ना कोई कॉकरोच ना कोई जनता और ना पार्टी

ना कोई कॉकरोच ना जनता और ना पार्टी 

-वर्षा भम्भाणी मिर्ज़ा 


 सारे कॉकरोच मर गए माय लॉर्ड। अब चिंता की कोई बात नहीं। जनाब ये किसी एक्स के हैंडल से निकले थे, अब वहीं सारे दफ़न हो गए। आप देशहित में बोलना जारी रखिए। अभी तो आंदोलनजीवी, धरनाजीवी और प्रदर्शनजीवियों का ख़ात्मा भी बाक़ी  है। फ़िलहाल तो ये सारे  तिलचट्टे हिट कर दिए गए हैं। बहुत तेल चाटा है इन्होंने देश का। धीरे-धीरे सबकुछ उनकी पहुंच से गायब कर देंगे। ये नमक हरामी भी होते हैं और अपने दो पतले हिलते तंतु यानी टेंटेकल्स आगे कर, उन्हें भी डरा देते हैं जिनकी रसोई में जीते हैं। अब ये किसी खेल में नहीं हैं। बहुत उछल-उछल कर नाच रहे थे। एंटी कॉकरोच का तगड़ा पोछा मार दिया है और ज़रूरत पड़ी तो चप्पल भी चला देंगे, इन्हें कुचलने के लिए लेकिन एक डर है, कम्बख्त बार -बार बच जाते हैं। जुर्रत देखो इनकी शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांग रहे  हैं। अब की बार देश के ये चट्टे कोई पार्टी बनाकर आ गए थे  और देश की सुरक्षा को ही ख़तरे में डाल रहे थे। पेपर लीक-वीक तो होते रहते हैं, तिलचट्टों को चित करना ज़्यादा ज़रूरी है। पर सर अब सब ठीक है।  आप आराम से ऐतिहासिक फैसले लिखिए। सर पर भी। 


आख़िर कौन आड़े आ गया था सरकार और न्याय के ?ऐसा भी क्या गुनाह कर दिया देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकान्त ने जो ऐसा आक्रोश फट पड़ा ? वे तो कोई सियासी नेता भी नहीं थे जो।बस सुनवाई कर रहे थे वकीलों की एक याचिका पर। याचिका वकील संजय दुबे की थी।  उन्होंने आरोप लगाया था कि दिल्ली हाई कोर्ट सीनियर वकीलों के नामांकन से संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों को लागू करने में देरी कर रहा है और इस पर अवमानना कार्यवाही शुरू की जानी चाहिए। जस्टिस जयमाला बागची और जस्टिस सूर्यकांत की बेंच नाराज़ हो गई। ऐसा बयान आया कि रातों रात दो करोड़ से ज़्यादा सदस्यता वाली कॉकरोच जनता पार्टी बन गई और सोशल मीडिया पर उसके फॉलोवर्स की संख्या कांग्रेस और भाजपा से कही आगे निकल गई। पार्टी के गाने बने जो इतने सुने और साझा किए गए कि निज़ाम हिल गया और उसने उसे बैन कर दिया। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का तो ये तक कहना था कि यह पार्टी तो वह जगह ले गई है जो विपक्ष को लेनी थी। पत्रकार और लेखक राशिद किदवई का कहना था कि जिस तरह कॉकरोच जनता पार्टी ने  पूरी सतह को  कब्ज़ा लिया है यह तो विपक्ष को करना था। यह केवल  सत्तापक्ष का मज़ाक बनाना भर नहीं है बल्कि विपक्ष को एक्सपोज़ कर देना  है। वह विपक्ष जो सत्ता को विस्थापित करने का ख़्वाब देखता रहता है। 

बात में दम है क्योंकि कि इस बड़े संख्याबल की आवाज़ विपक्ष नहीं बन पाया। सोशल मीडिया पर फूटे इस गुस्से की वजह वह दबाव है जो जनता झेल रही है। हाल ही में जो अपील उससे की गई है कि सोना मत खरीदो,गाड़ी कम चलाओ,घर से काम करो ,विदेश मत जाओ उससे वह अभी तक इत्तेफाक नहीं रख पा रही है।  इस त्याग के लिए जनता ने ऐसा जुड़ाव महसूस नहीं किया जो पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के देश से उपवास के आव्हान पर किया था। उनकी कथनी और करनी के समभाव  में जनता जैसे जुड़ गई थी। परेशान जनता ने जब मुख्य न्यायाधीश के इस बयान को सुना तो उसे लगा कि यह तो वही सुर है जो वह सत्ता के मुखारविंद से सुन रही थी। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत  शर्मा ने कहा-"समाज में कुछ कॉकरोच और परजीवी हैं, जो व्यवस्था पर हमला करते हैं। उन्हें रोज़गार नहीं मिलता और पेशेवर ज़िंदगी में कोई जगह नहीं मिलती। उनमें से कुछ मीडिया बन जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया पर सक्रिय हो जाते हैं, कुछ आरटीआई कार्यकर्ता बन जाते हैं और फिर हर किसी पर हमला शुरू कर देते हैं।"

