शाहिद मिर्ज़ा : अर्ध शतकीय जीवन में शतकीय मूल्यों की पत्रकारिता
-वर्षा भम्भाणी मिर्ज़ा
आख़िर क्यों याद किया जाना चाहिए एक ऐसे युवा शख़्स को जिसका साथ ज़िन्दगी केवल पचास साल की उम्र में ही छोड़ गई। पत्रकार शाहिद मिर्ज़ा साहब के आगे जो ये दो बड़े -बड़े शब्द पत्रकार और साहब मैंने लिखे हैं इन दोनों के गहरे मायने हैं या कहें कि ये दोनों ही जैसे यहां लिखे जाने पर अपना अर्थ हासिल कर लेते हैं। हिंदी पत्रकारिता का वो नाम जिसका छोटा-सा जीवन भी बड़े विचार, बड़े मूल्य और बड़े दर्शन के द्वार खोलता है। ऐसा सफर जो नईदुनिया से लेकर दैनिक भास्कर,नवभारत टाइम्स और राजस्थान पत्रिका तक चला और हर बार काम के लिहाज़ से बहुत नवोन्मेषी शैलियों में ढला और तमाम युवा साथियों की प्रतिभाशाली टीम भी गढ़ता रहा। शाहिद मिर्ज़ा के पास अपने तमाम क़िस्सों के साथ पत्रकारिता का ककहरा सिखाने का ऐसा हुनर और जज़्बा था अगर किसी ने कुछ दिन भी उनके साथ काम कर लिया, फिर वह अपना सबक कभी नहीं भूला। यह साथ गहरे अध्ययन से आया विचार था साझा होते ही जो सोच के बंद दायरों को खोल देता था। नए प्रशिक्षु को भी सोच की मुक्त उड़ान का अभय और परतों के भीतर छिपे सच को पढ़ लेने की ऐसी शिक्षा कोई बिरले ही दे पाते हैं। यह देने का ऐसा माद्दा था जिसके बदले में किसी गुरुदक्षिणा की कोई अपेक्षा नहीं थी। ऐसे में जो पत्रकार नहीं थे ,वे भी उनके स्वभाव के मुरीद इसलिए होते क्योंकि सोच में केवल सकारात्मकता,साफ़गोई और सराहने का भाव होता था।
पत्रकारिता बालक शाहिद की सोच में ऐसी थी कि बचपन में ही उन्होंने बच्चों के लिए एक हस्तलिखित अख़बार निकाल लिया था और फिर ख़ुद ही उसका वितरण भी किया। स्कूल में वाद-विवाद, भाषण प्रतियोगिताओं से नईदुनिया में संपादक के नाम पत्र लिखते हुए ही इस प्रतिभा पर वहां के तत्कालीन और बेहतरीन संपादक राजेंद्र माथुर साहब की नज़र पढ़ी। उन्होंने कॉलेज में पढ़ने वाले इस नौजवान को बुलाया और अख़बार के लिए संपादकीय लिखवाया। यह वह दौर था जब अख़बार के संपादकीय मत बनाने और सरकारों को हिला देने का माद्दा रखते थे। नौजवान शाहिद फिर अगले आठ सालों तक नईदुनिया अख़बार की ताक़त बना रहा। यहां से दैनिक भास्कर इंदौर के संपादक,नवभारत टाइम्स दिल्ली(असिस्टेंट एडिटर ) एक बार फिर भास्कर और आख़िर में बड़ा वक़्त जयपुर, राजस्थान पत्रिका के साथ जो योगदान शाहिद मिर्ज़ा का पत्रकारिता को रहा, वह आज किसी किताब की शक्ल में आने की पैरवी करता है।
पत्रकारिता के ऐसे मूल्य उनके व्यवहार में शामिल थे जो उस मिशन की तरह लगते, जिसकी ज़रूरत आज़ादी के बाद भी देश को थी। ऐसे मूल्य जहां पेशेगत ईमानदारी, राजनैतिक दलों से समान दूरी,पर्यावरण और नैतिक मूल्यों के प्रति अगाध आस्था उनके व्यवहार और व्यक्तित्व का अनिवार्य हिस्सा थीं। जोधपुर में राजस्थान पत्रिका के स्थानीय संपादक रहते हुए मुख्यमंत्री भैरोंसिंह जी शेखावत से बातचीत होती और अशोक गहलोत से भी लगातार संपर्क रहा लेकिन गहलोत जी के सीएम बनने के बाद, जानबूझ कर कोई मुलाकात नहीं। पद और प्रभाव से निर्लिप्त इस पत्रकार को अलवर में स्थानीय संपादक रहते हुए आरक्षित दर पर प्लॉट आवंटित हुआ। इसी बीच उनका तबादला जयपुर हो गया। प्लॉट तुरंत बेच कर धन कमाया जा सकता था लेकिन उन्होंने सरेंडर करना बेहतर समझा जिसमें कुछ अतिरिक्त राशि उन्हें अपनी जेब से भी देनी पड़ी। लिफ़ाफ़ा लेकर घर पहुंचने वाले भी कम नहीं होते थे लेकिन उन्हें भी सम्मान पूर्वक विदा किया जाता। ये कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन सच्चे और ईमानदार पत्रकार को क़दम -क़दम पर इन इम्तेहानों से गुज़रना पड़ता है। गांधीजी के शब्दों में साध्य के लिए साधन का पवित्र होना भी आवश्यक है। देश को बेहतर बनाने की ऐसी कोशिश और व्यवस्था में ऐसा यकीन कि ये क़ाबिल सरकारी डॉक्टर, उनके किडनी के रोग का इलाज भी कर देंगे लेकिन अफ़सोस।
