इस चमन में बस हम ही हम खिलेंगे

बीता सप्ताह सरकार के लिए कुछ ज़्यादा ही चुनौती भरा हो गया। यूं हमारी  सरकार जो भरपूर यक़ीन के साथ अपनी ही मस्त चाल में चलती है, इस हफ़्ते कुछ कसमसाती और डगमगाती नज़र आई।  डगमगाने का ताल्लुक़ बहुमत के लिए ज़रूरी किसी संख्याबल में कमी-बेशी से नहीं बल्कि उन मुद्दों से है जिनका असर आने वाले कई हफ़्तों तक रहने वाला है। पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की किताब के हिस्सों को लोकसभा में पढ़ने देने की नेता प्रतिपक्ष की ज़िद ने पूरे देश को यह बता दिया कि किताब में ज़रूर कुछ ऐसा है जिसे सरकार देश पर ज़ाहिर होने देना नहीं चाहती।  बताना ही चाहती तो पिछले पंद्रह महीनों से रक्षा मंत्रालय  केवल समीक्षा ना कर रहा होता । अगर जो किताब में वाक़ई झूठ लिखा है कि साल 2020 में चीनी टैंकों के भारतीय सीमा में घुसने के समय  सरकार ने काफ़ी समय लेने के बाद भी सेना प्रमुख से यह कहा कि आपको जो उचित लगे वह करें और फिर तब से अब तक चुप्पी ओढ़े रखी है तो यह और भी ख़तरनाक़ मालूम होता है। हमारे देश में सेना चुने हुए नेता के आदेश का इंतज़ार करती है। यह पाकिस्तान नहीं जहां जब-तब सैनिक शासन सत्ता हथिया कर लोकतंत्र का ढोल बजा देता है। जो सेना प्रमुख की किताब में लिखा सच नहीं , तब क्यों अब तक उनसे सवाल नहीं किए गए ? वैसे एक और सैन्य अधिकारी की किताब है जिसके ख़िलाफ़ तो पुरानी सरकार ने  बाक़ायदा  मुक़दमा क़ायम कर रखा है। 

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इसी सप्ताह दूसरा तूफ़ान अमेरिका की ट्रेड डील से आया और जिसका श्रेय भी हमेशा की तरह दादा ट्रम्प ले उड़े जैसा की ऑपरेशन सिंदूर को रुकवाने का भी ले रखा है। 50 फ़ीसदी से 18 पर आने के लिए  डील की बधाइयों के बीच सरकार सफाई देने में ही लगी रही कि हमने कृषि हितों से कोई समझौता नहीं किया है। यूरोपीय संघ के साथ समझौता 'मदर ऑफ़ आल  डील्स' था तो यह 'फादर ऑफ़ ऑल डील्स' है। बेशक यहां ना आमने-सामने बैठकर कोई दस्तखत हुए, ना हाथ मिले। घोषणा भी अकेले-अकेले ही  डोनाल्ड ट्रंप ने एक्स पर कर दी। दो पुराने और बड़े लोकतांत्रिक देशों में से एक ने तोहफ़ा दिया और दूसरे ने कहा तोहफा क़ुबूल है। हफ़्ते की  तीसरी सुर्ख़ी का मजमा भारतीय जनता पार्टी की आंख की सबसे बड़ी किरकिरी ममता बैनर्जी ने लूट लिया। इतिहास में पहली बार किसी मुख्यमंत्री ने सीधे सुप्रीम कोर्ट जाकर अपने मुक़दमे की पैरवी की थी, वह भी यह कहते हुए कि मैं अपने या अपनी पार्टी के लिए नहीं, जनता के लिए आई हूं । अभी सप्ताह ख़त्म होता कि विपक्ष से प्रधानमंत्री की जान को ख़तरा बता कर प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति के अभिभाषण का धन्यवाद भी लोकसभा में नहीं दिया। जो संसद में कभी नहीं हुआ वह हो गया। देश को इंतज़ार करना चाहिए कि आख़िर उन्होंने ऐसे किन सांसदों को चुन कर भेजा है जिनसे हमारे पीएम की जान को ख़तरा है। शायद शीघ्र ही किसी एफआईआर या फिर आतंक विरोधी धारा का ख़ुलासा हो। 

ममता बैनर्जी की सुप्रीम कोर्ट में  पैरवी हैरान भी करती है और तसल्ली भी देती है। हैरानी इसलिये कि एक मुख्य्मंत्री क्यों इतनी मजबूर हुईं कि तीन घंटे तक सर्वोच्च अदालत में अपनी बारी आने तक डटी रहीं। तसल्ली की बात यह रही कि आख़िर इसी समन्वय की बात ही तो हमारा तंत्र भी करता है कि जब भी विधायिका, कार्यपालिका और न्याय पालिका के बीच कोई संकट हो तो सामंजस्य और समन्वय से सुलझा लिया जाए। आमतौर पर तीखे तेवरों के साथ पेश आने वाली दीदी सुप्रीम कोर्ट में बेहद शांत और विनम्र थीं। उन्होंने कहा कि 'एसआइआर' गहन चुनाव पुनरीक्षण से ग़रीब का मताधिकार छीना जा रहा है। केंद्र सरकार ने अपने 38 सौ  माइक्रो ऑब्जरवर तैनात किए हैं। इस पर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि ममता सरकार ने हमें क्लास तीन और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता दिए जो दस्तावेज जांचने के लिए सक्षम नहीं है। याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस जारी हुआ है और 10 फ़रवरी तक जवाब देने के लिए कहा गया है। वैसे ममता बैनर्जी पेशेवर वकील भले ही ना हो लेकिन उनके पास कोलकाता विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री है और जब वे विपक्ष में थी, राज्य में अपनी पार्टी और लोगों के लिए मुक़दमे लड़ चुकी हैं।  

