशिआ  ग्रीक शब्द है जिसका अर्थ है अच्छी मृत्यु। बेल्जियम ,कनाडा ,कोलम्बिया,निदरलैण्ड,न्यूजीलैंड, स्विटज़रलैंड लक्सेमबर्ग ,स्पेन, और ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका के कुछ राज्य,पुर्तगाल (कानून के लागू होने का इंतज़ार) इन सभी देशों में इच्छामृत्यु के लिए कानून हैं। दक्षिण कोरिया में 2018 से पैसिव यूथनेशिआ वैध है और यहां तक आने के लिए देश को लम्बी बहस से गुजरना पड़ा। इच्छा मृत्यु के विपक्ष में सबसे बड़ी दलील यही रही   कि जीवन ईश्वर की देन है,इसलिए इसे वापस लेने का हक़ भी उसी को है। पक्षकारों का कहना था कि व्यक्ति के शरीर पर उसका अधिकार है। गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार भी उसे मिलना चाहिए।  बेल्जियम और निदरलैंड में एक्टिव यूथनेशिआ भी कानून सम्मत है।चिली ऐसा देश है जिसने 2009 में इसे एक कानूनी संशोधन के बाद वैध करार देने की  कोशिश लेकिन बात नहीं बनी। फिर साल 2015  इसी देश में एक किशोरी वैलेंटिना की गुहार पर  फिर विचार किया गया जो सिस्टिक फाइब्रोसिस नमक लाइलाज बीमार से पीड़ित थी । वैलेंटिना के दर्द और तकलीफ ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा था। आख़िरकार लंबी बहस के बाद भारत के हरीश राणा देश के  पहले ऐसे व्यक्ति हो गए जिनके जीवन रक्षक उपकरण हटा दिए जाएंगे क्योंकि पिछले तेरह सालों से वे आसपास के माहौल से पूरी तरह अनजान हैं और कोई सार्थक प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं।  


हरीश राणा के माता-पिता की सेवा और इच्छाशक्ति को देखते हुए  सुप्रीम कोर्ट के दो जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की दो सदस्यीय बेंच ने यह संवेदनशील फैसला सुनाया। दोनों जजों का मानना था कि हरीश की हालत में 13 साल से कोई सुधार नहीं है। पहले पीजीआई, चंडीगढ़ और फिर एम्स दिल्ली में चले लगातार इलाज से भी उसमें कोई बदलाव नहीं आया। उसकी यह स्थिति केवल दुख बढ़ाएगी। जस्टिस पारदीवाला ने कहा, 'यह हमारे लिए कठिन निर्णय है, पर हम उसे अनंत पीड़ा में नहीं रख सकते।' उन्होंने इच्छामृत्यु के इस फ़ैसले को लिखने की शुरुआत ही  विलियम शेक्सपियर के लोकप्रिय कथन 'टु बी ऑर नॉट टु बी, से की। ज़िन्दगी और मौत की दुविधा से जूझता उनके नाटक हैमलेट का यह किरदार अब इस ऐतिहासिक न्याय के निर्णय का भी हिस्सा है। यहां तक आने में अरुणा शानबाग केस सदैव पृष्भूमि में रहा और उसके हालात पर   तत्कालीन जज ने शायर मिर्ज़ा ग़ालिब को कोट करते हुए कहा था  - 

मरते हैं आरज़ू में मरने की

मौत आती है पर नहीं आती। 




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