घर से दुनिया तक नज़रा गया प्रेम


यह पृथ्वी अगर हमारा घर आंगन है तो यह आंगन नज़रा गया है। किसी बुरे साए के असर में है जो अब भी इससे मुक्त होने की कोशिश नहीं हुई तो हम एक बेहद कमज़ोर समाज और खोखली दुनिया का हिस्सा होंगे। हमने कभी इस गोले को कोई दिठौना या काला टीका नहीं लगाया क्योंकि उससे कभी प्रेम ही नहीं किया। अपने भीतर के प्रेम को भी किसी केंचुली की तरह उतार कर कभी ना ख़त्म होने वाली चूहा दौड़ में शामिल हो गए । क्या पड़ोस ,क्या सड़क ,क्या शहर ,क्या प्रदेश ,क्या देश ,क्या द्वीप, क्या महाद्वीप सब बढ़-चढ़ कर यह बताने में लगे हैं कि कौन कितनी जल्दी प्रेम से ख़ाली हो सकता है। इस रास्ते के सबसे ज़लील मुसाफ़िर वही हैं जिनके पास ताक़त है। इनका व्यवहार ऐसा है कि जैसे धरती से प्रेम की पूरी फ़सल सुखाने की संधि की हो। इनके हाथ परमाणु बटन होना भी ख़तरनाक है। वे हर दिन संत वैलेंटाइन को ठेंगा दिखाते हैं। नया यह है कि नफ़रत को इन्होंने सुंदर पैकेजिंग में बेचना शुरू कर दिया है और इसे बनाने की फैक्ट्री में जाने कितनों को प्रशिक्षण देकर भी लगा दिया है। घृणा क़ारोबार है। आखिर कैसे मूल्यों की इस गिरावट से बचा जा सकता है?

इस बीमारी की नब्ज़ पकड़ में आ सकती है जो क्रोनोलॉजी  समझी जाए। यह घर, सड़क, शहर से चलकर पूरे गोले को चपेट में ले चुकी है। जयपुर के  पुराने शहर के गलता जी क्षेत्र में कार पार्किंग को लेकर दो परिवार लड़ गए। यह लड़ाई इतनी बढ़ गई कि दो देश युद्ध में भी इतने उत्तेजित ना हों । साठ और सत्तर वर्षों के दो बुजुर्ग पहले उलझे और फिर साठ साल के व्यक्ति के दो जवान बेटों ने आकर  सत्तर साल के व्यक्ति को मौत की नींद सुला दिया। एक  कि लोहे-लंगर के वाहन के लिए एक जीवित इंसान को मार दिया गया । नफ़रत और क्रोध के इस दावानल का बुझना बहुत ज़रूरी है। क्या पार्किंग की समस्या को मिल-बैठ कर नहीं सुलझाया जा सकता। वैसे भारतीय शहरों की सड़कों को  इन गाड़ियों के कब्ज़े से मुक्त नहीं किया गया तो यह समस्या और फन उठाएगी क्योंकि धैर्य ,प्रेम और सम्मान ग़ायब हैं।  


पड़ोस से निकल सड़क पर आते हैं। एक व्यक्ति सड़क किनारे बेहोश पड़ा है। सब उसे देखते हुए तेज़ी से गुज़र जाते हैं। कोई उसकी ओर नहीं झुकता। कोई झुकना चाहे तो कहा जाता है  यह पीकर पड़ा हुआ है, उसे रहने दो। फिर कोई एक आता है और उसे झिंझोड़ता है। बोतल से पानी निकाल छींटे मारता है। वह घबरा कर उठता है और बताता है कि पता नहीं कैसे वह बेहोश होकर गिर गया। गांव से शहर काम के लिए आया हुआ था। आख़िर कैसे हम इस क़दर रूखे हो गए, संवेदना थेथरा गई। सब दौड़ रहे हैं उस रेस में जिसकी कोई घोषणा भी नहीं हुई है। एक अघोषित घोषणा ज़रूर हो गई  है, इंसान के भाटे में बदलने की। हमारे समय के बेहतरीन कवि विनोद कुमार शुक्ल की कविता है -हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था/व्यक्ति को मैं नहीं जानता था/हताशा को जानता था/इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया/मैंने हाथ बढ़ाया/मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ/मुझे वह नहीं जानता था/मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था/हम दोनों साथ चले/दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे/साथ चलने को जानते थे।