इसके बाद तो मज़ाक-मज़ाक में शुरू हुई कॉकरोच जनता पार्टी के सोशल मीडिया हैंडल पर आंधी-तूफ़ान आ गया। समर्थन में गाने बनने लगे कि हां हम कॉकरोच हैं और किसी की ताकत नहीं जो हमें ख़त्म कर सके.. हम तुम्हारे किलों को ध्वस्त करके ही दम लेंगे..एक अन्य गीत है -सड़क पर गड्ढे और गड्ढे में  आप.. ज़िन्दा जो बच गए तो कॉकरोच हैं आप.. ना पानी, ना काम, ना लेने को सांस.. टीवी पर देखो तो फुल ऑन विकास..ऐसे कई विद्रोही गीत सत्ता को डराने लगे थे। यहां तक कि पेपर लीक के सिलसिले में शिक्षा मंत्री से इस्तीफा भी मांग लिया गया और एक जनहित याचिका को ऑनलाइन  साइन कराने का अभियान भी चला जिस पर भी करोड़ों दस्तखत हुए । सत्ता की तो जैसे ज़मीन दरकने लगी। सारी ताक़त इसे मिटाने में लगा दी गई । सत्ता जब डरती है तो बहुत ऊटपटांग और ख़तरनाक काम करने लगती है। फिर वह तो श्रीलंका,बांग्लादेश और नेपाल में जेन ज़ी की ताकत के उदाहरण देख चुकी थी। राष्ट्रीय सुरक्षा को आधार बनाकर इलोन मास्क के एक्स से पार्टी का हैंडल बंद करा दिया गया। जैसे कॉकरोच दुबारा निकल आते हैं, पार्टी ने नया खाता बना लिया 'कॉकरोच इस बैक'। संस्थापक अभिजीत दीपके (30) ने तब कहा था कि यहां सरकार ने ख़ुद के ख़िलाफ़ ख़ुद ही गोल कर लिया था। एक्स ने बंद करने के लिए अपनी सफाई में कहा था कि ऐसा कानूनी मांग के आधार पर किया गया था। बताते हैं कि सरकार को गुप्त रिपोर्ट मिली थी कि असंतोष बड़ा है और मामला अराजक हो सकता है।


 मुख्य न्यायाधीश का कथन पहले से मौजूद कोढ़ में नई खाज कर गया था। हालांकि बाद में उन्होंने अपनी सफाई में कहा भी कि वे देश के युवाओं का बहुत सम्मान करते हैं और उनकी बात को ग़लत समझा गया। फिर भी ये सफाई युवाओं को सफाई जैसी नहीं लगी और बात बनी नहीं। पूर्व जज रेखा शर्मा अपने एक लेख में लिखती हैं कि भारत के मुख्य न्यायाधीश कोई एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक संस्थान हैं और वे जो भी बोलते हैं संविधान की ओर से बोलते हैं। उनकी टिप्पणी न तो संवैधानिक और ना ही गरिमापूर्ण। सौम्यता, गरिमा, विनम्रता और समानुभूति  जज का परिचय होते हैं। बेरोज़गार युवा को परजीवी और कॉकरोच कहना सही नहीं कहा जाएगा। यह उनके दुःख को और हरा करना होगा। आज के युवा के दर्द को समझने की ज़रूरत है ,उसे कुरेदने की नहीं। बेरोज़गारी उनकी बनाई समस्या नहीं हैं ,वे तो ख़ुद इसका शिकार हैं। रोज़गार नहीं हैं लेकिन फिर भी वे जूझ रहे हैं। आपके प्रति पूरे आदर के साथ कहना चाहूंगी कि यह भाषा न्यायालय और वह भी सर्वोच्च न्यायालय  के अनुरूप नहीं है खासकर उस शख़्सियत के जो लोकतंत्र के तीसरे स्तंभ न्यायतंत्र की अगुवाई करता हो। 

 व्यवस्था को लगता है कि सोडा वाटर के बुलबुलों की तरह ये भी अब फिस्स हो गया है लेकिन युवाओं का यह कारवाँ तो अब चल पड़ा है। वे जहां हैं,वहां से अव्यवस्था की कहानी कह रहे हैं। कोई राजस्थान के अलवर की बदहाल और जानलेवा सड़क की कहानी बता रहा है तो कोई कह रहा है कि सात साल में 70 बार पेपर लीक हुए हैं जिससे लगभग पौने दो करोड़ छात्र प्रभावित हुए हैं, भोपाल  के छात्र कह रहे हैं कि एसएससी जीडी(स्टाफ सिलेक्शन कमीशन- सिक्योरिटी  गार्ड ) की कांस्टेबल भर्ती परीक्षा में 46 डिग्री के तापमान में 100 किलोमीटर चल कर आए हैं और यहां  आकर पता चला कि जितनों के बैठने की व्यवस्था है उससे दोगुने प्रत्याशी बुला लिए गए हैं।  सच तो ये है कि ये कॉकरोच अब लगातार निकलते ही जा रहे हैं। वे विपक्ष और मीडिया की सशक्त भूमिका में स्वतः ही आ गए हैं। सरकार को डरना चाहिए कि कहीं यह उसे ढक ना लें। ना कोई कॉकरोच है, ना कोई जनता और ना कोई पार्टी समझने की भूल वह न करे। हम जानते हैं कि यह बड़ी समर्थ सरकार है। कुछ भी कर सकती है। उसे चाहिए कि अब तो युवाओं के लिए बड़े फ़ैसले ले ही ले। 


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