सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना

क्या लोकतांत्रिक ढंग से चुने हुए नेता भी लोक की अवहेलना करने लगते हैं और फिर जिंदा कौमें पांच साल इंतज़ार नहीं करती ,अपने चुने हुए नेता को ही आईना दिखाने के लिए सड़कें पाट देती है। दुनिया तो फिलहाल ऐसे ही संकेत दे रही है। कई देशों में जनता सीधे अपने नेता को चुनौती दे रही है। इजरायल ताज़ा मिसाल है जहां जनता ने सड़कों पर विद्रोह करते हुए प्रधानमंत्री को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है। इज़राइली प्रधानमंत्री को स्वतंत्र न्यायिक व्यवस्था में सरकारी दख़ल वाले कानून को कुछ समय के लिए स्थगित कर देना पड़ा है। फ्रांस की जनता भी सड़कों पर है यहां तक की श्रीलंका, ईरान और चीन की जनता भी सड़कों पर लड़ाई लड़ रही है। हमारे देश की चुनी हुई सरकार भी तो कुछ ऐसा ही तर्क रखती है कि एक चुनी हुई सरकार का न्याय पालिका में दखल होना चाहिए। वह न्याय पालिका में कार्य पालिका का हस्तक्षेप चाहती है लेकिन फिलहाल यही सरकार खुश है कि चार लाख मतों से चुने हुए सांसद को वह सही वक्त पर संसद से निकालने में कामयाब हो गई है। तकनीकी तौर पर देखा जाए तो जनता बस चुनने का औपचारिक जरिया भर बन कर रह गई है अगर ऐसा नहीं...