क्यों हो 'आप' के लिए मातम
भला क्यों होना चाहिए आप के लिए मातम? उसके कुछ सांसद थे, पार्टी में जी नहीं लगा, चले गए। अब नए चमकदार भविष्य के साथी होंगे। सत्ता का पूरा-पूरा लुत्फ़ लेंगे। क्या हुआ जो कभी वंचितों के अधिकारों और मूल्यों की राजनीति की क़सम खाई थी। जिन आदर्शों और आम आदमी का ज़िक्र करते थे,उसे ख़ाक कर गए। मक़सद सत्ता में बने रहना था, मलाई खानी थी सो चले गए। जिस पार्टी में गए हैं ,वहां से तो खंबा भी चुनाव जीत जाता है। पहली बार विधायक बने भी, मुख्यमंत्री (राजस्थान) बन जाते हैं और कभीकभार तो चुनाव जीते बिना भी बन जाते हैं। यूं भी जनमत की परवाह किसे है। ये तो कुछ बूढ़े विशेषज्ञ और पुरानी राजनीति को बंदर के मरे हुए बच्चे की तरह अपनी छाती से चिपकाएं बैठे हैं जो बड़बड़ करते रहते हैं। अब तो खुल के तोड़फोड़,सरकारी एजेंसियों के निर्मम इस्तेमाल और चुने हुए प्रतिनिधियों को उड़ा ले जाने का दौर है। भारतीय राजनीति में चला कांग्रेस मुक्त भारत का नारा अब विपक्ष विहीन भारत की ओर चल पड़ा है। हमने लोकतंत्र को लाकतंत्र बनाने के तमाम हथियार ढूंढ लिए हैं। चुनाव जीतो किसी और दल से, शामिल हो जाओ किसी और दल में। दल-बदलू अब कोई गाली नहीं रह गई है बल्कि कथित चमकीले भविष्य की तरफ़ उठे हुए क़दम हैं। आयाराम-गयाराम अब सियासत का स्थाई भाव है।
अभी पांच राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के चुनाव हुए हैं। देश के सभी संसाधन,जवान, चुनाव आयोग इस पवित्र कार्य में लगातार जुटे हुए थे और फ़र्ज़ कीजिये कि नतीजे आते ही कोई दल सत्ता के लिए विरोधी से मिल जाए तब क्या यह जनादेश का अपमान नहीं होगा? जो पश्चिम बंगाल की जनता ममता बनर्जी की सरकार को बहुमत में ला देती है और कल को इसी पार्टी के विधायक,सांसद रातों-रात अपनी पार्टी बदल कर कहीं और तम्बू गाड़ लेते हैं, तब यह जनता के विश्वास के साथ धोखा होगा या नहीं ? फिर इस पूरी क़वायद की आवश्यकता ही क्या है जब चुनाव कहीं और ही होना है तो ? दलबदल ऐसी ही एक प्रचलित बुराई की तरह सामने आ गया है जो पार्टी के विलय से अलग है। लोकतंत्र में इस अपहरण की इजाज़त कैसे दी जा सकती है और संविधान यहां क्या कहता है ?
24 अप्रैल को आम आदमी पार्टी के राघव चड्ढा ने 10 में से 7 राज्ययसभा सांसदों के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की घोषणा कर दी। आम आदमी पार्टी ने तीन सप्ताह पहले राघव चड्ढा को पार्टी के उपनेता पद से हटा दिया था। उपसभापति ने कोई देरी नहीं की और तुरंत इस विलय को स्वीकार कर लिया। जनता को यह कितना पसंद आया इसे तुरंत नापने का कोई पैमाना तो नहीं लेकिन एक ही दिन में राघव चड्ढा के इंस्टाग्राम फॉलोअर्स की संख्या एक करोड़ 46 लाख से घटकर एक करोड़ 27 लाख हो चुकी थी। आम आदमी पार्टी बहुत नैतिकता की बात करते हुए सत्ता में आई थी।यह लोकपाल की पुरज़ोर वकालत करने वाले अन्ना हजारे के आंदोलन से उपजी पार्टी थी जिस पर हर संवेदनशील और पढ़े- लिखें वर्ग का ऐसा यकीन बना कि लगा अब तो हालात बदल कर रहेंगे। हालात तो नहीं बदले,पार्टी ज़रूर बदल गई। पहले अन्ना अलग हुए फिर योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, अलका लांबा, शाज़िया इल्मी,आशुतोष जैसे कई नाम अलग होते चले गए। पार्टी एक व्यक्ति अरविंद केजरीवाल के इर्द-गिर्द केंद्रित होती चली गई। दिल्ली में दो बार शानदार जीत, पंजाब जैसे महत्वपूर्ण राज्य में सरकार बनने के अलावा गोवा और गुजरात में भी पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया। यहां तक की जम्मू- कश्मीर से भी पार्टी का विधायक है।
