अब 'सर ' उठाना बहुत भारी है इस सरकार के लिए


मोदी सरकार के लिए ये समय भीषण संकट का है। चुनाव सुधार के लिए लाई गई प्रक्रिया सर के खिलाफ जो भावनाएं  जनता के भीतर थीं, उसे जैसे यकायक तेज़ स्वर मिल गए हैं। हरेक के दिल का लावा जैसे बह निकला है । अभी कुछ समय पहले जो देश का युवा पूछ रहा था कि जंतर-मंतर पर गोली किसके कहने पर चलाई गई और वही अब पूछ रहा आखिर है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने किसके कहने पर ऐसे गैर क़ानूनी कदम उठाए ? जवाब हैं पर अभी सब गोल-गोल घूम रहे हैं। कॉकरोच जनता पार्टी ने 48 घंटे के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की चेतावनी दे दी है तो कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार को केवल मोहरा कहा है और इसके पीछे के षड्यंत्रकारियों को देशद्रोही क़रार देते हुए जांच की मांग की है। उसने कहा कि साल 2023 में ही इस पद को तमाम अपराधी और दीवानी मुकदमों से जीवनभर की मिली इम्युनिटी के नतीजे सामने हैं । कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार को क़ाबिल अफ़सर बताते हुए गवाह बन जाने की सलाह भी दे डाली है । 



यह ज्वालमुखी  इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकार रितिका चौपड़ा की बुधवार को प्रकाशित रिपोर्ट  के बाद फटा है। यह रिपोर्ट अब गर्म - गर्म लावा सीधे सरकार के हाथ पर रख रही है  जिसमें दो चुनाव आयुक्त कह रहे हैं कि उन्होंने पिछले दस महीनों में 14 बार आपत्तियां दर्ज़ कराई थीं जिसे पूरी तरह अनदेखा किया गया।  ज़ाहिर है कि ये तमाम अलोकतांत्रिक फैसले बेहद अलोकतांत्रिक तरीके से लिए गए। केंद्रीकृत तकनीक का सहारा लेकर करोड़ों नाम हटा दिए गए जबकि ज़रूरी था कि देश भर के चुनाव अधिकारियों की मंज़ूरी के बाद नाम हटाने या जोड़ने का काम होता। इस पर भी दोनों चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी। यह एतराज़ एक दिन में चार बार भी जताया गया। किसी को लगता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ही सबसे बड़े हैं तो वे दुरुस्त कर लें कि ये तीनों बराबर हैं और इन तीनों में मुख्यचुनाव आयुक्त पहले स्थान पर हैं। व्यवस्था बहुमत यानी तीन में से दो की सहमति की पैरवी करती है। दोनों ने मतदाता पंजीकरण फॉर्म 6 में बदलाव को तो पूरी तरह गैर कानूनी बताया क्योंकि यह फैरबदल संसद की मंज़ूरी के बाद ही हो सकता था। मतदाता सूची के सॉफ्टवेयर का नियंत्रण आईटी विभाग को देकर राज्य के चुनाव अधिकारियों के अधिकार कम किए गए। तकनीक का सहारा लेकर देश के 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटा दिए गए। इसकी शिकायत फिर कैबिनेट सचिव से भी की गई जिसके भी कोई नतीजे नहीं मिले । 
 
देश के मुख्य चुनाव ने अपनी सफाई में दो चुनाव आयुक्तों की आपत्ति पर तो कुछ नहीं कहा लेकिन देश के 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटने  पर कहा कि इन्हें ड्राफ्ट सूची में आगे नहीं बढ़ाया गया ,यह अंतिम रूप से हटाए गए नामों की गिनती नहीं है। नए मतदाता या उसके रिश्तेदार से जुड़े सवाल फॉर्म 6 में नहीं बल्कि अलग घोषणा पत्र में हैं। दरअसल सर को लेकर जो कोहराम मचा है उसे खुद चुनाव आयोग ने ही जटिल किया है। जनता के बीच ख़राब संदेश इसलिए भी गया  क्योंकि गोवा और पश्चिम बंगाल में यही मतदाता सूची सरकारी फ़ायदों के लिए भी बेंचमार्क होगी। गोवा में अंग प्रत्यारोपण और डायलिसिस की सुविधा भी उसे ही मिलेगी जिसका नाम वोटर लिस्ट में होगा। आख़िर सरकार को इन  मतदाताओं की तलाश में ऐसे हड़बड़ी क्यों है ? पहले वोटर सरकार चुनते थे अब सरकार वोटर चुन रही है। पहले पार्टियां बूथ पर कब्ज़ा करती थीं अब सीधे सिस्टम में घुस कर वोटों पर कब्ज़ा करने का मानस है।  