नईदुनिया में लता मंगेशकर,कुमार गन्धर्व ,मक़बूल फ़िदा हुसैन,किशोर कुमार, राज कपूर,दिलीप कुमार फैज़ अहमद फैज़ अटल बिहारी वाजपेयी के उनके लिए साक्षात्कार इतने चाव से पढ़े जाते थे कि उन्हें आज के लोकप्रिय पॉडकास्ट का दर्जा दिया जा सकता है। वे अख़बार और कतरनें पाठकों के संग्रह में अब भी हैं। सम्पादकीय कौशल ऐसा कि राजनीति, वैश्विक राजनीति ,कला ,साहित्य ,खेल सब में एक सा दख़ल। कुछ ही बरसों में उन्हें चलता-फिरता एनसाइक्लोपीडिया कहा जाने लगा था। तब का गूगल गुरु जिससे कभी भी, कुछ भी पूछा जा सकता था। भाषा व्याकरण पर पूरी पकड़ और मजाल कि कोई नया शब्द बिना-जांचे परखे इस्तेमाल हो जाए । 'अख़बार में छपा है' यह विश्वास ऐसे ही पत्रकारों की बदौलत पाठकों में बना था। आखिर यह दक्षता आती कहां से थी? जब उन्हें क़रीब से जाना तो समझा कि इसके पीछे खूब गहरा अध्ययन है । हर नई किताब ,नए से नए शोध में गहरी दिलचस्पी और कभी-कभार तो अपनी तनख्वाह से भी ज़्यादा महंगी पुस्तकों की ख़रीद। एक ही जुनून कि अपने अख़बार के माध्यम से पाठक तक ज़रूरी ,तथ्यात्मक जानकारी कैसे पहुंचे। वे मानते थे कि पत्रकारिता एक पवित्र पेशा है और अख़बार के दायित्व बड़े होते हैं। उनसे किसी ने पूछा भी कि आप तो भाषा पर पकड़ रखते हैं, अंग्रेजी अख़बार से क्यों नहीं जुड़ जाते ,उनका जवाब होता -"हिंदी बड़े पाठक वर्ग से जोड़ती है और सूचनाओं और जाग्रति का हिंदी पट्टी में पहुंचना ज़्यादा ज़रूरी है। अफ़सोस शायद यह काम भी अधूरा ही छूट गया।
नईदुनिया में काम करते हुए काबिलयत के चर्चे बढ़ते गए और उन्हें नए-नवेले अख़बार दैनिक भास्कर का दायित्व मिला। इंदौर से शुरू हुए इस अखबार के सामने सबसे बड़ी चुनौती नईदुनिया ही था। पत्रकारिता के नए तेवर के साथ शाहिद मिर्ज़ा वे संपादक थे जो संवाददाताओं को खुली छूट देते और ख़बर में दम हो तो रात एक बजे मशीन रुकवाकर भी ब्रेकिंग न्यूज़ प्रकाशित करते। हिंदी अख़बार अक्सर रिपोर्टर का नाम देने में कंजूसी बरतते थे। शाहिद मिर्ज़ा ने इस प्रथा को भी बदला। किसी बड़े कलाकार (राज कपूर))के अवसान पर बैनर हैडलाइन का प्रयोग हिंदी अख़बार में पहली बार था। उन्हें जानने वालों ने स्त्री और बच्चों के प्रति उनके मन में अतिरिक्त सम्मान देखा था। इंदौर ke शाहबानो के समय जब उन्होंने तलाक़ के बाद पूर्व पति से गुज़ारा भत्ते देने की मांग की थी उन्होंने लगातार इस स्त्री के हक़ में लिखा। बोलने और मंच संचालन का ऐसा तजुर्बा कि इंदौर भास्कर उत्सव में संपादकीय दायित्व के साथ-साथ पूरे इंदौर को ऐश्वर्या राय,पंजाब में आतंक के ख़ात्मे के झंडाबरदार आईपीएस केपीएस गिल, इला अरुण और प्रीतिश नंदी के कार्यक्रमों का न्योता दिया था। पाठक की नब्ज़ पर हाथ रखते हुए अख़बार जड़ें जमाने लगा और ये उत्सव अब अन्य शहरों में भी होते हैं। अफ़सोस कि अब पत्रकारिता फ़ील्ड में जाने की बजाय बंद कमरों में लिखने और गला फाड़ कर चिल्लाने का नाम रह गई है।
राजस्थान पत्रिका में डिप्टी एडिटर रहते हुए उनके दो स्तंभ नियमित छपा करते थे। खम्मा घणी और तेवर। 'खम्मा घणी' समसामयिक विषयों पर और 'तेवर' भारत और पड़ोसी मुल्कों से रिश्तों के बारे में होता था। खम्मा घणी हर शुक्रवार को छपता था और दिनभर उनका फ़ोन बधाइयों से खनखनाता रहता। अख़बार के दफ़्तर में पूरे राजस्थान से उनके लिए चिट्ठियां आतीं जिनमें स्कूल,कॉलेज और अन्य संस्थाएं उन्हें अपने कार्यक्रमों में बुलाना चाहती। एक दिन मैं जयपुर के डायग्नोस्टिक सेंटर में उनका नाम लेकर जांच रिपोर्ट मांग रही थी, तभी एक सज्जन आए और पूछा कि क्या ये वही शाहिद मिर्ज़ा साहब हैं जिनका कॉलम पत्रिका में छपता है ? मेरे हां कहने पर उन्होंने कहा-अरे उनका यह स्तम्भ तो पूरी दुनिया को जगाता है, इन्हें क्या हुआ ,ईश्वर उन्हें लम्बी आयु दे । अफ़सोस कि ऐसा हो ना सका। मई 2007 में किडनी की बीमारी ने उन्हें हमसे दूर कर दिया।
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