निजता सर्वोच्च है

वाकई तीन दिन में दो फैसले इंसानी गरिमा को कायम रखनेवाले ही मालूम होते हैं। निजता सर्वोच्च ही होनी चाहिए और कोई भी एकतरफा मनमानी का शिकार नहीं होना चाहिए। सब कुछ ठीक रहा तो हम क्या खाएंगे किससे ब्याह करेंगे ये सारे निर्णय हमारे होंगे। एक प्रकार से यह मदद करेगा एक ऐसे समाज को बनाने में जहाँ एक दूसरे का सम्मान हो। यह न्याय, बराबरी और आज़ादी देनेवाला समाज होगा। इसे किसी भी दल विशेष से जोड़कर देखने के बजाय मानवीय गरिमा से जोड़कर देखा जाना ही सही होगा। भारत वह देश होगा दुनिया में जहाँ निजता नागरिक का सर्वोच्च हक़ होगा। यह हक़ उसे भारतीय संविधान ने पहले ही दिया भी है । शायद कुछ गलत फहमियां हो गईं थीं जो अब दुरुस्त हो जाएंगी। विशेषज्ञ यह भी मान रहें हैं की इससे धारा 377 को आपराधिक ना मानने की राह भी आसान हो सकती है। कौन किसके साथ रहना चाहता है या रह रहा है, उसके लिए वह अपराधी नहीं क़रार दिया जा सकेगा।