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जी राम जी के भरोसे छोड़े सब राज काज

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कभी कभी लगता है कि हमारी सरकार, सरकार ना होकर कोई बाबा या बहुरूपिया हो जो समय -समय पर रूप बदल-बदल कर जनता को प्रभावित करने के लिए आ जाती है। फिर चाहे इस कोशिश में उसे पुराने और प्रभावी जंतरों को ही क्यों न बदलना पड़े। इस पहल में कभी वह योजनाओं का नाम बदलकर राम-राम जपने लगती है तो कभी सीधे भारतवासियों को ऐसा ध्वजारोहण दिखाती है कि नागरिक अपनी सुध-बुध भूल भवसागर में गोते लगाने लगता है। उसे लगता है कि क्या सोच है,क्या मास्टर स्ट्रोक है,मुझे तो कोई समस्या ही नहीं है। इस बीच नए नाम के साथ पुरानी योजनाओं के बिल पास हो जाते हैं, बिना  इस फर्क को बताए कि जो पहले था वह काम पाने का सुनिश्चित अधिकार था और जो अब है वह बिना फंड के है और सीमित है। जिसके पास काम नहीं, केंद्र उसकी ज़िम्मेदारी लेता था। अब जो हुआ है उसमें यह है कि हे राज्यो, तुम्हारा फण्ड तुम लाओ, हम केवल निगरानी करेंगे।  क्या देश इसलिए केंद्र की सरकार चुनता है कि कर्तव्य राज्यों के बढ़ते जाएं और नियंत्रण केंद्र का। यह संविधान की संघीय भावना का भी उल्लंघन है। संभव है कि कोई योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी हो तब इस...

'साला 'संसद में तमतमाने का सबब क्या है

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आख़िर इस तमतमाने का सबब क्या है? क्यों ये नेता अपने क्रोध पर क़ाबू नहीं कर पाते ? क्यों लोकतंत्र के मंदिर में इनका आवेश चरम पर होता है ? यक़ीनन गृहमंत्री की इस भाव–भंगिमा और तेवर के बाद कि 'आपकी मुनसिफ़ी से नहीं चलेगी  संसद   और मेरे बोलने का क्रम मैं तय करूँगा' ने बता दिया है कि वे दलों के बीच कैसा संबंध रखना चाहते हैं। यह दृश्य जिसने भी देखा वह तकलीफ़ में आ गया कि गृहमंत्री और नेता प्रतिपक्ष के बीच संवाद किस स्तर तक पहुंच गया है। ये जो आपा खोना है इस पर तो भारतीय प्राचीन ग्रंथ आख्यानों से भरे पड़े हैं। एक से एक बेहतरीन उदाहरण हैं  मनसा,वाचा, कर्मणा को क़ाबू में रखने के लिए। गीता में तो बहुत स्पष्ट है कि बुद्धिमान व्यक्ति का मन, शब्द और कर्म पर नियंत्रण बहुत ज़रूरी है। अनदेखा तो नेता प्रतिपक्ष को भी नहीं किया जा सकता क्योंकि संवाद जो संयम की सीमा-रेखा लांघ गया, उसके दूसरे छोर पर वे थे।  केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह तो लगातार चुनाव जीतने वाली, सबसे बड़ी पार्टी के सशक्त नेता हैं फिर क्यों उनका ग़ुस्सा सतह पर आ गया। नेता प्रतिपक्ष लगातार चुनाव हार रहे हैं ,उनके पास ढेरों सवाल हैं...

नोटबंदी, देशबंदी के बाद अब वोटबंदी

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नोटबंदी, देशबंदी के बाद अब वोटबंदी का दौर है। सरकार के इन फ़ैसलों को लाभ-हानि के तराज़ू में तौलने से कहीं ज़्यादा ज़रूरी और गंभीर पक्ष है आम आदमी की जान जाने का क्रम। नवंबर 2016 में यकायक लागू हुई नोटेबंदी ने पूरे देश को कतार में लगा दिया था । परिवारों  के इलाज, ब्याह-शादी के कार्यक्रम अस्त-व्यस्त हुए। सैकड़ों लोग इस अभाव और तनाव में अपनी जान खो बैठे। मार्च 2020 की एक रात देश की गति को अचानक रोक दिया गया। लॉकडाउन घोषित हो गया, जो जहां था वहीं, थम गया। जिसके पास थमने के लिए जगह नहीं थी, वह पैदल ही अपने घर के लिए निकल पड़ा।अव्यवस्था के अस्पतालों में मरीज़ दम तोड़ रहे थे तो सड़कों पर जनता। अब वोटबंदी लागू हुई है कि जल्द से जल्द जनता 2002 की मतदाता सूची के हिसाब से अपने मतदाता होने का सबूत सरकार को दे वर्ना नाम कट जाएगा। सरकार को अपने ही तंत्र से बनी वोटर आईडी पर शक हो गया है इसलिए देश के बारह राज्य अब इसी काम में लगे हुए हैं। इस काम को पूरा करने के लिए सबसे छोटी इकाई बीएलओ है जिन पर काम का ऐसा दबाव है कि वे आत्महत्या कर रहे हैं और जो नागरिक यह साबित नहीं कर पा  रहे हैं, वे भी  ख़ुद को...