रंग ए उल्फ़त

सोच रही हूँ मेरे तुम्हारे बीच कौन सा रंग है स्लेटी, इसी रंग की तो थी कमीज़ जो पहली बार तुम्हें तोहफे में दी थी तुमने उसे पहना ज़रूर पसंद नहीं किया . लाल, जब पंडित ने कहा था लड़की से कहना यही रंग पहने... हम दोनों को रास नहीं आया ख़ास पीला, तुम्हारे उजले रंग में खो-सा जाता था गुलाबी, में तुम्हे छुई-मुई लगती तुम ऐसे नहीं देखना चाहते थे मुझे सफ़ेद , में तुम फ़रिश्ता नज़र आते यह लिखते हुए एक पानी से भरा बादल घिर आया है हरा और केसरिया इन पर तो जाने किन का कब्ज़ा हो गया है नीला यही, यही तो था जिस पर मेरी तुम्हारी युति थी नीले पर कोई शक शुबहा नहीं था हमें फ़िदा थे हम दिलों जान से . अब ये सारे रंग मिलकर काला बुन देते हैं मेरे आस-पास. मैं हूँ कि वही इन्द्रधनुष बनाने पर तुली हूँ जो था हमारे आस-पास नीलम आभा के साथ |