आज भाजपा, कांग्रेस या तमाम क्षेत्रीय दलों में भी कौन-सा दल है जो एक व्यक्ति केंद्रित नहीं है। यह किसी अनिवार्य बुराई की तरह साथ है। आप चुपचाप सत्ता के गले में पड़े रहें किसी को कोई तकलीफ़ नहीं होगी। नीतिश कुमार या चंद्रबाबू बन जाएं तब तो और भी बेहतर वरना शिवसेना और एनसीपी की तरह दो फाड़ होने में भी वक़्त नहीं लगेगा। किसने नहीं देखा कि आम आदमी पार्टी दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी से सीधे भिड़ रही थी। उसकी सियासत को दिल्ली की जनता पसंद करने लगी थी। दिल्ली मॉडल के चर्चे होने लगे थे । एलजी के अवरोधों तो थे लेकिन शराब घोटाले के नैरेटिव ने सबकुछ बदल दिया। आप के नेताओं को जेल हुई। दिल्ली चुनाव के नतीजे भाजपा की झोली में आ चुके थे और केजरीवाल को कोर्ट बरी कर चुकी थी। भारतीय राजनीति में प्रवर्तन निदेशालय,आयकर,आबकर के हथकंडे नए नहीं हैं जो नया है वह इन सब के बीच अभूतपूर्व समन्वय,निर्ममता और तीव्रता से राज्य की शक्तियों का इस्तेमाल। यूं तो विपक्ष चारों खाने चित है लेकिन कभी-कभी वह इस बेहोशी से जाग भी जाता है। 2024 के लोकसभा चुनाव और हाल ही परिसीमन बिल के गिरने ने उसके उठने की शिनाख़्त की है। बीच बीच में ममता बैनर्जी और स्टालिन की पार्टियां दमखम भी दिखा देती हैं। ऐसा ही आम आदमी पार्टी को लेकर भी था लेकिन अब वह कमज़ोर पड़ गई है।
राज्यों में सरकारों के बार-बार गिरते-पड़ते रहने के बाद भारत में दलबदल को रोकने के लिए संविधान में 1985 में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई थी। इसका मकसद था कि नेता बार-बार पार्टी बदलकर सरकारों को अस्थिर न करें। इस दलबदल विरोधी कानून के तहत किसी भी सांसद या विधायक द्वारा पार्टी छोड़ना या व्हिप के खिलाफ मतदान करना उसे अयोग्यता की ओर ले जा सकता है। हालांकि इसी कानून में एक महत्वपूर्ण अपवाद भी जोड़ दिया गया कि अगर किसी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य सामूहिक रूप से किसी अन्य दल में शामिल हो जाते हैं, तो इसे विलय माना जाएगा और ऐसे सदस्यों की सदस्यता सुरक्षित रहेगी। कई बड़े अधिवक्ताओं का मानना है कि इस तरह यह विलय भी वैध है लेकिन कानून विशेषज्ञ अभिषेक मनु सिंघवी के मुताबिक केवल विधायक दल का विलय पर्याप्त नहीं है, बल्कि मूल राजनीतिक दल का विलय भी आवश्यक होना चाहिए और भारत का सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि “सदस्य दल ” और “राजनीतिक दल” दो अलग-अलग इकाइयां हैं।
कानून की कसौटी भारत की राजनीति में इससे पहले भी कई ऐसे उदाहरण सामने आ चुके हैं, जहां विलय और दलबदल के बीच टकराव हुआ है। महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे के बीच 2022 में हुआ सत्ता संघर्ष महत्वपूर्ण मामला था। शिवसेना के 50 से ज्यादा विधायक एकनाथ शिंदे के साथ अलग हो गए और उन्होंने दावा किया कि वे ही असली पार्टी हैं। दो तिहाई संख्या पूरी होने के कारण इसे विलय जैसा माना गया लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ और ये सुप्रीम कोर्ट तक गया। कोर्ट ने कहा कि स्पीकर का फैसला महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रक्रिया की जांच जरूरी है। ये मामला काफी लंबा खींचा और अंततः शिंदे के पक्ष में इसका पटाक्षेप हुआ।कर्नाटक (2019) में कई विधायकों ने कांग्रेस और जेडीएस छोड़ी लेकिन वे दो तिहाई संख्या में नहीं थे इसलिए इसे दलबदल माना गया और स्पीकर ने उन्हें अयोग्य घोषित किया। गोवा (2019) कांग्रेस के 15 में से 10 विधायक भाजपा में शामिल हुए, ये संख्या दो तिहाई से ज्यादा थी सो इसे विलय माना गया। कानून की कमज़ोरियां पढ़ कर ही सत्ता अपनी राह बना रही है और भारत विपक्ष विहीन तंत्र की ओर सरकता जा रहा है। संसद में प्रधानमंत्री ने विपक्ष के लिए दुष्यंत कुमार के शेर की एक पंक्ति का ज़िक्र किया था- तुम्हारे पांव के नीचे कोई जमीन नहीं/कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं। जब दोनों अपनी दिशा में चले जा रहे हैं फिर मातम आप पार्टी के लिए तो नहीं आपके लिए ज़रूर होना चाहिए।


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