कांग्रेस को कॉकरोच से प्यार है !
हाल ही में वक़्त का पहिया कुछ ऐसा घूमा कि टॉम और जेरी की तरह कूदते-फांदते कॉकरोच और कांग्रेसी अब जय-वीरू जैसी बातें करने लगे हैं। कॉकरोच जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच बना शक का यह सिलसिला अब मोहब्बत के तराने गाने लगा है। तमाम संदेहों के बावजूद अब लग रहा है जैसे यह एक ही पन्ने पर आ गए हैं जबकि कांग्रेस के कई नेता और उससे भी ज़्यादा भाजपा की नीतियों ख़िलाफ़ लिखने वाले पत्रकार यह स्थापित करने में कोई कसर बाक़ी नहीं रख रहे थे कि सीजेपी,भाजपा की ही 'बी' टीम है। ठीक वैसे ही जैसे अन्ना हज़ारे का आंदोलन कांग्रेस को सत्ता से हटाने में क़ामयाब रहा वैसे ही सीजेपी के नेता जो आम आदमी पार्टी के पुराने सदस्य भी रहे हैं और कांग्रेस को केवल नुकसान पहुचाएंगे। इस मानस के साथ उन्होंने वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को भी नहीं बख़्शा। ख़यालों के पुलाव पकने की भला क्या सीमा होती है, वे बोलने लगे कि 24 घंटे चुनावी मोड में रहने वाली भाजपा को अपने ख़िलाफ़ चल रही हवा का भी पता चल गया और उसने ही इनकी फंडिंग की है। इनके नेता अमेरिका में जाकर कॉकरोचों से मिले और पूरी योजना बनाई। फिर आख़िर प्रेम का अंकुर फूटा कहां से ?
लोकतंत्र में सियासी अविश्वास बहुत स्वाभाविक है और यही इसकी ख़ूबी भी है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ भी था ,अटल सरकार के 'शाइनिंग इंडिया' में भी और मनमोहन सरकार के लिए भी। इस समय देश का युवा जिस तरह अपने वर्तमान से परेशान और भविष्य के लिए आशंकित है वह तो यूं भी प्रतिरोध की आदर्श परिस्थिति है। कहते हैं शक की दवा तो हकीम लुक़मान के पास भी नहीं थी, कांग्रेस को सलाह देने वालों को युवा कॉकरोचों का हुजूम,उनका दमन, उनकी गिरफ़्तारी,नज़रबंदी सब फ़र्ज़ी लगे और वे कांग्रेस नेतृत्व को बराबर यह संकेत देते रहे कि भूलकर भी इन पर भरोसा मत करना। तीखे विरोध के बावजूद कांग्रेस ने कॉकरोचों को चाय पर बुलाकर अपने प्यार का इज़हार कर ही दिया।
दरअसल कांग्रेस भीतर ही भीतर यह समझ चुकी थी कि उनके कोई प्रयास सरकार के किसी मंत्री का इस्तीफ़ा तो दूर तबादला भी नहीं करा पाए हैं। किसान आंदोलन के बाद सरकार का यू-टर्न और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की पद मुक्ति में भी उनका कोई हाथ नहीं था। इस बात पर यकीन करना भी क्या मुश्किल है कि कांग्रेस के युवाओं को आकर्षित करने के लिए 'गूंज' जैसे कार्यक्रम भले ही देश में चल रहे हैं लेकिन जंतर-मंतर पर जिन इरादों के साथ जोश-ओ -जूनून का जो बिगुल बजा, वैसा कांग्रेसी बीते बारह सालों में कभी नहीं कर पाए। बेशक भारत जोड़ो यात्रा राहुल गांधी के लिए मील का पत्थर साबित हुई लेकिन चुनावी नतीजों में कुछ बदल नहीं सकी। अब जब धर-पकड़ और ज़्यादतियों के बाद अचानक राहुल गांधी ने इनका बाहें पसारकर समर्थन किया तो समझना क्या मुश्किल है कि यह बस यूं ही नहीं बल्कि सोची समझी रणनीति का परिणाम है।
जंतर-मंतर को प्रदर्शन की जगह नहीं रहने देने के सरकार के फैसले का तिरंगा लहराते हुए विरोध करने पर सीजेपी के संस्थापक सदस्य आशुतोष रांका और सौरभ दास की गिरफ़्तारी के बाद, पांच दिन की न्यायिक हिरासत पर राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा -"शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के साथ तिरंगे फहराना कोई अपराध नहीं है,युवाओं को जेल में डालना कायराना काम है। छात्र,युवा, पत्रकार, इंडिया ब्लॉक सब के बैनर अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन सबका उद्देश्य एक है। वे सब अपना संवैधानिक हक़ मांग रहे हैं।" फिर तो चिट्ठी का जवाब उधर से भी आया। अभिजीत दीपके ने लिखा -"धन्यवाद नेता प्रतिपक्ष, इन दोनों सदस्यों की अवैध गिरफ़्तारी पर बोलने के लिए। "सलाम का जवाब सलाम से आया है। इससे पहले सोमवार को सीजेपी विपक्ष के मार्च में शामिल नहीं हुई थी।
