गुड़िया भीतर गुड़ियाएं

हम सब गुस्से में हैं। हमारी संवेदनाओं को एक बार फिर बिजली के नंगे तारों ने छू दिया है। हम खूब बोल रहे हैं, लिख रहे हैं लेकिन कोई नहीं बोल रहा है तो वो सरका र और का नून व्यवस्था के लिए ज़िम्मेदार लोग। खूब बोल-लिख कर भी लग रहा है कि क्या यह काफी है ? कोई हल है हमारे पास कि बच्चों का यौन शोषण न हो और बेटियों के साथ बलात्कार का सिलसिला रुक जाए। ऐसी जादू की छड़ी किसी कानून के पास नहीं लेकिन कानून लागू करने वालों के पास एक शक्ति है वह है इच्छा शक्ति। ईमानदारी से लागू करने की इच्छा शक्ति । हमने किसी भी सरकारी मुखिया को सख्ती से यह कहते नहीं सुना कि बहुत हुआ, अब और नहीं। मेरे देश, मेरे प्रदेश में इस तरह का कोई भी अपराध बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हर मुखिया बचता नजर आता है। बयान आते हैं पुलिस क्या करे वह हर दीवार, हर कौने की चौकसी नहीं कर सकती; दुष्कर्म एक सामाजिक अपराध है; कोई भी सरकार हो, इलजाम तो सरकार पर ही लगते हैं; ऐसे उबा देनेवाले बयानों की लंबी...