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हमने चुनी जयपुर की लेडी मेयोर

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हमारे शहर जयपुर की प्रथम महिला को हमने सीधे चुना है। किसकी पतंग कटेगी और किसकी उड़ेगी, उससे भी ज्यादा जरूरी है कि कौन शहर की आबो-हवा को खुशनुमा रखेगा। आबो-हवा के मायने शहर की आत्मा को समझने से है। क्या है जयपुर? शानदार ऐतिहासिक विरासत का शहर या मॉल्स, मल्टीप्लैक्स जैसी ऊंची आधुनिक इमारतों का शहर। हम इसके छोटी काशी के स्वरूप से स्नेह करते हैं या आधी रात को सिगरेट के लच्छे बनाते-लहराते युवक-युवतियों के डिस्को थेक से निकलने पर? नहीं यह मोरल पुलिसिंग नहीं है। नैतिकता तजते हुए तो लोग पवित्र परिसरों में भी देखे जा सकते हैं, लेकिन जयपुर दर्शन के लिए आने वाला सैलानी यहां कतई मॉल्स में शॉपिंग करने या डिस्को में थिरकने नहीं आता। शायद इन से भागकर ही आता है। तभी तो कल जयपुर पधारे ग़ज़ल गायक पंकज उधास ने भी कहा 'जयपुर आकर जो शांति और सुकून मिलता है वह दुनिया के किसी कौने में नहीं मिलता बड़े शहरों में सिवाय बिल्डिंग्स और मोल्सके कुछ नजर नहीं आता' सैलानी आता है उस मरुस्थल को महसूस करने, जहां कभी जिंदा रहना सिर्फ मानवीय जिजीविषा का ही नतीजा था। यहां का बाशिंदा न केवल जिंदा रहा, बल्कि राजस्थान प...

भटेरी की भंवरी देवी

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कैसी हैं वे सामूहिक बर्बरता के १७ साल बाद ? उन्हीं दिनों दूरदर्शन पर एक कार्यक्रम आया करता था परख। प्रस्तुत करते थे विनोद दुआ। उसी कार्यक्रम के जरिए इंदौर में रहते हुए राजस्थान के भटेरी गांव की भंवरी देवी की आवाज सुनी थी। आवाज क्या थी दर्द और आक्रोश में डूबा हाहाकार था। इंटरव्यू में भंवरी देवी ने स्वयं पर हुए अत्याचार को जुबां दी थी। वह एक-एक कर पांचों आरोपियों का नाम लेकर खुद पर हुए जुल्म का ब्यौरा दे रही थी। उनका सामूहिक बलात्कार हुआ था। देखने वालों के दिल में उनकी तकलीफ नश्तर की तरह धंसती जा रही थी। यकीन मानिए वह आवाज आज भी कौंधती है। फिर एक सुबह बाखबर करने वालों का एक एसएमएस मिला कि शहर में आठ महिलाओं की चित्र प्रदर्शनी लग रही है। "द मेल " शीर्षक के इर्द-गिर्द ही चित्रों का ताना-बाना बुना गया है। बतौर अतिथि भंवरी देवी आमंत्रित हैं। न्याय की राह देखती सामूहिक बलात्कार की शिकार स्त्री से द मेल चित्र श्रखला का उद्घाटन। खैर, इस अवधारणा की दाद देने या आलोचना में पड़ने के बजाय बेहतर यह जानना होगा कि आज सत्रह साल बाद भंवरी देवी किस हाल में हैं? वह भंवरी देवी जो साथिन थीं , है...