इसमें किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए कि केवल छह महीने पहले इंटरनेट के बल पर खड़े हुए कॉकरोच जब पार्टी बने तो उन पर किसी को यक़ीन नहीं था। आज जिस सुप्रीम कोर्ट को आंखें चौड़ी कर पुलिस की ज़्यादतियों (दिल्ली पुलिस बिना शर्त माफ़ी भी मांग रही है) और एसआईआर विवाद की सुनवाई करनी पड़ रही है, कॉकरोच जनता पार्टी के जन्म के लिए वही ज़िम्मेदार भी रहा है। छह महीने पहले एक सुनवाई में जस्टिस सूर्यकान्त ने जैसे ही कहा कि 'समाज में कुछ कॉकरोच और परजीवी हैं, जो व्यवस्था पर हमला करते हैं। उन्हें रोज़गार नहीं मिलता और पेशेवर ज़िंदगी में कोई जगह नहीं मिलती। उनमें से कुछ मीडिया बन जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया पर सक्रिय हो जाते हैं, कुछ आरटीआई कार्यकर्ता बन जाते हैं और फिर हर किसी पर हमला शुरू कर देते हैं' उसके बाद जो आक्रोश फूटा वैसा पिछले बारह सालों में कभी नहीं देखा गया।
रातों-रात दो करोड़ से ज़्यादा सदस्यता वाली कॉकरोच जनता पार्टी का जन्म हो गया था। सोशल मीडिया पर उसके फॉलोअर्स की संख्या कांग्रेस और भाजपा से कहीं आगे निकल गई। पार्टी के गाने बने जो इतने सुने और साझा किए गए कि निज़ाम हिलने लगा और उन्हें बैन कर दिया गया। हां हम कॉकरोच हैं और किसी की ताकत नहीं जो हमें ख़त्म कर सके.. हम तुम्हारे किलों को ध्वस्त करके ही दम लेंगे। फिर भी सोशल मीडिया पर एक बड़ा वर्ग दो दिन पहले तक सीजेपी को कोई तवज्जो देने के मूड में नहीं था और शायद अब भी इसे कांग्रेस की गलती ही मान रहा है ।
पिछले दिनों कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर सक्रिय लेखकों, पत्रकारों,सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक फ़ेहरिस्त बनाई जो सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करते थे और कांग्रेस के लिए हमदर्दी भी रखते थे। इन सबको दिल्ली बुलाया गया और फिर राहुल गांधी ने उन्हें सम्बोधित किया। उनमें से अधिकांश की राय थी कि कांग्रेस को सीजेपी से दूर रहना चाहिए।यहां तक कि वे अपनी पोस्ट मे भी सीजेपी के हर कदम को एक नौटंकी और फ़र्ज़ी स्क्रिप्ट बताते। जंतर-मंतर पर अचानक रात को आकर सीजेपी नेताओं का तिरंगा फहराने से लेकर,10 अक्टूबर के प्रोटेस्ट से पहले विमान के भीतर से सरकार को चुनौती देना की सभी गतिविधियों को वे फ़र्ज़ी और पूर्व निर्धारित पटकथा वाला खेल कह रहे थे । तर्क के साथ अपनी राय रखने वालों ने भी लिखा -'सोचिये कि कल को आपका अनजाना रिश्तेदार ,भाई कजिन जो लन्दन या अमेरिका में नौकरी कर रहा हो एक दिन अचानक पेज बनाए और जिसके फ़ॉलोअर्स रात में बन जाएं और वह खुद को बड़ा नेता समझते हुए अखिल भारतीय प्रोटेस्ट की कॉल दे तो क्या लगता है आपको उसके साथ क्या होगा। बहुत मुमकिन है कि वह कल (10 अक्टूबर ) की तरह ग़िरफ़्तार कर लिया जाता और मामला वहीं ख़त्म हो जाता। दो दिन बाद उसकी खबर भी नहीं छपती। क्या उसकी गिरफ़्तारी के विरोध में युवा सड़कों पर आते ?नहीं, बिलकुल नहीं।'
इन सबके बीच बुधवार को अचानक कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपना हाथ आगे कर दिया। यह बड़ा शिफ्ट है और क़ामयाब रहा तो भारतीय राजनीति में बड़े परिवर्तन का आधार भी बनेगा। फिर भी ताज़ा सियासी घटनाक्रम बताता है कि कांग्रेस से जुड़कर क्षेत्रीय दलों को बड़ा फ़ायदा होता हुआ नज़र नहीं आया है जिसकी वजह अब एसआईआर भी देखी जा रही है। सीजेपी तो कोई क्षेत्रीय पार्टी भी नहीं। बदलाव की बयार तो बह रही है कि दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में बिना शर्त माफ़ी मांग ली है और चुनाव आयोग मतदाता सूची की हर साल समीक्षा कर उसकी मशीनी प्रति सभी दलों को देगा। इस रिश्ते की मियाद क्या होगी ,जवाब वक्त देगा।


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें