युद्ध और शांति के बीच 'दलाल' कौन
जो इल्म तुझे तुझ से न ले ले उस इल्म से जहल बेहतर है-रूमी
हज़ारों साल पहले ईरानी होने का मतलब था प्रकाश का वाहक। यह अग्नि को पूजने वालों के लिए नए युग का उदय था। कुछ वैसा ही जैसा वैदिक काल में अग्नि को समर्पित यज्ञ और उसके ज़रिए सृष्टि का आव्हान। अंधेरे और उजाले के बीच सतत संघर्ष के बाद एक दिन न्याय का दिन होगा, इस विचार ने तब के फ़ारस में बड़ी आबादी को जोड़ा। उनकी समूची कविता, संस्कृति, अध्यात्म और राष्ट्रवाद अच्छाई की पैरोकारी से जुड़ा था जो बाद के फ़ारसी शायरों में भी नज़र आया। मौलाना जलालुद्दीन रूमी की 'मसनवी' फारसी साहित्य की महान सूफी कृति है, जिसमें 25,000 से ज़्यादा छंद हैं। यह कहानियों के माध्यम से प्रेम, आध्यात्मिकता और ईश्वर से मिलन का मार्ग बताती है, जिसे "फारसी का कुरान" भी कहा जाता है। ईसा से 600 साल का दौर था जब ईरानीयों ने बेबीलोन पर कब्ज़ा कर के दो सौ साल की यातना झेल रहे यहूदियों को मुक्त करावया था। इन्हें वहां के राजा ने केवल इसलिए कैद कर रखा गया था क्योंकि उनका अपना यक़ीन था, अपने ईश्वर को मानने का। यह राजा सायरस था और शायद यही वजह रही कि उसके नाम के आगे महान लगा क्योंकि उसने यहूदियों की संस्कृति और सोच का आदर किया। यहूदियों ने भी इन्हीं पारसी विचारों से प्रेरणा ले अग्नि को पूजना शुरू किया।
प्राचीन ईरान यानी ईसा से भी छ
ह सौ साल पहले सायरस (600-530 बीसी )का जन्म हुआ था। उसका एकैमेडियन साम्राज्य यूरोप,अफ्रीका और भारत में सिंधु नदी तक फैला हुआ था। दुनिया की लगभग आधी आबादी एकैमेडियन साम्राज्य के दायरे में आती थी। यह केवल विस्तार का साम्राज्य नहीं था बल्कि इसमें लोगों को जोड़ने ,उनके पूजा स्थलों और रीति-रिवाज़ों के सम्मान की नीति भी शामिल थी। यह पहली बार ही था जब आज से ढाई हज़ार साल पहले दुनिया की पहली शांति संधि आकार में आई थी। इसी साम्राज्य ने बड़े हिस्सों को प्रान्तों 'सत्रपियों' में विभाजित कर एक तेज रफ़्तार शाही सड़क और डाक प्रणाली को विकसित किया था। सायरस के राज में ही बेहतर केंद्रीय प्रशासनिक व्यवस्थाओं की शुरुआत हुई और सोने के सिक्के अर्थ-व्यवस्था में ढले। सायरस ने फिर लीडिया और बेबीलोनिया को अपने राज्य में मिलाया। वही बेबीलोनिया जिसके हैंगिंग गार्डन (आज के इराक और उसकी मेसोपोटेमियाई सभ्यता) दुनिया के सात अजूबों में से एक माने जाते हैं।
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| Cyrus the great who shaped Persian empire |
एकैमेडियन साम्राज्य (लगभग 550-330 ईसा पूर्व), सायरस महान द्वारा स्थापित विशाल साम्राज्य था। यह अपने समय का सबसे बड़ा साम्राज्य था जहां इतिहास ने विविधता के प्रति सहिष्णुता की बुनियाद को पड़ते हुए देखा। साइरस महान ने मिडियन साम्राज्य को जीतकर एक गठजोड़ की नींव रखी थी। उसने टूटे-फूटे मंदिरों को संवारा,जनता को ग़ुलामी से मुक्त किया और यहूदियों को भी सालों की कैद से आज़ाद कराया। जेरूसलम में तोड़े गए मंदिर फिर बनाए। इस इतिहास का ज़िक्र बाइबल में डेनियल की कहानी में भी दर्ज़ होता है। येरुसलम के डेनियल को बेबीलोन के राजा ने बंधक बना कर रखा था जो इतना बहादुर था कि शेरों के बीच रखे जाने के बावजूद बच गया था। घटनाक्रम ईसा से भी पांच सौ साल पहले का है। तब ना ईसाइयत अस्तित्व में थी और ना ही इस्लाम। हर राजा का, हर साम्राज्य का अंत होता है। सायरस का अंत भी एक ख़ानाबदोश जंगी महिला के हाथों हुआ, जिसका मानना था कि इस साम्राज्य ने ही उसके बेटे की हत्या की है। फिर ईसा से 330 साल पहले एक यूनानी राजा सिकंदर महान ने दुनिया का नक्शा ही पलट दिया। यह भी इतिहास है कि जीत के बाद सिकंदर ने ना केवल ईरानी वेशभूषा अपनाई बल्कि फ़ारसी अदालती व्यवस्था को भी राज का हिस्सा बनाया । इतिहास वाक़ई नया नज़रिया भी देता है क्योंकि जो फ़ारसी (ईरानी) और यहूदी (इज़राइली )आज एक दूसरे को तबाह करने पर तुले हैं, कभी यूं भी एक हुए थे। आज मिसाइलें बरसा रहे हैं,कभी गले मिले थे।