सेना प्रमुख जनरल नरवणे  की किताब 'फोर स्टार्स ऑफ़ डेस्टिनी' के अंश पढ़ने के लिए संसद में राहुल गांधी को यह कहकर रोका गया कि किताब अभी प्रकशित नहीं हुई है। अप्रैल  2020 में जब चीन हमारी पूर्वी लद्दाख सीमा में घुसा था तब तत्कालीन सेना प्रमुख को स्पष्ट आदेश नहीं मिला था जो बताता है कि सरकार ने उतनी मज़बूती से फ़ैसला नहीं लिया था जैसा कि वह प्रचारित करती है।इसके बाद जून 2020 में देश प्रधानमंत्री के इस कथन के बाद आश्वस्त हो गया था कि 'ना कोई घुसा है और ना कोई घुस आया है'। यह झड़प थी या सोचा-समझा हमला सरकार की ओर से तब भी स्पष्ट नहीं किया गया था। उस समय भारत ने तमाम चीनी सामान के आयात और सैकड़ों चीनी  एप्स पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। चीन भी भारत को धमका रहा था कि भारतीय प्रधानमंत्री को अरुणाचल नहीं जाना चाहिए। फिर नवंबर 2025 में भी चीन ने भारतीय नागरिक प्रेमा वांगियोम थोंगडोक को परेशान किया क्योंकि उनके पासपोर्ट में जन्म के स्थान पर अरुणाचल प्रदेश लिखा हुआ था। चीनी प्रवर्तन अधिकारी ने उनकी आगे की यात्रा यह कह कर रोक दी कि तुम तो अरुणाचल की हो जो चीन का हिस्सा है और तुम्हारे पास तो चीनी पासपोर्ट होना चाहिए। प्रेमा लंदन से जापान जा रहीं थीं। भारतीय नागरिक का यूं उत्पीड़न चीनी मनसूबों का पर्दाफाश ही करता है

जून 2020 में हमारे 20 सैनिक सीमा पर शहीद हुए थे। इसी वक्त का ब्यौरा जनरल की किताब में है कि क्या करना है, इसके सीधे आदेश उन्हें नहीं मिले थे। किताब के बारे में कहा जा रहा है कि यह अप्रकाशित है जबकि इंटरनेट किताब की प्रकाशन तारीख़ मई 2024 बता रहा है। किताब के अंश कारवां पत्रिका में भी प्रकशित हो चुके हैं। सम्भव है कि पेंगुइन प्रकाशन ने देश के बाहर प्रकशित भी की हो। हमारे रक्षा मंत्रालय के रिकॉर्ड में तो किताब 2023 से अनुमोदन के इंतज़ार में है जिसके बारे में एक कार्यक्रम में जनरल नरवणे खेद भी जता चुके हैं। कसौली के एक आयोजन में उन्होंने कहा था कि समीक्षा ज़रूरी है लेकिन प्रकाशन में पंद्रह महीने नहीं लगने चाहिए। फिर उन्होंने अनूठे अंदाज़ में कहा कि यह परिपक़्व हो रही है जैसे कोई पुरानी शराब। बहरहाल इस पूरे घटनाक्रम ने किसे इज़्ज़त बख़्शी यह देश तय करेगा लेकिन यह तय है कि जो किताब के अंश पढ़ने दिए जाते तो यूं  'डैमेज' ना हुआ होता। 

मेजर जनरल वी के सिंह (81) की भी एक किताब 'इंडिआस एक्सटर्नल इंटेलिजेंस' 2007 मेंआई थी जिस पर गोपनीयता अधिनियम के तहत मुक़दमा क़ायम किया गया।जनरल  वी के सिंह अब भी लड़ रहे हैं। वे  2002 में रॉ (अनुसन्धान और विश्लेषण विंग) से सेवानिवृत्त हुए थे। जांच के दौरान सीबीआई ने उनके गुड़गांव स्थित घर पर छापा भी मारा था। एक अंग्रेजी अख़बार को दिए इंटरव्यू में जनरल सिंह ने साफ़ किया कि ऐसा कोई लिखित क़ायदा नहीं है कि किताब प्रकाशन से पहले रक्षा मंत्रालय को सौंपी जाए। ज़ाहिर है सेना के सम्मान में आए दिन बयान जारी करने वाले सियासी दलों में इतना भी दम नहीं है कि वे देश के लिए जान देने का इरादा रखने वालों की किताबों को  

बर्दाश्त कर सकें। वे अपनी अभिव्यक्ति के लिए इनकी हरी झंडियों का इंतज़ार करते ही रह जाते हैं। क्या होता जो राहुल गांधी किताब का अंश पढ़ देते ? जनता तय कर देती है कि क्या ऊटपटांग बात ये नेता कर रहे हैं लेकिन बोलने ही ना देना वह भी उस बात को जो सब जगह मौजूद है, अजीब हालात पैदा करता है। शायद सरकार को अकेले में ही अपने गुणगान की आदत पड़ गई है, इसलिए अकेले ही विपक्ष की गैरमौजूदगी में राज्ययसभा में ही अपना धन्यवाद भाषण भी पढ़ दिया। लोकसभा में राष्ट्रपति को धन्यवाद ज्ञापित ना हो सका।सरशार सैलानी का शेर है 

चमन में इख़्तिलात-ए-रंग-ओ-बू से बात बनती है,

हम ही हम हैं तो क्या हम हैं तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो










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