जायज हो जिस्मफरोशी ?

पीला हाउस की असंख्य रंडिये शाम ढलते ही सस्ता पावडर और शोख लिपस्टिक पोत कर खड़ी होने लगी हैं फाकलैण्ड स्ट्रीट के दोनों तरफ क्या बसा है उनकी उजाड़ आंखों में सुकून नहीं इसरार नहीं ललक नही उम्मीद नहीं खौफ हां भूख हां बेचैनी हां अवमानना हां बेपनाह बोझे जैसी बेबसी बसी है पेट और उसके अतराफ अलाव की शक्ल में लोग कहते हैं एड्स दे रही हैं ये रंडियें कोई नहीं कहता हम उन्हें आखिर क्या देते हैं फाकलैंड रोड मुंबई का रेडलाइट एरिया है। विख्यात पत्रकार शाहिद मिर्जा की दो दशक पहले लिखी यह कविता आज भी सवाल करती है कि हम उन्हें आखिर क्या देते हैं। चंद रुपए, दलालों की सोहबत, बेहिसाब बीमारियां, पकड़े जाने पर हवालात, पुलिस की गालियां। और जो कभी जूतों की ठोकरें कम पड़ीं तो यही पुलिस अखबारों में उनकी चेहरा ढकी तस्वीरें दे कर उन्हें सरेआम बेपर्दा कर देती है कि लो देखो ये धंधेवालियां हैं। क्यों बनती हैं ये धंधेवालियां ? पिछले बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए चौंकाने वाली टिप्पणी की कि सदियों पुराने इस व्यवसाय को यदि कानून के जरिए बंद नहीं किया जा सकता सरकार को इसे वैध कर देना चाहिए। जस्...