चला रहा है निजाम ए हस्ती...वो ही खुदा है

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ॐ जय जगदीश अल्लाह ओ अकबर बोले सो निहाल सत् श्री अकाल जय यीशु यह महज शब्द नहीं बल्कि उस परम पिता परमेश्वर का जय घोष है जो दुनिया के निजाम को चला रहा है। यह दिन-रात जोर-जोर से दोहराने, पुकारने का नाम भी नहीं है। यह हर हाल में अपने मानस को तनाव से मुक्त रखने के लिए है। क्या हम पूछ सकते हैं कि आज के माता-पिता अपने बच्चों में इसे रोपने का दायित्व कितना निभा पा रहे हैं ? कल ही की बात है। नन्हा मोनू दरवाजे से टकराकर गिर गया और जोर-जोर से रोने लगा। घबराई मां दौड़कर रसोई से बाहर आई और मोनू को गोद में उठा पुचकारने लगी। मोनू का रोना कम नहीं हुआ। मां ने एक जोरदार प्रहार दरवाजे पर किया और कहा देख दरवाजे की पिटाई हो गई अब वह रो रहा है। दरवाजे को पिटते देख मोनू चुप हो गया। मोनू की मां अकसर कभी दरवाजे को पीटकर तो कभी जमीन पर धप लगाकर मोनू के लिए झूठ-मूठ की चीटियां मरवाती रहती हं उस दिन साहिल भी स्कूल से चोट लगवाकर आया। हाथ पर घाव था और पट्टी बंधी हुई थी। मां से बेटे का दुख देखा ना गया। चल पड़ी स्कूल राहुल को ढूंढ़ने क्योंकि साहिल ने यही बताया था कि राहुल ने उसे धक्का दिया। दरअसल, यह बहुत ही सेडिस्ट ...

मेरा वो सामान लौटा दो

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मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है सावन के कुछ भीगे भीगे दिन रखे हैं और मेरे एक खत में लिपटी रात पड़ी है वो रात भुला दो, मेरा वो सामान लौटा दो गुलजार साहब ने यह पंक्तियाँ फिल्म इजाजत के लिए लिखी थीं। क्या वाकई अतीत का वर्तमान में विश्लेषण कर पाना इतना आसान है? हिसाब हो सकता है इस सामान का? आप पति-पत्नी थे। एक-दूसरे को प्रिय थे। आपने बहुत से अच्छे काम किए, खुशियां साझा की। अब खटकने लगे। अलग हो गए। तलाक हो गया और न्यायलय का फैसला आ गया कि आपका सारा सामान संपत्ति अलग-अलग नहीं होगी किसी एक के पास जाएगी। पति के पास कभी सोचा है आपने कि पति यदि बाहर जाकर पैसे कमा रहा है तो पत्नी कितना कुछ घर में दे रही है। उसके काम की गणना करने की हिम्मत की है किसी ने। उस प्रेम का हिसाब कौन देगा जो उसने अपनी गृहस्थी से किया है। और वे बच्चे जो दोनों कितने जतन और उम्मीद से दुनिया में लाए थे। उन दोनों के प्रेम का नतीजा। उसे कौन और कैसे अलग करेगा। का तो आपने कह दिया पति को मिलेगी लेकिन बच्चे? फिर तो वे भी पति को मिलने चाहिए। कई और भी अच्छे काम हुए होंगे। सब पर उसी का हक है क्योंकि निर्णय तो उसका है। आम स्त्री ...

मुझको इतने काम पे रख लो. . .

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जब भी सीने पे झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूं उसको मुझको इतने काम पे रख लो फिजा में भीनी -भीनी महक है। प्यारे से रिश्ते की महक। एक-दूजे को खुद को सौंपते हुए सृष्टि को आगे बढ़ाने वाला यह रिश्ता इतना अलौकिक क्यों जान पड़ता है। एकदम डिवाइन-सा। गौर किया जाए तो यही रिश्ता बेहद लौकिक है, यानी पृथ्वी पर तय किया हुआ। माता-पिता, भाई-बहन जैसे तमाम रिश्ते जरूर ईश्वरीय लगते हैं, क्योंकि इन्हें तय करने में हमारी कोई भूमिका नहीं है। यह सौ फीसदी ऊपर वाले के बनाए हैं, लेकिन पति-पत्नी का रिश्ता...। कितना अपना, कितना करीब। कोई तीसरा इसकी थाह नहीं जान सकता। एक हॉलीवुड फिल्म देखी थी पिछले दिनों, शल वी डांस। नायक रिचर्ड गेर [वही शिल्पा शेट्टी का सरेआम चुंबन लेने वाले गेर] और नायिका जेनिफर लोपेज। नायक के बच्चे किशोर हो चुके हैं और वह अपनी वैवाहिक जिंदगी से बेहद खुश है, फिर भी कुछ कमी है। अकसर, नहीं हर रोज़ वह ट्रेन से गुजरते हुए एक डांस क्लास की खिड़की पर खड़ी खूबसूरत डांसर को निहारा करता है। यह कशिश इतनी गहरी है कि वह डांस क्लास में दाखिला ले लेता है। दोनों एक डिवाइन रिश्ते में बंधने ल...

