अजमेर में 'संभल'ना होगा

उत्तरप्रदेश के संभल में चार भारतीय नागरिक मारे गए। कोई भी जांच या बातचीत केवल यह मानकर शुरू क्यों नहीं हो सकती। इस हिंसा को समुदाय के नज़रिये से क्यों देखा जाना चाहिए ? नहीं देखा जाएगा क्योंकि ऐसे तटस्थ रवैये में वह कवरेज कहां जो गर्मागर्म मुद्दों को लपक ले। शाम की हिंसक बहस फिर कहां होगी ? मंदिर -मस्जिद विवाद में घेरना ही तो मक़सद है। मन्टो की कहानियों को जैसे फिर ज़िंदा करना है जिनमें बंटवारे के बाद कई बेगुनाह मारे गए थे ,कई विक्षिप्त हो गए थे। तब फिरंगी हुकूमत थी। वे जाते-जाते देश तोड़ गए। अपने हिसाब से इतिहास लिखवाया ताकि नफ़रत दोनों और उफनती रहे अब इस दौर में उन दस्तावेजों को सामने लाया जा रहा है जो उनके मुलाज़िमों ने लिखे। तब क्या देश फ़िरंगी सरकार से लड़ने वाले शहीदों को अब भुला चुका है। वक़्त का पहिया ऐसे भी घूमेगा कि अब हमारे नायक बदलने लगेंगे? अब क्यों सबकुछ नए सिरे से खोदने और सद्भावना की जड़ों में खून भेजने की ज़रूरत आ पड़ी है ? अब कौन फायदा लेना चाहता है ? संभल के बाद अजमेर का नंबर लगा दिया गया है। यह सब तब हो रहा है जब हिन्दू जाग्रत...