बिना विचारे लक्ष्मण

फिजा में भीनी महक है। त्योहारों की मिठास और जीवन का उल्लास घुला हुआ है। मनभावन सावन में तरुणी का सिंजारा आ चुका है। लहरिये का रंग खूब सुन्दर है कावडि़यों के जयकारों की भी गूंज है। ईद की सिवइयों का जायका भी होठों पर है, जो पूरे तीस दिन के रोजे और इबादत के बाद नसीब हुआ है। बारिश की बूंदों ने हर शै को बरकत भर दी है। ये बूंदे हैं ही इतनी पवित्र कि रूखे मन और सूखे ठूंठ में भी प्राण फूंकने का माद्दा रखती है। एेसे माहौल में कोई बेतुकी बात नहीं होनी चाहिए खासकर इन मीडिया चैनलों की तरह तो बिल्कुल नहीं जो केवल चीखने-चिल्लाने को बहस का नाम दे बैठे हैं। बहस में हर पक्ष को सुना जाता है । धैर्य और समन्वय का परिचय देते हुए सुंदर नतीजे पर पहुंचा जा सकता है, लेकिन शायद सुंदर नतीजों को टीआरपी नहीं मिलती तभी जी टीवी पर एक वक्ता दूसरे को 'टुच्चा' संबोधित कर रहे थे। वे कह रहे थे आप टुच्चे हैं। चले जाइए इस देश से। ये एंकर महाशय जो अर्णव गोस्वामी की हिंदी नकल हैं, उन्होंने पहले तो पूरा वार्तालाप हो जाने दिया फिर कह दिया कि चैनल इस तरह की शब्दावली से इत्तेफाक नहीं रखता। ...