पाँच हजार रुपये में बेच दी बच्ची

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बाज़ार में इन दिनों जहाँ कबाड़ से लेकर महल तक बिक रहे हैं वहीँ जिंदगियां भी दाव पर लगी हैं उसने अपनी नवजात बच्ची को बेच दिया. यह पहली बार नहीं था कि धन के नीचे संवेदना कुचली गयी हो. नवरात्र में कन्या जिमाने का दस्तूर है लेकिन उसने अपना अंश किसी और के सुपुर्द कर दिया था. अगर आप मान रहे कि वह बिटिया थी इसलिए ऐसा हुआ तो आप भूल करेंगे यह बेटी तेईस साल की भव्या की चौथी संतान है। पति नंदू खास कमाता नहीं। पड़ोसी थे, शादी कर ली। दोनों के माता-पिता की सहमति इस शादी में नहीं थी। अपनी संतान से मुंह मोड़ पाना कब किस के बस में रहा है [लेकिन भव्या -नंदू के बस में तो है]वे धीरे-धीरे जुड़ने लगे। धन का अभाव अमावस के अंधेरे की तरह इनके साथ लगा हुआ था। कामचोर पति का साथ निभाते हुए भव्या ने कई छोटी-मोटी नौकरियां की, लेकिन कोई भी कायम नहीं रही। पहली संतान एक बेटा हुआ, जो कुपोषण का शिकार था। दो महीने बाद ही वह दुनिया छोड़ गया। दसवीं फेल भव्या कभी किसी पार्लर में, कभी कैटरिंग सर्विस में और कभी सेल्स में काम करती रही। बेटे की मौत के एक साल बाद दूसरी संतान उसकी गोद में थी। पालने के लिए न समय था, न पैसा। भव्या की स...

हर चेहरा विदा....

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क्या वाकई तिथियों के साथ गम भी विदा हो जाते हैं ? काश यादों का भी तर्पण हो सकता और यदि नहीं तो कागे की जगह एक बार ही वह दिखाई दे जाता जिसके लिए आँखों से नमी का नाता टूट ही नहीं पा रहा है. सांझ सां .....झ हर चेहरा विदा. अन्तिम तीन पंक्तियाँ कवि अशोक वाजपेयी की हैं जो उन्होंने 1959 में लिखी थीं । क्या वाकई हर चेहरा विदा है? विदा होते ही सब कुछ खत्म हो जाता है कि कुछ रह जाता है तलछट की तरह। सालता, भिगोता, सुखाता और फिर सराबोर करता। कभी किसी प्रेम में डूबे को देखा है आपने? एक ऐसे सम पर होता है जहां चीजें एक लय ताल में नृत्य करती हुई नजर आती हैं। इतना सिंक्रोनाइज्ड कि कोई चूक नहीं। समय से बेखबर बस वह उसी में जड़ हो जाता है। यह जड़ता तब टूटती है जब दोनों में से कोई एक बिखरता है। विदा होता है। अवचेतन टूटता है। चेतना जागती है। तकलीफ, दुख, पीड़ा जो भी नाम दें, सब महसूस होने लगते हैं। एहसास होता है जिंदा होने का। एहसास होता है उस ...ताकत का जो इस निजाम को चला रही है। इससे पहले तक लगता है जैसा हम चाह रहे हैं वही हो रहा है। हमने यह कर दिया, वह कर दिया। हमारे प्रयास से ही सब बेहतर हुआ। फि...