'पापा भाग गए' के साथ लौटते हैं कई सवाल
किसी भी नाटक का पहला शो नाटक के साथ उस उत्तेजना, उहापोह और डर को भी दिखा जाता है जो नाटक के पात्र और निर्देशक उस पल में जी रहे होते हैं। पापा भाग गए का पहला शो जब जयपुर के जवाहर कला केंद्र में मंचित हुआ, तब ऐसे ही भाव सब के चेहरे पर थे जो धीरे-धीरे नाटक के किरदारों और फिर उनके सशक्त भावों में ढलते चले गए। पापा एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति हैं जो दोनों बच्चों का ब्याह कर चुके हैं और अपनी ज़िन्दगी को व्यस्त रखने की कोशिश में लगे हुए हैं क्योंकि पत्नी की मौत सब्ज़ी-मंडी में सांड के उत्पात में हो चुकी है। दस साल तक पापा ने कोमा में रही पत्नी की देखभाल की लेकिन अब वे अकेले हैं। इस अकेलेपन के बीच जब बच्चों को पापा के भागने की सूचना मिलती है तो वे अवाक रह जाते हैं। घर में तूफ़ान मचता है कि आख़िर इस उम्र में पापा को भागने की क्या सूझी और कौन हैं ये मिस आलू वाली यानी मिस
अहलूवालिया जो हमारे सीधे-सादे पापा पर डोरे डाल रही हैं। दोनों बच्चे जो भले ही अपनी पसंद से शादी कर चुके हैं लेकिन पापा के किसी के साथ होने की बात से वे भी उसी पारंपरिक सोच पर चलने लगते हैं कि हाय इस उम्र में पापा को यह क्या सूझा ? समाज क्या कहेगा के नाम पर बच्चे भी वह सोचने लगे जो आमतौर पर माता-पिता सोचते हैं।
इसी दुविधा में पापा के पंजाबी दामाद और दक्षिण भारतीय बहू अपने अंदाज़ से कभी मुस्कुराने तो कभी ठहाके लगाने पर मजबूर कर देते हैं। गुजराती नौकर हर बात में हाँ का हों और व्हाई नॉट कह कर शब्दों को जिस तरह ठुमके लगवाता है ,वह भी मज़ेदार है। इस बीच मिस अहलूवालिया और पापा के संवाद जब कभी सेक्स एजुकेशन और कभी आस्तिक और नास्तिक की बहस में उलझते हैं, तब इस पूरे नाटक की कहानी गहरे संदेशों को डिकोड करने लगती है। हास्य व्यंग्य के ताने -बाने में सामाजिक संदेश कैसे लिखे जा सकते हैं, यह लेखक के लगातार लिखते रहने और जीवनानुभव का नतीजा है। पापा भाग गए के लेखक निर्देशक अशोक रही अब तक 18 नाटक लिख चुके हैं जिसमें खेजड़ी की बेटी, रंगीली भागमती, चोर मचाए शोर और चंपाकली का रामरुपैय्या खास हैं। अपनी और बेहतर प्रस्तुति, मंच सज्जा और बेहतर रिहर्सल के बाद 'पापा भाग गए' 100 से भी ज़्यादा बार मंचित होने का माद्दा रखता है। नाटक के संवाद बताते हैं कि लेखक की सामयिक मुद्दों, सामाजिक पाखंड और सियासी हालात पर गहरी पकड़ तो है ही साथ ही नई पीढ़ी की भाषा और दिशा का भी पूरा भान है। उनके पात्र बेहद सच्चे और उदार भारतीय परिवार का प्रतिनिधित्व करते हुए मालूम हो रहे थे जो दिल के पहले मंदिर, फिर दीवाना और आज बदतमीज़ हो जाने के बदलाव की कथा कहते हैं।
शायद अशोक राही जी ने पहली बार किसी नाटक में गालियों का सहारा लिया है। नाटक में गलियां हैं जिसके बारे में हास्य कलाकार कहती हैं-" भड़वा अपशब्द की यहां कोई ज़रूरत नहीं थी और यह बात मैंने निर्देशक से कही भी ।" एक बार डॉ राही मासूम रज़ा से भी किसी ने कहा था कि जो उनके उपन्यास आधा गांव में इतनी गालियां ना होती तो उन्हें अकादमी पुरस्कार मिल चुका होता तब उन्होंने साफ़ कहा कि मेरे पात्र यदि गीता के श्लोक बोलेंगे ,श्लोक लिखूंगा और जो गालियां बोलेंगे तो वही लिखूंगा। मैं कोई नाज़ी साहित्यकार नहीं जो एक शब्दकोष थमा कर कह दूं कि ख़बरदार जो एक शब्द भी अपनी तरफ़ से कहा।
इस रंगकर्म को शेक्सपियर के बराबर नहीं रख रही लेकिन उस पात्र की कसौटी पर कस रही हूं जिसके मुंह से एक अच्छे नाटक को कैसा होना चाहिए वह बताया गया है।शेक्सपियर के मशहूर नाटक हैमलेट का मुख्य पात्र हैमलेट एक नाटक के संवाद सुनकर कहता है -"यह नाटक प्रत्येक दृष्टि से श्रेष्ठ है। दृश्य भी उसमें अच्छे हैं और अपने पूरे कौशल के साथ लेखक ने उसे लिखा है। नामक, मिर्च, मसाला मिला देने से चीज़ें लोगों की ज़्यादा पसंद की ज़रूर बन जाती हैं लेकिन इस नाटक में लेखक ने अपनी कला को इस तरह के मसाले से दूषित नहीं किया है।" हैमलेट का ही एक और संवाद है - एक और बात का ध्यान रखिये कि संवाद बोलते समय ऊपर-नीचे हाथों को न फेंकिए और ना अधिक मुंह मटकाने की ही आवश्यकता है। अगर कभी उत्तेजना का दृश्य आ भी जाए तब भी ज़्यादा उछल-कूद या शोर नहीं मचाना चाहिए बल्कि कला की श्रेष्ठता को सामने रखकर सधे हुए कौशल के साथ अपना भाव व्यक्त करना चाहिए। जब कभी कोई अभिनेता चिल्लाते हुए संवाद कहता है और सामने बैठे हुए दर्शक के कान गूंजा देता है तब मेरा जी कला की अश्लीलता को देख कर दुखी हो उठता है और दर्शकों की ऐसी पसंद देखकर तो और भी दुःख होता है। " यह संवाद एक और राजस्थानी लेखक रांगेय राघव के हैलमेट के हिंदी अनुवाद से साभार हैं।
चार सौ साल पहले लिखे ये संवाद आज भी जैसे नाटक कला को अर्थ देते हुए मालूम होते हैं। सीधी-सादी पारिवारिक कहानी के ज़रिये ज़रूरी सामाजिक मुद्दों और मध्यवर्गीय पाखंड को उजागर करने वाले नाटक पापा भाग गए में हास्य-विनोद और ऊर्जा का भरपूर पुट लाने वाले अभिनेताओं की औसत आयु बमुश्किल 28 के आसपास रही होगी।


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