तुम नहीं समझोगे

तुम नहीं समझोगे कोई कैसे किसी के भीतर हर लम्हा सितार सा बजता है कोई झरने सा बहता है कल-कल कोई पंछी -सा चहचाहता है निरंतर कोई फूल सा खिल जाता है अकस्मात् कोई फ़रिश्ता सिफ़त मुस्कुरा देता है अनायास कोई मसरूफ है सूफ़ियाना रक्स में बेतरह कोई रूह उतरने को है गहरे तुम नहीं समझोगे क्योंकि जब तुम्हें अता हुआ यह मौका तुम लग गए ज़िन्दगी के हिसाब-किताब में अब सारी टीस किताबों में दर्ज करने से कुछ नहीं होगा कुछ भी नहीं। रक्स -नृत्य