साथ चलने से हर कोई बच रहा है। संतान ,पति-पत्नी,शिक्षक,नेता। कवि मनुष्य को सचेत करने की कोशिश में कभी नहीं चूकता लेकिन मनुष्य चूक रहा है। सड़क के बाद एक शहर को भी याद कर लीजिये। उसके कर्णधार ही जब संवेदनहीनता का परिचय दें, तब जनता कहां जाए ? पीने के पानी में  गटर का पानी मिला और 35  रहवासियों की जान एक ज़िम्मेदार नेता के लिए घंटा बन गई। मनुष्य के बिगड़े बोल केवल शहर तक सीमित नहीं हैं। बेहद सुन्दर,लोक कलाओं से समृद्ध और भूपेन हज़ारिका के रूहानी गीतों वाले प्रदेश असम के मुख्यमंत्री के शब्दों पढ़िए  -" 4 से 5 लाख मियां वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए जाएंगे। मियां सुमदाय के लोगों को परेशान करने के लिए रोजमर्रा के कामों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर वो रिक्शा के लिए पांच रुपये मांगें, तो चार रुपये ही दो।  इस तरह के छोटे-छोटे काम से परेशानी होने पर ही वो राज्य छोड़ेंगे।" यह एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का कथन है कि हम क़ानून के ज़रिये कुछ नहीं करेंगे ,आप रोज़ लड़ो और चिकचिक करो। कवि भूपेन हजारिका ने शायद पहले ही इसे  देख लिया था और इसलिए उन्होंने असमिया भाषा में गीत लिखा बिस्तिर्नो पारोरे, अशंख्य जोनोरे, हाहाकार खुनिऊ निशोब्दे निरोबे.. जिसे हिंदी में भी उन्होंने ही गाया- विस्तार है अपार.. प्रजा दोनों पार.. करे हाहाकार.. निःशब्द सदा ओ गंगा तुम.. ओ गंगा बहती हो क्यूँ..कवि का सवाल है कि मानवीय मूल्यों के इस पतन के बावजूद गंगा मां तुम बह कैसे रही हो ? और जवाब भी कि प्रकृति इतनी ही उदार है। 

प्रदेश से देश पर आते हैं। इज़राइल-फिलिस्तीन, रूस-यूक्रैन,अमेरिका-ईरान,आर्मेनिया -अज़रबैजान और हाल ही में भारत-पाकिस्तान फिर लड़े। गौर करेंगे तो पाएंगे कि ये लड़ाइयां उकसाई जाती हैं। अपना रुतबा,वर्चस्व और ताक़त दर्शाने के लिए, जनता को पीस दिया जाता है। दूसरे विश्वयुद्ध की पौनी सदी के बाद लगता है जैसे इंसान के प्रेम को ख़त्म करने के लिए उस एक नेता हिटलर की कई रेप्लिकाएं इस दौर में जीवित हो गई हैं। निरर्थक लड़ाइयों की सुनामी है । कब्ज़ों को (वेनज़ुएला पर अमेरिका ) अपने दंभ और आर्थिक दबदबे को  मज़बूत करने का नैतिक आवरण ओढ़ाया जा रहा है। दुनिया से फिर घर लौटते हैं। क्या घरों में प्रेम है ?वहां तो लगता है जैसे बाहरी दुनिया में ख़ुद को साबित करने के लिए गला काट प्रतिस्पर्धा करने  एक छत के नीचे रह रहे हैं। परिवार में भी लड़ाई के खुर रोप दिए गए हैं। यहाँ घुटन भी है, ऑनर किलिंग भी। राधा को पूजने वाला समाज अपने बच्चों के प्रेम को ही नहीं समझ पाता। अपने झूठे मान में अपनों को ही समाप्त कर देता है। किसी जंगल राज में भी ऐसा नहीं देखा जाता जो मनुष्यों ने अपनी कथित सभ्य दुनिया में रचा लिया है। कभी खाप, कभी परिवार तो कभी समाज जज बनकर ऑनर किलिंग जैसी भयावह हिंसा को प्रेम के मुकाबले सही ठहराने लगते  हैं। संत वैलेंटाइन का आज शहादत दिवस है जिसे प्रेम दिवस के रूप में इसलिए ख्याति मिली क्योंकि तीसरी सदी में इटली के सम्राट ने एक बेतुका फरमान जारी किया था। उसे लगता था कि शादीशुदा ज़िन्दगी कमज़ोर सैनिक बनाती है इसलिए उसने शादी पर रोक लगा दी। संत वैलेंटाइन ने इस प्रतिबंध का विरोध किया। रोमन राजा ने उन्हें जेल में डाल दिया। आज ही के दिन 43 साल की उम्र में जेल में ही उनकी मौत हो गई। प्रेम के इसी खरेपन को दुनिया मनाती है क्योंकि प्रेम ही होता है आंगन में लगी पवित पत्ती से भी हरा और आंख  से बहते खारे पानी से भी खरा। गिरिजा कुमार माथुर की एक  कविता है जो बच्चों के हिंदी के पाठ्यक्रम में भी है आदमी का अनुपात- 

कमरा है घर में

घर है मोहल्‍ले में

मो हल्‍ला नगर में

नगर है प्रदेश में

प्रदेश कई देश में

देश कई पृथ्‍वी पर

अनगिन नक्षत्रों में

पृथ्‍वी एक छोटी

करोड़ों में एक ही

सबको समेटे हैं

परिधि नभ गंगा की

लाखों ब्रह्मांडों में

अपना एक ब्रह्मांड

हर ब्रह्मांड में

कितनी ही पृथ्वियाँ

कितनी ही भूमियाँ

कितनी ही सृष्टियाँ

यह है अनुपात

आदमी का विराट से

इस पर भी आदमी

ईर्ष्‍या, अहं, स्‍वार्थ, घृणा, अविश्‍वास लीन

संख्‍यातीत शंख-सी दीवारें उठाता है

अपने को दूजे का स्‍वामी बताता है

देशों की कौन कहे

एक कमरे में

दो दुनिया रचाता है ।







 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वंदे मातरम्-यानी मां, तुझे सलाम

चल गया लड़के ज़ोहरान का ज़ोर

देश के बाहर देश के लिए उठे दो बड़े क़द