विशेष गहन पुनरिक्षण यानी सर के दौरान अधिकांश मतदाताओं को यही लगा कि उनसे मुश्किल कागज़ात मांगे गए। होता यह था कि आप आयोग की वेबसाइट पर जाकर बड़ी आसानी से अपना नाम दर्ज़ करते थे और वोटर आईडी आपके घर पहुँच जाता था। चुनाव आयोग जो हर मतदाता को शामिल करने के इरादे से काम करता था, उसने अब नाम छोड़ने में ज़्यादा रूचि ली।  13 करोड़ मतदाता छूटने का आंकड़ा तो दुनिया के कई देशों की अबादी से भी बड़ा है। पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के मुताबिक तो सर को पूरी तरह हटा दिया जाना चाहिए। एक समय लवासा स्वयं असहमत होकर पद त्याग चुके हैं। सवाल यही कि ऐसा दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने क्यों नहीं किया, लवासा कहते हैं-ऐसा तब ही हो सकता था जब ये बैठकें एक साथ होती। यहां दो एक साथ थे जो कि बहुमत था। वैसे मई से सितंबर के बीच कोई आमने-सामने की बैठक आयोग की नहीं हुई है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाय. कुरैशी पहले ही कह चुके हैं कि साल 2002 को आधार बनाना सही नहीं है क्योंकि उनके  पिता का नाम भी गलत लिखा गया था और करोड़ों मतदाताओं की पहचान को सिद्ध करने के लिए इस तेज़ और अंतिम समय में किये गए अभियान के लिए बूथ स्तर के कार्यकर्त्ता को अर्द्ध न्यायिक शक्तियां देना ठीक नहीं है। बेशक इस जल्दबाजी में दिल्ली की मुक्यमंत्री से लेकर विदेश मंत्री तक के नाम छूटे। 

 बुधवार की सुबह पत्रकार की रिपोर्ट के बाद तो लगा जैसे कट्टर समर्थक खिलाड़ी भी पाला बदलने को मजबूर हो गए हों। अगले दिन कांग्रेस और कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी ) ने भी लयबद्ध तरीके से प्रेस कॉनफरेन्स की। कांग्रेस ने समझाया कि पुरखों की लोकतांत्रिक व्यवस्था को कैसे छिन्न-भिन्न किया जा रहा है और यह देशद्रोह है और ज्ञानेश कुमार को चाहिए कि वे गवाह बन कर ख़ुद को देशद्रोही होने से बचा लें।। सीजेपी ने 48 घंटे की चेतावनी देकर शिक्षा मंत्री प्रधान के बाद ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांग लिया है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी तो आजकल किसी टीचर की तरह आते हैं और स्लाइड शो  का सिलसिला शुरू कर देते हैं। उनकी पहली ही स्लाइड में ग्रहमंत्री कह रहे थे कि भारतीय जनता पार्टी कि आदत डाल लो क्योंकि हम 2030 तक कहीं नहीं जाने वाले। राहुल का सवाल था कि आख़िर जब हर लोकतान्त्रिक देश में कभी ना कभी बहुत लोकप्रिय सरकारें भी एंटी इनकमबेंसी के दायरे में आती हैं तब यहां ऐसी इम्युनिटी कैसे बनी हुई है ? ऐसा तो इराक और उत्तर कोरिया में होता है। वे कहते हैं-" ज्ञानेश कुमार को प्रधानमंत्री ने चुना है। पहले वोट चोरी फिर सिस्टम चोरी, क़ानून चोरी और फिर संवैधानिक संस्थाओं के चोरी होने का सिलसिला शुरू हो जाता है। हमें समझना होगा कि वोट चोरी के बाद से जो सांसद या विधायक चुना जाता है वह ख़राब और कमज़ोर क़ानून की पैरवी करता है और ख़राब कानून संवैधानिक संस्थाओं को बेअसर करते हैं और वर्तमान में यही हो रहा है। यह भारत की जनता के ख़िलाफ़ देशद्रोह है और इस देशद्रोह को हम बर्दाश्त नहीं करेंगे। वैसे पूर्व नेता प्रतिपक्ष अधिरंजन चौधरी पहले ही कह चुके हैं कि चुनाव आयुक्तों का चयन,समिति की बैठक महज़ औपचारिकता थी। दस मिनट पहले दो नाम सामने रख दिए जाते हैं और वही चुनाव आयुक्त बन जाते हैं।  


देखते हैं कि देशभर में इस प्रतिरोध के बाद ज्ञानेश कुमार पद छोड़ते हैं या गवाह बन कर सरकार को चुनौती देते हैं। ट्रैक रेकॉर्ड तो सरकार के हक़ में है। उम्मीद फिर सुप्रीम कोर्ट से ही बंधती है जो पहले मतदाता के साथ नज़र आया था जब आधार को भी पहचान बतौर मान्य बताया था लेकिन धीरे-धीरे चुनाव आयोग को खुली छूट मिलती चली गई। अब जब साफ़ हो गया है कि आयोग के फ़ैसले इकतरफ़ा थे, भारत का सर्वोच्च न्यायालय दखल देकर ग़लती सुधारेगा ? वैसे सवाल तो राष्ट्रपति और संसद से भी हैं। बशीर बद्र का  एक शेर है -

मैं चुप रहा तो और ग़लत-फ़हमियां बढ़ीं 
वो भी सुना है उसने जो मैं ने कहा नहीं 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वंदे मातरम्-यानी मां, तुझे सलाम

सौ रुपये में nude pose

नफ़रत की आग में सिंकती रोटियां