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मेरा बेटा पाकिस्तानी नहीं है-तवलीन सिंह

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आतिश तासीर  तस्वीर साभार इंडिया टुडे  तवलीन सिंह, पत्रकार  वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह का इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में प्रकाशित लेख पढ़ते हुए हैरानी भी होती है और दुःख भी । हैरानी इसलिये  कि एक अख़बारनवीस को इतना डरा हुआ क्यों होना चाहिए और दुःख इस बात का कि पत्रकार की क़लम से माँ का आहत हृदय बोल रहा था। उनके बेटे आतिश तासीर ने चुनाव से ठीक पहले एक लेख क्या लिखा सरकार ने उन्हें भारतीय मानने से ही इनकार कर दिया। सरकार से असहमत आवाज़ को चुनौती दे ने  का यह मामला अंतरराष्ट्रीय इसलिए बन भी बन गया है  क्योंकि आतिश का जन्म लंदन में हुआ, पिता सलमान तासीर पाकिस्तानी थे तो माँ हिंदुस्तानी। .. और  इंडियाज़ डिवाइडर इन चीफ शीर्षक से उनकी एक कवर स्टोरी  अमेरिका की टाइम मैगज़ीन में  प्रकाशित हुई थी और शायद इसी के बाद भारत सरकार का उनके प्रति देखने का नज़रिया भी  बदल गया। यह स्टोरी  ठीक आम चुनाव से पहले प्रकाशित हुई थी, इसलिए  ऐसा मानने में किसी को शुबहा नहीं है कि यह द्वेषभाव के चलते ही ...

अभिजीत के नोबेल के साथ कुछ और भी आया है

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अभिजीत बनर्जी और उनकी पत्नी एस्थर डफ्लो   को अर्थशास्त्र का नोबेल मिलना बेशक़ भारतवासियों के लिए बड़ी ख़ुशख़बर है और यह ऐसे समय आई है जब एक पक्ष पूरी तरह से यह स्थापित करने में क़ामयाब हो रहा था कि एक अच्छा इवेंट कर लेना ही  दुनिया में   भारत  का   डंका बजने का प्रमाण है । लोगों की भीड़ अगर किसी की हर अदा पर  जो फ़िदा हो तो वही सही है, वही सिद्ध है। टीवी चैनलों की बहस में रात को चार-छः लोगों को बैठाकर जो मुद्दा चीख़ चीख़ कर बना दिया जाए, वही मुद्दा है बाक़ी सब ज़रूरतें बेकार हैं ,खामखां हैं। ऐसे में जब कोई सर खुजाते हुए कहीं अफ़सोस या तकलीफ़ भी ज़ाहिर करना चाह रहा होता तो उसे कोई तवज्जो नहीं, महत्व  नहीं । आजू-बाजू के लोग भी उसे गरिया देते तो वह  तकलीफ़ से और घुटने लगता।  उसके  मन की बात के लिए कोई मंच नहीं था । उसे यह भी अहसास होने लगा था कि एक वही इस तरह से क्यों सोच रहा है। लोग तो नोटेबंदी से भी ख़ुश हैं, पकोड़े तलने की बात से भी और प्रतिष्ठित JNU को टुकड़े-टुकड़े गैंग बता कर भी। मॉब लिंचिंग ,दुष्कर्म , NRC जो कि ना...

जोकर के पंच हंसाते नहीं दिल पर लगते हैं

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joker movie : a still from the film फ़िल्म जोकर देखी । हॉलीवुड सिनेमा के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं इसलिए सीधे जो देखा उसी पर बात  करूंगी। जोकर के क़िरदार में वॉकीन फीनिक्स की अभिनय कला काफ़ी ऊंचे पायदान पर जाती दिखाई देती है। आँख, नाक, होंठ के साथ  जोकर का समूचा शरीर अभिनय में दक्ष है। यह काबीलियत जोकर को नई लयताल में पेश करती  है। बेशक वह अपने दुखी पलों में सबसे ज़्यादा हंसना और हँसाना चाहता है।  इस कलाकार का नाच भी दर्शक को मुग्ध रखता है। ख़ासकर जो सीढ़ियों पर है , उन्हीं सीढ़ियों पर जिन पर कभी वह थक कर चढ़ता था। ऑर्थर फ्लेक यही नाम है उस ग़रीब नौजवान का जो अपनी बुज़ुर्ग माँ के साथ रहता है। माँ का ध्यान रखता है,वक़्त पर दवा देता है ,खाना खिलाता है और नहलाता भी है। ऑर्थर को कुछ मानसिक बीमारियां है जिसका इलाज सामाजिक संस्था और अस्पताल मिलकर करते हैं। वह मसखरा है और छोटा-मोटा काम भी उसे मिला हुआ। वह साधन संपन्न नहीं फिर भी सदा मुस्कुराते हुए जीवन के महासमर को पार करने का माद्दा रखता है। एक दृश्य में ऑर्थर बस में सवार है ,एक नन्हीं बच्ची...