इस सद्भावना की मिसाल भारत के हैदराबाद में भी दिखाई देती है जहां ईरान की कुतुबशाही वशंजों (1512 -1687) ने चार मीनार,तारामती बारादरी,हुसैन सागर बनवाने के साथ हीरों के व्यापार को बढ़ावा दिया। यहां फ़ारसी के साथ तेलुगु भी राजकाज की भाषा थी। ईरान की इस प्रशस्ति गाथा को लिखने का मक़सद केवल इतना है कि इतिहास सद्भावना की कहानियों को याद रखता है। वह क्रूर, नम्र और मसखरों में सीधे-सीधे अंतर भी करता है। वह युद्ध भड़काने वालों को भी जानता है और मध्यस्थता के पैरोकारों को भी समझता है। वह वक़्त पर मौन रहने वालों का भी हिसाब करता है बड़बड़ाने वालों का भी। समय नीयत का हिसाब रखता है। एक बात जो दिखती है कि इस युद्ध में हम अपनी भूमिका शांति के लिए मध्यस्थ राष्ट्र की तो नहीं ही देखते। जो ऐसा होता तो युद्ध छिड़ने से ठीक पहले एक पक्ष से गले नहीं मिल रहे होते, ईरान के मुखिया की मृत्यु पर शोक प्रकट करने में वक्त नहीं लेते , बच्चियों पर हमले का विरोध करते। एक देश जो बेशक हमारा दुश्मन ही हो उसके मध्यस्थता के प्रयास को दलाली कहना भी अपने पद और भारतीय परंपरा के अनुकूल नहीं कहा जाएगा । रूस के यूक्रेन पर आक्रमण के समय हमारा शांति के प्रति आग्रह था, इजराइल के ग़ज़ा पर हमलों के समय भी हम लड़ाई रुकवाने के लिए आगे थे लेकिन इस युद्ध में नहीं। यूं भी जब लड़ने वालों में एक भी पक्ष को लगे कि आप तठस्थ राष्ट्र नहीं हो तो यकीन और मध्यस्थता दोनों ही मुश्किल होती हैं। जहां भारत नहीं है वहां पाकिस्तान है। दिन और रात की तरह। एक है तो दूसरा गायब। लिहाज़ा फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने पेशकश कर दी है ।
ईरान पाकिस्तान का पड़ोसी है और 900 किलोमीटर की बलूचिस्तान सीमा साझा करता है। यहां दोनों के बीच तनाव भी रहता है। पाकिस्तान का संपर्क ईरान की इस्लामिक रेवोलुशनरी गार्ड तक है और युद्ध रुकवाने के लिए बातचीत से भी पहले की प्रक्रिया जिसे मैसेजिंग भी कहा जाता है, उसमें भूमिका निभा रहा है। 22 मार्च को मुनीर ने ट्रम्प से बात की थी फिर 23 मार्च को पाक प्रधानमंत्री शरीफ़ ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियां से बात की थी और इसी दिन ट्रम्प ने अगले पांच दिन तक पावर प्लांटस पर हमला नहीं करने की घोषणा की। बेशक़ युद्ध रोकने में एक सरफिरा और आतंक का पैरोकार देश कोई भूमिका निभा रहा है उस पर निगाह रखना ज़रूरी है लेकिन दलाल कहना आपकी ताकत और समझ पर संदेह पैदा करता है। एक सर्वदलीय बैठक में अब भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि 'हम दलाल देश नहीं बन सकते। ' यह कतई शालीन प्रतिक्रिया नहीं कही जा सकती। इस पर कूटनीतिक चुटकुला कहा जा सकता था।पाकिस्तान को लताड़ने की होड़ में शांति प्रक्रिया को ही पीछे धकेलना बुद्धिमानी नहीं है। वैसे लोकतंत्र के पाठ पढ़ाने वाला अमेरिका पाकिस्तान के उस सेना प्रमुख से बात करता है जहां का चुना हुआ नेता जेल में डाल दिया गया है। अमेरिका की ताकत उसे यह हक भी दे देती है कि किसे लोकतंत्र के नाम पर शिकार करना है और किसे मुक्त। वैसे फ़िलहाल तो युद्ध छेड़ने वाले के देश की जनता को ही समझ नहीं आ रहा कि आखिर यह युद्ध किया ही क्यों जा रहा है। लक्ष्यहीन सेना तकनीक में बीस हो सकती है लेकिन रक्षात्मक मुल्क़ के लड़ाकों-सा जज़्बा नहीं ला सकती। रामधारी सिंह 'दिनकर'की पंक्तियां हैं-
युद्ध को वे दिव्य कहते हैं जिन्होंने,
युद्ध की ज्वाला कभी जानी नहीं है।




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