'साला 'संसद में तमतमाने का सबब क्या है
आख़िर इस तमतमाने का सबब क्या है? क्यों ये नेता अपने क्रोध पर क़ाबू नहीं कर पाते ? क्यों लोकतंत्र के मंदिर में इनका आवेश चरम पर होता है ? यक़ीनन गृहमंत्री की इस भाव–भंगिमा और तेवर के बाद कि 'आपकी मुनसिफ़ी से नहीं चलेगी संसद और मेरे बोलने का क्रम मैं तय करूँगा' ने बता दिया है कि वे दलों के बीच कैसा संबंध रखना चाहते हैं। यह दृश्य जिसने भी देखा वह तकलीफ़ में आ गया कि गृहमंत्री और नेता प्रतिपक्ष के बीच संवाद किस स्तर तक पहुंच गया है। ये जो आपा खोना है इस पर तो भारतीय प्राचीन ग्रंथ आख्यानों से भरे पड़े हैं। एक से एक बेहतरीन उदाहरण हैं मनसा,वाचा, कर्मणा को क़ाबू में रखने के लिए। गीता में तो बहुत स्पष्ट है कि बुद्धिमान व्यक्ति का मन, शब्द और कर्म पर नियंत्रण बहुत ज़रूरी है। अनदेखा तो नेता प्रतिपक्ष को भी नहीं किया जा सकता क्योंकि संवाद जो संयम की सीमा-रेखा लांघ गया, उसके दूसरे छोर पर वे थे।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह तो लगातार चुनाव जीतने वाली, सबसे बड़ी पार्टी के सशक्त नेता हैं फिर क्यों उनका ग़ुस्सा सतह पर आ गया। नेता प्रतिपक्ष लगातार चुनाव हार रहे हैं ,उनके पास ढेरों सवाल हैं और ऊपर जाने के लिए बेहिसाब सीढ़िया हैं ,वे सत्ता को आवेश के साथ सीधे चुनौती देना चाहते हैं। उनके पास खोने के लिए कम है लेकिन गृहमंत्री, वे तो संसद में सबसे बड़ी पार्टी के बड़े नेता हैं ,उन्होंने धैर्य क्यों खोया ? अब चूंकि यह सब संसदीय टीवी पर लाइव था इसलिए मामला हाथ कंगन को आरसी वाला हो गया है। ऐसे ही लाइव प्रसारण में गृहमंत्री का एक अपशब्द भी ख़ूब चर्चा में है जिसके लिए उन्होंने ख़ुद कहा कि अगर कुछ ग़लत बोल दिया है तो रिकॉर्ड से हटा देना। संसदीय इतिहास में बुधवार का यह दिन व्यवहार के सबसे बुरे बर्ताव और कटुता के लिए याद रखा जाएगा। इस कटुता के बीच वह शेरों शायरी से भरा संवाद सहज याद आ जाता है जब विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने अपने तीखे तेवरों से तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को घेरा था लेकिन फिर उनके शेर के बाद वह भी मुस्कुराने लगी थीं।
अमित शाह
संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान चुनाव सुधार पर जारी बहस में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी गृहमंत्री को लगातार चुनौती दे रहे थे कि आप मेरी प्रेस कांफ्रेंस में बताई गई चुनावी गड़बड़ियों पर बहस कर लीजिये। इससे पहले वे अपने भाषण में पूछ चुके थे कि चुनाव आयुक्तों की चयन समिति से सीजेआई (भारत के मुख्य न्यायाधीश ) को क्यों हटाया गया, कानून बदल कर चुनाव आयुक्त को इम्युनिटी का तोहफ़ा क्यों दिया गया ,सीसीटीवी और उसमें मौजूद डाटा को लेकर कानून क्यों लाया गया कि चुनाव आयोग फुटेज नष्ट कर सकता है। गृहमंत्री अमित शाह इस टोकने को सहन नहीं कर पाए और लगभग चीखते हुए बोले –"आपकी मुनसिफ़ी (इंसाफ़ या न्याय करने वाला ) से संसद नहीं चलेगी, मेरे बोलने का क्रम मैं तय करूंगा, इस तरह से नहीं चलेगी यह संसद।" अब विचार कीजिये कि इस उत्तेजना की बजाय अमित शाह, राहुल गांधी की बात को हंसकर टाल देते या किसी गुजराती कविता या शेर के साथ जवाब दे देते देते तो किसका क़द ऊंचा होता।
बेशक सवालों के जवाब भी गृहमंत्री ने दिए लेकिन वे इस बहस में भी नेहरू,इंदिरा और सोनिया गांधी को लाने से नहीं चूके। उन्होंने कहा-पहली वोट चोरी तो यह थी कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा, यह कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्षों के वोट से तय हुआ था। 28 प्रदेश अध्यक्षों ने सरदार पटेल को वोट दिया,सिर्फ दो ने पंडित नेहरू को फिर भी नेहरू जी प्रधानमंत्री बन गए। दूसरी वोट चोरी थी जब इंदिरा गांधी रायबरेली से अनैतिक तरीके से चुनाव जीतीं। राज नारायण कोर्ट गए। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी की जीत रद्द कर दी। इसे छिपाने के लिए क़ानून लाया गया कि पीएम के ख़िलाफ़ कोई मुक़दमा नहीं चल सकता। फिर अमित शाह ने कहा कि सोनिया गांधी भारतीय नागरिक बनने से पहले ही भारतीय मतदाता बन गई थीं। जब हंगामा हुआ और उसे साबित करने की चुनौती दी गई तब उन्होंने कहा- "अभी सिर्फ केस आया है ,आगे जब फ़ैसला आएगा तब बताउंगा।" लोकसभा अध्यक्ष ने गृहमंत्री का समर्थन करते हुए कहा कि उन्होंने कोई फ़ैसला नहीं सुनाया,सिर्फ आए हुए केस का ज़िक्र किया है। बहरहाल गृहमंत्री के क्रोध और राहुल गांधी के हस्तक्षेप पर भी स्पीकर की भूमिका होती तो लोकसभा उस अप्रिय और शर्मनाक दृश्य से भी बच सकती थी। जहां तक पंडित नेहरू का सवाल है 1952 में वे बंपर बहुमत से चुनाव जीते थे और प्रदेश अध्यक्षों के वोट से पार्टी का अध्यक्ष तय किया जाना था, प्रधानमंत्री नहीं। दुर्भाग्य से सरदार पटेल का निधन 1950 में हो गया था और 15 दिसंबर को उनकी पुण्यतिथि है।
एक और शब्द या गाली जिसका प्रयोग संसद में हुआ वह है साला। उसी बुधवार को गृहमंत्री ने कहा -"कि साला अब चुनाव आयोग कहता है कि कुछ नहीं हो रहा है ,कुछ नहीं हो रहा है ,तो ये लोग आरोप क्यों लगा रहे हैं ..." इसके बाद व्यवधान शुरू हो जाता है। सदन में रिकॉर्ड लिखने वालों की अंगुलियां चलती जाती हैं और वे लिखती हैं कि राहुल गांधी कहते हैं कि यह असंसदीय शब्द है और गौरव गोगोई कहते हैं क्या आप बाजार में बात कर रहे हैं फिर गृहमंत्री अमित शाह कहते हैं -मान्यवर अगर मैंने कोई गलत शब्द बोला है तो आप उसे कार्यवाही से निकाल दीजिये। कल्पना कीजिये की यह शब्द अगर विपक्ष के किसी नेता ने बोला होता तो स्पीकर और सत्तापक्ष का रवैया क्या होता? राहुल गांधी ने बाद में संसद से बाहर आकर मीडियकर्मियों से कहा -"ग़लत भाषा यूज़ कर दी, हाथ काँप रहे थे,मेंटली बहुत प्रेशर में हैं, वो दिखा कल संसद में और पूरे देश ने उनको देखा।"
चुनाव सुधार की सारी प्रक्रिया को शुद्धिकरण बता कर, घुसपैठियों की सफ़ाई से जोड़ा जा रहा है। इसी पर विपक्ष ने सदन से वाकआउट भी किया जिस पर शाह ने तंज़ किया कि मुझे ख़ुशी होती अगर ये अपनी पार्टी के नेताओं की भूमिका पर वाकआउट करते पर इन्होंने तो घुसपैठियों पर किया। वैसे पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर दिल्ली पुलिस को ससम्मान पश्चिम बंगाल की गर्भवती महिला सोनाली खातून को बांग्लादेश से भारत लाना पड़ा क्योंकि उसे जबरदस्ती डिपोट कर दिया गया था। यह बहुत दुखद और हैरानी भरा है कि व्यवस्था जल्दबाज़ी में अपने ही नागरिकों को सीमा पार भेज कर देश निकाला दे रही है । बंगाल का मतलब केवल बांग्लादेश नहीं है। देश अब भी जानने के इंतज़ार में है कि बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (सर) के बाद कितने घुसपैठिए सामने आए हैं।
संसद हमेशा पक्ष -प्रतिपक्ष की बहस से भरी होनी चाहिए, मुद्दों और तर्क से इस पवित्र कक्ष को गूंज जाना चाहिए लेकिन बुधवार को कुछ और ही हुआ था। गाली और क्रोध नेताओं की भाषा का हिस्सा नहीं होना चाहिए अभी कुछ ही साल तो हुए जब 2011 की तीखी बहस में विपक्ष की प्रखर सांसद सुषमा स्वराज की शायरी का जवाब तब के प्रधानमंत्री ने शायरी से ही दिया था और वे मुस्कुरा पड़ी थीं। ये आचरण सम्मान का था,आज की तरह शत्रुता का नहीं। सुषमा स्वराज ने अपने वक्तव्य के आख़िर में शहाब जाफरी का शेर कहा था -
तू इधर उधर की बात ना कर ये बता कि क़ाफ़िले क्यों लुटे
तेरी रहबरी का सवाल है हमें राहज़न से ग़रज़ नहीं
तब जवाब में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अल्लामा इक़बाल का शेर सुनाया और फिर संसद वाहवाही से गूंज गई
माना की तेरी दीद के क़ाबिल नहीं मैं
तू मेरा शौक देख मेरा इंतज़ार तो देख
रहबरी -मार्गदशक
राहज़न -डाकू,लुटेरा
दीद -दर्शन,दीदार।



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