मौत का एक दिन मुअय्यन है नींद क्यों रात भर नहीं आती
मौत का एक दिन मुअय्यन है नींद क्यों रात भर नहीं आती चचा ग़ालिब इस शेर को भले ही दो सदी पहले लिख गए हों लेकिन आज यह हर हिन्दुस्तानी का हाल हो गया है। डर का साया उसके दिल ओ दिमाग पर खुद गया है।इस हाल में उसे कोई उम्मीद तसल्ली के दो शब्द कहीं नज़र नहीं आते। हमने अपने ध्येय वाक्य 'प्राणी मात्र पर दया' से भी मुँह मोड़ लिया है और आज प्राणवायु के लिए ठोकरे खा रहे हैं। इस बुरे वक्त में प्राण निकल भी रहे हैं तो भी तसल्ली कहाँ है। दो गज जमीन का भी संकट है और बैकुंठ जाने के लिए लकड़ी भी रास्ता रोक रही है। श्मशान घाट और कब्रिस्तान दोनों एक ही कहानी कह रहे हैं। ऐसे में इंसान के कोमल मन पर रुई के फाहे रखे कौन ? हम सब जानते हैं कौन ,उम्मीद भी बहुत रखी लेकिन अब सिर्फ और सिर्फ हमें करना होगा। किसी से उम्मीद न रखते हुए हमारी प्राचीन विरासत और संस्कारों के हवाले से। हमें बिना किसी अपेक्षा के बस मदद के हाथ बढ़ाने होंगे। मानव सभ्यता पर ऐसा संकट अभूतपूर्व है। आज़ाद भारत के लिए तो और भी नया क्योंकि इंसान-इंसान के बीच दूरी को ...