सच का सूत

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दिल कहता है  तुम लिखो  फूल, पत्तों, परिंदों, प्रेम की बात  दिमाग़ कहता है  लिखो तकलीफ़  लिखो भीड़ में घिरने की बात  लिखो 'एनआरसी'  के पन्नों में छिपे नश्तरों को  लिखो इंसान को इंसान से  मिलने पर रोक की दास्तान  को  लिखो संवाद के विवाद में  बदलने के मंज़र को  लिखो उस नाम को  जिसे बताने में उसे डर लगता है  लिखो बच्चे को मोहल्ले से बाहर भेजती हुई  माँ के कांपते कलेजे को और बाप की दुविधा को  लिखो  कि वह बच्चे को ऐसा मंतर पढ़ाना चाह रहे जो मुसीबत में काम आए।  क्या कहा  नहीं लिखोगी  तो मत लिखो  तुम किसी क़ाबिल नहीं  दिलो दिमाग़ कुंद हैं तुम्हारे  तुम सो जाओ  जो ज़िंदा रही  तो ख़्वाब में ढूंढ लेना  परिंदो की परवाज़  और ओस की बूंदों से  पवित्र इरादों को।  शायद न मिलें वहां भी  स्वप्न को सवार होने के लिए  भी सच का एक सूत तो चाहिए ही। 

ये सुबह फ़ीकी है निस्तेज है

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बहुत इंतज़ार के बाद आख़िर सुबह सवा आठ बजे फ़ोन किया।  यह आशंका में घिरा फ़ोन था। मैंने पूछा- "नमस्कार, सब ठीक ?" उधर से डूबी हुई आवाज़ आई -"माँ expire हो गई हैं आज नहीं आ पाऊंगा। "मेरी आवाज़ भी जैसे बैठ गई फिर भी बोली -ओह माँ को हमारे भी श्रद्धा सुमन ,मैंने  डरते हुए ही कॉल किया था क्योंकि आप ख़ुद इतने नियमित और समर्पित हो कि ... इससे आगे कुछ कह नहीं पाई। कहना चाहती थी कि आप जब तक ना चाहो, ना आना। ये पैसे भी महीने  के बिल में जोड़ लेना। आप कहाँ रहते हो ? पूछना चाहती थी कि माँ को क्या हुआ ,कोई बीमारी थी लेकिन न कुछ पूछा ना कहा। सुबह जैसे अँधेरा दे गई। photo credit : udaipur times.com ये हमारे न्यूज़पपेर हॉकर हनुमान सैनी जी हैं जो बरसों से हमें अख़बार दे रहे हैं। मुंह अँधेरे अख़बार दे जाने की आदत में पता नहीं कितना हिस्सा क़ायदे का है। सामने के मकानों की बालकनी में अख़बार इतने सटीक ढंग से उछालते हैं कि कभी  नहीं चूकते। ये अख़बार बंद करना है और दूसरा शुरू करना है, इस काम में  भी नहीं। भुगतान लेते समय भी  ये अनुमान लगा के चलते हैं कि कितनी रेज़...

आधा विकास पूरे मुद्दे

भंवर के छोटे भाई की नौकरी जा चुकी है,नई मिल नहीं रही। नया निवेश नहीं ,नई कंपनी नहीं, नई पीढ़ी को भी रोज़गार नहीं। नतीजतन हर तरफ़ निराशा। शांत ... निराशा नहीं। किस बात की निराशा। भंवर को भी निराशा थी लेकिन दिमाग़ के किसी हिस्से में सुकून भी था। उसे शायद यह अहसास करा दिया गया था। असम की NRC से घुसपैठियों से हमेशा के लिए मुक्ति के साथ ही  कश्मीर की एकमात्र मुसीबत धारा 370 अब धाराशाई है।  कश्मीर अपने क़रीब आ गया है लेकिन  कश्मीरियों के बारे में अभी मत पूछना। असम जैसा कढ़ाव अभी और राज्यों में भी तो सुलगाना है। सब को साबित करने में लगा दो कि वे यहीं के हैं। अयोध्या में अपना भव्य मंदिर भी तो बनेगा। मत पूछना कि मंदिर मुद्दे से तहज़ीब का  कितना  ध्रुवीकरण हुआ । जो भी हो आधी रोटी खाएंगे मंदिर वहीं बनाएंगे। आधी रोटी खाएंगे धारा 370 हटाएंगे।  GDP भी आधी हो गई। होने दो। नाहक़  ही नौकरी-नौकरी का राग अलाप रहे हो।  पूरा ध्रुवीकरण भी तो कभी नहीं हुआ था। हम सब काम करंगे। जो भी कहा था सब। तुम आधे पेट के साथ तैयार रहना। घटने दो सब। स्वाभिमान न...

क्या मुंशी प्रेमचंद की कल्पना में होंगे उन्नाव के ऐसे रसूख़दार

महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद का जन्म जिला उन्नाव। उन्नाव मेरे भीतर इसी रूप में अंकित है लेकिन मैं पूरे यकीन से  कह सकती हूँ कि इस ज़िले की बेटी  के साथ जो भयावह अपराध हुआ है, रसूख़दारों के ऐसे जघन्यतम व्यवहार की कल्पना ख़ुद प्रेमचंद ने  भी नहीं होगी। कैसे समाज में तब्दील हो रहे हैं हम ? निर्भया बलात्कार के बाद मर जाती है और उन्नाव की यह बेटी सामूहिक बलात्कार के बाद किसी तरह बच जाती है तो सत्ता और तंत्र उसे अपने पहियों तले रौंद डालने  में  कोई कसर बाक़ी नहीं छोड़ते । यह लड़ाई एक ग़रीब परिवार और ताकतवर की लड़ाई है जिससे हारना मानवता की मौत होगा। तुम ज़िंदा रहना उन्नाव की बेटी।  अफ़सोस बस गहरे तक अफ़सोस। कुछ ना कर पाने का अफ़सोस।