दहेज़ नहीं दिया तो माथे पर लिख दिया मेरा बाप चोर है
महिलाओं के खिलाफ ऐसे नए-नए अपराधों की बाढ़ आ गई है कि दहेज थोड़ा पुराना-सा लगने लगा है। आउट ऑव फैशन-सा लेकिन यह धोखा है, भ्रम है हमारा। इसे आउट ऑव फैशन समझने-बताने वाले वे लोग हैं जो इन बातों के प्रचार में लगे हैं कि महिलाएं दहेज का झूठा केस ससुराल वालों पर करा देती हैं और अधिकांश ऐसे मामले अदालत की देहरी पर हांफने लगते हैं। ठीक है कुछ देर के लिए यही सच है ऐसा मान भी लिया जाए तो क्या बेटी के माता-पिता के मन में बेटी के पैदा हेाते ही धन जोडऩे के खयाल ने आना बंद कर दिया है? क्या बेटे के जन्म लेने के बाद माता-पिता ने धन का एक हिस्सा इसलिए रख छोड़ा है कि यह नई बहू और बेटे के लिए हमारा तोहफा होगा? क्या बहुओं के मानस पर ऐसी कोई घटना अंकित नहीं है जब ससुराल पक्ष के किन्ही रिश्तेदारों न लेन-देन को लेकर ताने ना कसे हों? जब तक इस सोच में बदलाव देखने को नहीं मिलेगा दहेज का दानव कभी पीछा छोड़ ही नहीं सकता। दरअसल दहेज की अवधारणा लड़की की विदाई से जुड़ी है। पाठक नाराज हो सकते हैं कि क्या लड़की क ो विदा करना ही गलत हो गया? हां, हम क्यों कन्यादान, विदाई, पराई, जैसे शब्द इस्तेमाल करते ह...