मौत और ज़िन्दगी यानी दो नज्में

पिछले दिनों अनीसुर्रहमान सम्पादित 'शायरी मैंने ईजाद की 'पढ़ी जिसमें आधुनिक उर्दू शायरी का समावेश है. जीवन और अंत से जुडी दो कवितायेँ वहीँ से. क्या करोगे ? शाइस्ता हबीब तुम मेरे मरने पर ज्यादा से ज्यादा क्या कर लोगे? कुछ देर तक आंखें हैरत में गुम रहेंगी एक सर्द सी आह तुम्हारे होटों को छूते हुए उड़ जाएगी और तुम्हें कई दिनों तक मेरे मरने का यकीन नहीं आएगा फिर एक दिन... तुम अपने दोस्तों के साथ बैठै हुए कहकहे लगा रहे होगे मैं एक अजनबी आंसू की तरह तुम्हारे गले में जम जाऊंगी और तुम... तुम उस आंसू को निगलने की कोशिश में सचमुच रो पड़ोगे कि मैं वाकई मर गई हूं यह मुहब्बत की नज़्म है जीशान साहिल इसे पानी पे लिखना चाहिए या किसी कबूतर के पैरों से बांध कर उड़ा देना चाहिए या किसी खरगोश को याद करा देना चाहिए या फिर किसी पुराने पियानो में छुपा देना चाहिए यह मुहब्बत की नज्म है इसे बालकनी में नहीं पढऩा चाहिए और खुले आसमान के नीचे याद नही करना चाहिए इसे बारिश में नहीं भूलना चाहिए और आंखों से ज्यादा करीब नहीं रखना चाहिए ...